पाठ्यक्रम: GS2/शासन
समाचार में
- राष्ट्रीय बाल अधिकार संरक्षण आयोग (NCPCR) ने निरंतर चलाए जा रहे अभियान के अंतर्गत बाल श्रम से 3,800 से अधिक बच्चों को मुक्त कराया है।
बाल श्रम
- बाल श्रम को ऐसे किसी भी कार्य के रूप में परिभाषित किया जा सकता है, जो बच्चे की आयु तथा उसकी शारीरिक या मानसिक क्षमताओं के संदर्भ में असंवैधानिक हो।
- इससे आशय ऐसे कार्य से है, जो बच्चे की आयु के लिए अनुपयुक्त हो अथवा उसके स्वास्थ्य, शिक्षा या शारीरिक, मानसिक, सामाजिक या नैतिक विकास को प्रभावित करता हो।
- अपने सबसे गंभीर रूपों में इसमें दासता, मानव तस्करी, जबरन भर्ती, मादक पदार्थों का उत्पादन एवं तस्करी, वेश्यावृत्ति तथा सशस्त्र संघर्ष में भागीदारी शामिल हो सकती है।
भारत में स्थिति
- भारत में बाल श्रम की समस्या व्यापक है। वर्ष 2011 की जनगणना के अनुसार, 5 से 14 वर्ष की आयु के लगभग 43.53 लाख बच्चे गरीबी, शिक्षा तक सीमित पहुँच तथा अशिक्षा जैसे कारकों के कारण बाल श्रम में संलग्न थे।
- बीड़ी निर्माण, कालीन बुनाई तथा पटाखा कारखानों में बाल श्रम का प्रचलन अधिक है।
- NCPCR के अखिल भारतीय बचाव एवं पुनर्वास अभियान के अंतर्गत 3,800 से अधिक बच्चों को बचाया गया है तथा 575 से अधिक प्रथम सूचना रिपोर्ट (FIR) दर्ज की गई हैं।
- अभियान में पुनर्वास, परिवार से पुनर्मिलन, बच्चों को पुनः विद्यालय भेजने तथा मुआवजा उपलब्ध कराने पर भी विशेष बल दिया गया है।
बाल श्रम के कारण
- आय की असुरक्षा एवं गरीबी: बच्चों से कराया जाने वाला कार्य सामान्यतः गरीबी रेखा पर या उसके आसपास रहने वाले परिवारों की मूलभूत आजीविका संबंधी आवश्यकताओं को पूरा करने का साधन होता है।
- ऋण के चक्र में फँसे परिवार अथवा आजीविका के लिए मौसमी प्रवास करने वाले परिवार उत्पादन के निर्धारित लक्ष्यों को पूरा करने हेतु प्रायः बच्चों से शारीरिक श्रम करवाने के लिए विवश होते हैं।
- शैक्षिक कमियाँ: गुणवत्तापूर्ण विद्यालयों तक सीमित पहुँच, अपर्याप्त आधारभूत संरचना तथा विशेषकर ग्रामीण क्षेत्रों में विद्यालयों की अधिक दूरी बच्चों को विद्यालय जाने से हतोत्साहित कर सकती है।
- असंगठित क्षेत्र से माँग: असंगठित क्षेत्र के नियोक्ता प्रायः कम उम्र के श्रमिकों को नियुक्त करना पसंद करते हैं, क्योंकि वे सस्ते, गैर-संघीकृत, अपेक्षाकृत आज्ञाकारी तथा लचीले श्रम के रूप में उपलब्ध होते हैं।
- सामाजिक-सांस्कृतिक गतिशीलता: जातिगत भेदभाव, लैंगिक पक्षपात (घरेलू जिम्मेदारियों के कारण लड़कियों को विद्यालय से बाहर कर देना) तथा पैतृक या पारंपरिक व्यवसाय अपनाने की अपेक्षाएँ बच्चों को श्रम में लगाने की प्रवृत्ति को बढ़ावा देती हैं।
प्रभाव
- स्वास्थ्य संबंधी जोखिम: विषैले धूल-कणों, रसायनों, भारी मशीनरी तथा लंबे कार्य घंटों के संपर्क में रहने वाले बच्चों में दीर्घकालिक श्वसन रोग, मांसपेशीय एवं अस्थि-संबंधी समस्याएँ, अवरुद्ध शारीरिक विकास तथा शारीरिक चोटें विकसित हो सकती हैं।
- मनोवैज्ञानिक आघात: कठोर परिस्थितियों में लंबे समय तक कार्य करने के कारण बच्चे सामाजिक संपर्क, खेल के समय तथा भावनात्मक सुरक्षा से वंचित हो जाते हैं, जिससे उनमें मानसिक तनाव, चिंता तथा आत्म-सम्मान में कमी जैसी समस्याएँ उत्पन्न हो सकती हैं।
- शिक्षा एवं कौशल से वंचित होना: कार्य करने वाले बच्चों का विद्यालय छोड़ देना अथवा शिक्षा में कमजोर प्रदर्शन करना अशिक्षा तथा रोजगार-बाजार के लिए प्रासंगिक व्यावसायिक कौशल के अभाव का कारण बनता है।
- अंतर-पीढ़ीगत गरीबी: अशिक्षित एवं अकुशल बाल श्रमिक आगे चलकर स्वयं कम वेतन वाले श्रमिक बन जाते हैं, जिससे अगली पीढ़ी में भी गरीबी का चक्र जारी रहता है।
- राष्ट्रीय आर्थिक क्षति: व्यापक बाल श्रम वयस्क श्रमिकों की मजदूरी दर को कम करता है तथा समग्र रूप से मानव पूंजी की गुणवत्ता को प्रभावित करता है। इससे भारत की दीर्घकालिक आर्थिक उत्पादकता और जनसांख्यिकीय लाभांश की संभावनाएँ बाधित होती हैं।
उठाए गए विभिन्न कदम
- संवैधानिक संरक्षण: संविधान में बच्चों की सुरक्षा के लिए व्यापक प्रावधान किए गए हैं। अनुच्छेद 23 और 24 मानव तस्करी, भिक्षावृत्ति, जबरन श्रम तथा जोखिमपूर्ण उद्योगों में रोजगार से संरक्षण प्रदान करते हैं।
- शिक्षा का अधिकार अब राज्य के लिए 6 से 14 वर्ष की आयु के सभी बच्चों को निःशुल्क एवं अनिवार्य शिक्षा प्रदान करना अनिवार्य करता है।
- विधायी उपाय:
- भारत ने वर्ष 1986 में बाल श्रम (निषेध एवं विनियमन) अधिनियम (CLPRA) लागू किया, जबकि राष्ट्रीय बाल श्रम नीति, 1987 ने पुनर्वास पर ध्यान केंद्रित करते हुए क्रमिक एवं चरणबद्ध दृष्टिकोण अपनाने का प्रयास किया।
- इसकी कार्ययोजना में CLPRA का कठोर प्रवर्तन तथा बाल श्रम की उच्च घटनाओं वाले क्षेत्रों में राष्ट्रीय बाल श्रम परियोजना (NCLP) का कार्यान्वयन शामिल था।
- CLPRA को बाल श्रम (निषेध एवं विनियमन) संशोधन अधिनियम, 2016 द्वारा प्रतिस्थापित किया गया। इसने 14 वर्ष से कम आयु के बच्चों के रोजगार पर प्रतिबंध लगाया तथा 14–18 वर्ष के किशोरों को अनुसूचित जोखिमपूर्ण व्यवसायों में नियोजित करने पर प्रतिबंध का प्रावधान किया।
- BNS की धारा 98 और 99 विशेष रूप से नाबालिगों की ‘बिक्री और खरीद’ से संबंधित मामलों को संबोधित करती हैं।
- यौन शोषण के लिए मानव तस्करी की रोकथाम का प्रावधान अनैतिक व्यापार (निवारण) अधिनियम, 1956 में किया गया है।
- बाल तस्करी के पीड़ितों की देखभाल, संरक्षण एवं पुनर्वास का प्रावधान किशोर न्याय (बालकों की देखरेख और संरक्षण) अधिनियम, 2015 के अंतर्गत किया गया है।
- आपराधिक विधि (संशोधन) अधिनियम, 2013 का उद्देश्य भी ऐसी गतिविधियों पर अंकुश लगाना है। इसमें तस्करी की अधिक व्यापक परिभाषा प्रदान की गई है, जिसमें यौन शोषण, दासता, दासवत् स्थिति, जबरन श्रम तथा अंगों को हटाना शामिल है।
- इसमें सहमति की परवाह किए बिना की जाने वाली मानव तस्करी को भी शामिल किया गया है।
- भारत ने वर्ष 1986 में बाल श्रम (निषेध एवं विनियमन) अधिनियम (CLPRA) लागू किया, जबकि राष्ट्रीय बाल श्रम नीति, 1987 ने पुनर्वास पर ध्यान केंद्रित करते हुए क्रमिक एवं चरणबद्ध दृष्टिकोण अपनाने का प्रयास किया।
न्यायिक टिप्पणियाँ
- विशाल जीत बनाम भारत संघ, 1990: न्यायालय ने माना कि मानव तस्करी और बाल वेश्यावृत्ति गंभीर सामाजिक-आर्थिक समस्याएँ हैं तथा इनसे निपटने के लिए निवारक एवं मानवीय दृष्टिकोण आवश्यक है।
- एम. सी. मेहता बनाम तमिलनाडु राज्य, 1996: न्यायालय ने जोखिमपूर्ण उद्योगों में बच्चों के रोजगार पर प्रतिबंध लगाने के उद्देश्य से दिशानिर्देश जारी किए।
- बचपन बचाओ आंदोलन बनाम भारत संघ, 2011: सर्वोच्च न्यायालय ने बच्चों के व्यापक शोषण एवं मानव तस्करी से निपटने के लिए निर्देश जारी किए।
निष्कर्ष
- बाल श्रम अभी भी भारत की एक गंभीर सामाजिक-आर्थिक समस्या है, जो बच्चों को विद्यालय, बचपन तथा स्वस्थ विकास से वंचित करती है।
- इसके उन्मूलन के लिए केवल विधायी प्रतिबंध पर्याप्त नहीं हैं। इसके लिए गरीबी तथा अन्य संरचनात्मक कारकों का समाधान, सामाजिक सुरक्षा के विस्तार के साथ प्रभावी प्रवर्तन को सुदृढ़ करना, सार्वजनिक शिक्षा में सुधार, अनौपचारिक आपूर्ति शृंखलाओं का विनियमन तथा सामुदायिक सतर्कता को बढ़ावा देना आवश्यक है।
- बच्चों की सुरक्षा एक न्यायसंगत, सुदृढ़ और उत्पादक राष्ट्र के निर्माण की आधारशिला है।
स्रोत : TH
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