संक्षिप्त समाचार  04-05-2026

अंडमान ने दो गिनीज विश्व रिकॉर्ड स्थापित किए 

पाठ्यक्रम: GS1/सुर्ख़ियों में रहे स्थान

सन्दर्भ

  • अंडमान और निकोबार द्वीप समूह ने स्वराज द्वीप (पूर्व में हैवलॉक द्वीप) पर पानी के भीतर सबसे ऊँचा मानव पिरामिड बनाकर एक और गिनीज विश्व रिकॉर्ड स्थापित किया।

परिचय

  • यह उपलब्धि उस घटना के एक दिन बाद प्राप्त हुई, जब केंद्रशासित प्रदेश प्रशासन ने लगभग 60 × 40 मीटर आकार का विश्व का सबसे बड़ा पानी के भीतर राष्ट्रीय ध्वज फहराकर एक ऐतिहासिक उपलब्धि हासिल की।
  • ये दोनों गिनीज विश्व रिकॉर्ड राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर ध्यान आकर्षित करेंगे तथा अंडमान और निकोबार द्वीप समूह को स्कूबा डाइविंग और पारिस्थितिक पर्यटन के केंद्र के रूप में स्थापित करने में सहायता करेंगे।

अंडमान और निकोबार द्वीप समूह

  • स्थिति: यह द्वीप समूह बंगाल की खाड़ी में भारतीय मुख्यभूमि से लगभग 1300 किमी दक्षिण-पूर्व में स्थित है।
  • इसका विस्तार 6°45′ उत्तरी अक्षांश से 13°41′ उत्तरी अक्षांश तथा 92°12′ पूर्वी देशांतर से 93°57′ पूर्वी देशांतर तक है।
  • यह द्वीप समूह 500 से अधिक बड़े और छोटे द्वीपों से मिलकर बना है, जिन्हें दो मुख्य भागों में विभाजित किया गया है—अंडमान द्वीप समूह और निकोबार द्वीप समूह।
  • डंकन मार्ग दक्षिण अंडमान को लिटिल अंडमान से अलग करता है।
  • दस डिग्री चैनल अंडमान द्वीप समूह को निकोबार द्वीप समूह से अलग करता है।
  • छह डिग्री चैनल निकोबार द्वीप समूह को सुमात्रा (इंडोनेशिया) से अलग करता है।

अंडमान और निकोबार द्वीप समूह से संबंधित तथ्य

  • सबसे दक्षिणी द्वीप ग्रेट निकोबार है, जिसका दक्षिणी छोर सुमात्रा (इंडोनेशिया) से लगभग 150 किमी दूर है।
  • सबसे ऊँचा स्थान उत्तर अंडमान में सैडल पीक (732 मीटर) तथा ग्रेट निकोबार में माउंट थुलियर (642 मीटर) है।
  • पंडुनुस अथवा निकोबार ब्रेडफ्रूट एक दुर्लभ फल है, जो अंडमान और निकोबार द्वीप समूह में पाया जाता है।
  • अंडमान और निकोबार द्वीप समूह का बैरन द्वीप न केवल भारत बल्कि पूरे दक्षिण एशिया का एकमात्र सक्रिय ज्वालामुखी है।
  • ग्रेट निकोबार में स्थित इंदिरा पॉइंट भारत का सबसे दक्षिणी बिंदु है।
  • ग्रेट निकोबार जैवमंडल आरक्षित क्षेत्र की स्थापना 1989 में हुई तथा 2013 में इसे यूनेस्को मानव एवं जैवमंडल आरक्षित क्षेत्र के रूप में मान्यता प्राप्त हुई।
  • इन द्वीपों में विश्व की अंतिम अप्रभावित जनजातियों में से एक  सेंटिनलीज़ निवास करती है।

स्रोत: TH

लिपुलेख दर्रा

पाठ्यक्रम: जीएस-1/भूगोल

सुर्खियों में क्यों ?

  • नेपाल ने लिपुलेख दर्रे के माध्यम से कैलाश मानसरोवर यात्रा आयोजित करने की भारत की योजना पर आपत्ति जताई है, जिसे नेपाल विवादित क्षेत्र मानता है।

लिपुलेख दर्रा

  • यह उत्तराखंड (भारत) के पिथौरागढ़ जिले में स्थित एक उच्च हिमालयी दर्रा है।
  • यह कुमाऊँ क्षेत्र में लगभग 5,334 मीटर की ऊँचाई पर स्थित है।
  • यह भारत, चीन (तिब्बत) और नेपाल को जोड़ने वाला एक महत्त्वपूर्ण त्रि-जंक्शन बिंदु है।
  • भारत की ओर से इसे धारचूला के माध्यम से पहुँचा जाता है।
  • यह सामरिक तथा सांस्कृतिक दृष्टि से अत्यंत महत्त्वपूर्ण है, क्योंकि यह भारतीय तीर्थयात्रियों के लिए कैलाश मानसरोवर यात्रा का पारंपरिक मार्ग है।
  • इसका ऐतिहासिक वाणिज्यिक महत्त्व भी है, क्योंकि 1992 में व्यापार खुलने पर यह भारत–चीन सीमा व्यापार का पहला केंद्र बना।

विवाद क्या है?

  • लिपुलेख दर्रे को लेकर भारत और नेपाल के बीच तनाव वर्ष 1816 की सुगौली संधि से जुड़ा एक जटिल सीमा विवाद है।
  • यह संधि ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी और नेपाल साम्राज्य के बीच हुई थी, जिसमें काली नदी (महाकाली) को नेपाल की पश्चिमी सीमा माना गया।
  • नेपाल का दावा है कि यह नदी लिपियाधुरा से निकलती है, जिससे लिपुलेख और कालापानी क्षेत्र उसके क्षेत्र में आते हैं।
  • इसके विपरीत, भारत का मत है कि नदी का उद्गम कालापानी के निकट एक निम्न बिंदु से होता है, जिससे यह दर्रा उत्तराखंड राज्य में भारत, नेपाल और चीन के बीच एक रणनीतिक त्रि-जंक्शन बना रहता है।

स्रोत: TH

एप्निया परीक्षण

पाठ्यक्रम: जीएस-2/स्वास्थ्य

सन्दर्भ

  • सर्वोच्च न्यायालय उस याचिका पर विचार कर रहा है, जिसमें यह आरोप लगाया गया है कि मस्तिष्क मृत्यु का आकलन करने के लिए एप्निया परीक्षण निर्णायक नहीं है।

परिचय

  • एप्निया परीक्षण मस्तिष्क मृत्यु के निर्धारण में एक महत्वपूर्ण घटक है। यह परीक्षण यह आकलन करता है कि कार्बन डाइऑक्साइड (CO₂) का स्तर बढ़ने पर रोगी स्वतः श्वास ले पाता है या नहीं।
  • यह परीक्षण मस्तिष्क स्टेम (विशेष रूप से मेडुला) से श्वसन क्रिया की अनुपस्थिति की पुष्टि करने के लिए किया जाता है, जो मस्तिष्क मृत्यु के निदान में आवश्यक है।
  • सामान्यतः, धमनियों में CO₂ का स्तर बढ़ने से मस्तिष्क स्टेम में स्थित श्वसन केंद्र उत्तेजित होकर श्वास क्रिया शुरू करते हैं।
  • यदि CO₂ का स्तर बढ़ने के बावजूद श्वास क्रिया नहीं होती है, तो यह मस्तिष्क स्टेम के कार्य में हानि का संकेत देता है।
  • मस्तिष्क मृत्यु मस्तिष्क के सभी कार्यों, जिनमें मस्तिष्क स्टेम भी शामिल है, की अपरिवर्तनीय और पूर्ण हानि है।
  • जो व्यक्ति का मस्तिष्क मृत हो चुका होता है, उसमें चेतना नहीं होती, ब्रेनस्टेम रिफ्लेक्सिस नहीं होते और वह स्वतंत्र रूप से सांस लेने में सक्षम नहीं होता है,भारत सहित कई देशों में उसे कानूनी रूप से मृत माना जाता है।

स्रोत: TH

सेल प्रसारण चेतावनी प्रणाली

पाठ्यक्रम: जीएस-2/शासन 

सुर्खियों में क्यों ?

  • भारत ने स्वदेशी सेल प्रसारण तकनीक का उपयोग करते हुए ‘सचेत’ आपातकालीन चेतावनी प्रणाली प्रारंभ की है, जिसका उद्देश्य आपदाओं के दौरान त्वरित चेतावनी संदेश भेजना है।

सेल प्रसारण क्या है?

  • यह एक से अनेक तक संदेश भेजने वाली मोबाइल संचार प्रणाली है, जो किसी विशेष भौगोलिक क्षेत्र के सभी मोबाइल उपकरणों पर एक साथ संक्षिप्त चेतावनी संदेश भेजती है।
  • यह सामान्य संदेश सेवा से भिन्न है, क्योंकि इसमें व्यक्तिगत नंबरों को लक्ष्य नहीं बनाया जाता, जिससे नेटवर्क व्यस्त होने पर भी संदेश तुरंत पहुँच जाता है।
  • इसका विकास 1990 के दशक के प्रारंभ में यूरोपीय दूरसंचार मानक संस्थान द्वारा किया गया था और 1997 में पेरिस में इसका प्रथम प्रदर्शन हुआ। वर्तमान में इसका उपयोग 30 से अधिक देशों में किया जा रहा है।
  • यह प्रणाली भूकंप, बाढ़, चक्रवात, तूफान, लू तथा औद्योगिक दुर्घटनाओं (जैसे गैस रिसाव या रासायनिक घटनाएँ) जैसी आपदाओं के दौरान त्वरित और विश्वसनीय चेतावनी संदेश भेजने के लिए उपयोग की जाती है।
  • इसका मुख्य उद्देश्य भारत की आपदा प्रबंधन प्रणाली को प्रतिक्रियात्मक से सक्रिय दृष्टिकोण की ओर ले जाना है।

सेल प्रसारण प्रणाली के लाभ

  • यह व्यक्तिगत डेटा का उपयोग नहीं करती और न ही मोबाइल नंबर, अनुप्रयोग या सदस्यता की आवश्यकता होती है।
  • यह तेज़ और ध्यान आकर्षित करने वाले संदेश भेजती है, जो सामान्य फोन गतिविधियों, जैसे मौन या “परेशान न करें” स्थिति को भी निष्क्रिय कर देते हैं, और संदेश तब तक स्क्रीन पर रहता है जब तक उपयोगकर्ता उसे स्वीकार न कर ले।
  • इसका उपयोग अत्यंत सीमित और गंभीर परिस्थितियों में किया जाता है, जैसे भूकंप, आकस्मिक बाढ़, भूस्खलन, बाँध टूटना तथा अन्य बड़ी आपदाएँ, और यह केवल प्रभावित क्षेत्र के लोगों को ही भेजा जाता है।

स्रोत :IE

आर्थिक भगोड़े अपराधी

पाठ्यक्रम: जीएस -2/शासन

सन्दर्भ

  • प्रवर्तन निदेशालय ने 21 व्यक्तियों को आर्थिक भगोड़े अपराधी (FEO) घोषित किया है।

आर्थिक भगोड़े अपराधी का परिचय

  • भगोड़े वे व्यक्ति होते हैं जो किसी अपराध के आरोपी या दोषी होते हैं और जानबूझकर न्यायिक प्रक्रिया से बचने के लिए देश के अधिकार क्षेत्र से बाहर चले जाते हैं।
  • वे गिरफ्तारी, मुकदमे, दोषसिद्धि या दंड से बचने के लिए भाग जाते हैं और उनकी वापसी के लिए प्रत्यर्पण जैसी विधिक अंतरराष्ट्रीय प्रक्रिया की आवश्यकता होती है।
  • आर्थिक भगोड़ा अपराधी अधिनियम, 2018 के अनुसार, वह व्यक्ति जिसके विरुद्ध भारत की किसी अदालत ने 100 करोड़ रुपये या उससे अधिक के अनुसूचित अपराध के लिए गिरफ्तारी वारंट जारी किया हो।

आर्थिक भगोड़ा अपराधी अधिनियम, 2018 की प्रमुख विशेषताएँ

  • संपत्ति की जब्ती: यह अधिनियम अधिकारियों को अपराधी की भारत और विदेश में स्थित संपत्तियों को संलग्न करने और जब्त करने का अधिकार देता है।
  • इसमें बेनामी संपत्तियाँ और अपराधी द्वारा अप्रत्यक्ष रूप से नियंत्रित परिसंपत्तियाँ भी शामिल हैं।
  • नागरिक दावों पर प्रतिबंध: घोषित आर्थिक भगोड़े भारतीय न्यायालयों में किसी भी नागरिक दावे को प्रारंभ या उसका बचाव नहीं कर सकते।
  • विशेष न्यायालय व्यवस्था: मामलों के निपटारे के लिए धन शोधन निवारण अधिनियम, 2002 के अंतर्गत स्थापित विशेष न्यायालयों की व्यवस्था की गई है।

प्रवर्तन निदेशालय (ED)

  • उत्पत्ति: इसकी स्थापना 1956 में आर्थिक मामलों के विभाग के अंतर्गत ‘प्रवर्तन इकाई’ के रूप में हुई थी, जो विदेशी मुद्रा विनियमन अधिनियम, 1947 के उल्लंघनों से संबंधित मामलों को देखती थी।
  • 1957 में इसका नाम प्रवर्तन निदेशालय रखा गया और बाद में इसका प्रशासनिक नियंत्रण राजस्व विभाग को सौंप दिया गया।
  • यह एक बहु-विषयक संगठन है, जिसका कार्य धन शोधन और विदेशी मुद्रा कानूनों के उल्लंघन से संबंधित अपराधों की जांच करना है।

 इसके वैधानिक कार्यों में निम्न अधिनियमों का प्रवर्तन शामिल है:

  • धन शोधन निवारण अधिनियम, 2002
  • विदेशी मुद्रा प्रबंधन अधिनियम, 1999
  • आर्थिक भगोड़ा अपराधी अधिनियम, 2018

स्रोत: IE

यूपीआई के गौरवपूर्ण 10 वर्ष पूर्ण

पाठ्यक्रम: जीएस-3/अर्थव्यवस्था

सन्दर्भ

  • एकीकृत भुगतान अंतरफलक ने अप्रैल 2016 में प्रारंभ होने के बाद अपने 10 वर्ष पूर्ण कर लिए हैं।

यूपीआई का परिचय

  • यूपीआई एक वास्तविक समय भुगतान प्रणाली है, जो उपयोगकर्ताओं को एक ही मोबाइल अनुप्रयोग में कई बैंक खातों को जोड़ने की सुविधा देती है, जिससे सहज धन हस्तांतरण और व्यापारी भुगतान संभव होता है।
  • इसे भारतीय राष्ट्रीय भुगतान निगम द्वारा भारतीय रिज़र्व बैंक की निगरानी में प्रारंभ किया गया था।
  • यह प्रणाली विभिन्न बैंकिंग सुविधाओं को एक ही परस्पर क्रियाशील मंच पर समाहित करती है, जिससे विभिन्न बैंकों और अनुप्रयोगों के बीच तुरंत लेन-देन संभव होता है।

यूपीआई की उपलब्धियाँ

  • लेन-देन में वृद्धि: वार्षिक लेन-देन 2016–17 में 2 करोड़ से बढ़कर 2025–26 में 24,162 करोड़ हो गया है।
  • वर्ष 2025 में लगभग 22,000 करोड़ लेन-देन हुए, जिनका दैनिक औसत लगभग 60 करोड़ रहा।
  • बैंकों की भागीदारी: जुड़े हुए बैंकों की संख्या 44 से बढ़कर 703 हो गई है, जिसमें सार्वजनिक, निजी, लघु वित्त, भुगतान और सहकारी बैंक शामिल हैं।
  • वैश्विक नेतृत्व: 2024 में वैश्विक वास्तविक समय भुगतान लेन-देन में यूपीआई की हिस्सेदारी लगभग 49% रही, जिसे अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष द्वारा मान्यता दी गई है।
  • अंतरराष्ट्रीय विस्तार: यूपीआई को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी लागू किया गया है, जिससे सीमा-पार भुगतान संभव हुआ है, जैसे:

संयुक्त अरब अमीरात: व्यापारिक स्थानों पर व्यापक उपयोग

सिंगापुर: पे-नाउ से जुड़कर सहज लेन-देन

फ्रांस: विशेष रूप से भारतीय पर्यटकों के लिए स्वीकार्यता

भूटान, नेपाल, श्रीलंका, मॉरीशस और कतर: स्थानीय प्रणालियों के साथ एकीकृत। 

भारतीय राष्ट्रीय भुगतान निगम 

  • यह भारत में खुदरा भुगतान और निपटान प्रणालियों के लिए एक प्रमुख संस्था है।
  • इसकी स्थापना भारतीय रिज़र्व बैंक और भारतीय बैंक संघ की पहल पर भुगतान और निपटान प्रणाली अधिनियम, 2007 के अंतर्गत की गई थी।
  • यह कंपनी अधिनियम, 2013 की धारा 8 के अंतर्गत एक गैर-लाभकारी संस्था के रूप में कार्य करती है।
  • इसके प्रमुख उत्पादों में तत्काल भुगतान सेवा, राष्ट्रीय स्वचालित समाशोधन गृह, यूपीआई, रुपे तथा आधार सक्षम भुगतान प्रणाली (AePS)शामिल हैं।

स्रोत: PIB

गैलेक्सीआई द्वारा मिशन दृष्टि का प्रक्षेपण

पाठ्यक्रम: जीएस-3/विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी

सन्दर्भ

  • भारतीय अंतरिक्ष स्टार्टअप गैलेक्सीआई ने अमेरिका के कैलिफ़ोर्निया से स्पेसएक्स के फाल्कन- 9 रॉकेट के माध्यम से मिशन दृष्टि का प्रक्षेपण किया है, जो विश्व का पहला ऑप्टो-एसएआर उपग्रह है।

परिचय

  • मिशन दृष्टि एक पृथ्वी अवलोकन उपग्रह है, जिसका भार लगभग 190 किलोग्राम है।
  • यह विश्व का पहला उपग्रह है जिसमें विद्युत-ऑप्टिकल और सिंथेटिक अपर्चर रडार संवेदकों को एक ही मंच पर एकीकृत किया गया है, जिससे हर मौसम और दिन-रात में चित्र लेने की क्षमता प्राप्त होती है।
  • उपग्रह में बहु-वर्णीय कैमरा और रडार चित्रण प्रणाली दोनों लगाए गए हैं, जिससे डेटा विश्लेषण अधिक प्रभावी होता है।
  • मिशन दृष्टि उच्च विभेदन चित्र प्रदान करता है, और भविष्य के उपग्रहों में इससे भी अधिक सूक्ष्म स्तर तक चित्रण की क्षमता विकसित करने का लक्ष्य है।
  • महत्त्व: यह दोहरे उपयोग वाला उपग्रह है, जो नागरिक तथा रक्षा दोनों क्षेत्रों में उपयोगी है।
  • इसके प्रमुख उपयोगों में कृषि निगरानी, आपदा प्रबंधन, समुद्री निगरानी तथा अवसंरचना मानचित्रण शामिल हैं।

स्रोत: AIR

नौसैनिक एंटी-शिप मिसाइल – लघु दूरी (NASM-SR)

पाठ्यक्रम: जीएस-3/रक्षा

सन्दर्भ

  • भारत ने बंगाल की खाड़ी में ओडिशा तट के पास सी किंग हेलीकॉप्टर से नौसैनिक एंटी-शिप मिसाइल – लघु दूरी का पहला सफल परीक्षण किया।

परीक्षण के बारे में 

  • एक ही मंच से त्वरित क्रम में दो मिसाइलें दागी गईं, जिससे संचालनात्मक सल्वो क्षमता का सफल परीक्षण हुआ।
  • सभी परीक्षण मानकों की पुष्टि चांदीपुर स्थित एकीकृत परीक्षण क्षेत्र में तैनात रडार, विद्युत-ऑप्टिकल प्रणालियों और दूरमिति (telemetry) उपकरणों के माध्यम से की गई।

 NASM-SR का परिचय

  • यह लघु दूरी की नौसैनिक एंटी-शिप मिसाइल है, जिसे समुद्री लक्ष्यों को सटीकता से भेदने के लिए विकसित किया गया है।
  • इसे विशेष रूप से हेलीकॉप्टर आधारित प्रक्षेपण के लिए तैयार किया गया है, जिससे नौसेना की समुद्री आक्रमण क्षमता में वृद्धि होती है।
  • इसमें उन्नत मार्गदर्शन प्रणाली, लक्ष्य पहचान क्षमता तथा उच्च सटीकता से प्रहार करने की क्षमता होती है।
  • यह समुद्री युद्ध में त्वरित प्रतिक्रिया, सतह पर मौजूद दुश्मन जहाजों के विनाश तथा सामरिक बढ़त सुनिश्चित करने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाती है।
  • नौसैनिक एंटी-शिप मिसाइल – लघु दूरी एक स्वदेशी रूप से विकसित, वायु से प्रक्षेपित एंटी-शिप मिसाइल है, जिसे हेलीकॉप्टर आधारित समुद्री आक्रमण अभियानों के लिए तैयार किया गया है।
  • यह भारत की पहली स्वदेशी हेलीकॉप्टर से प्रक्षेपित एंटी-शिप मिसाइल है, जिसे ब्रिटेन मूल की सी ईगल जैसी पुरानी प्रणालियों के स्थान पर विकसित किया गया है।
  • इसका उद्देश्य भारतीय नौसेना को समुद्री लक्ष्यों के विरुद्ध उच्च सटीकता वाली स्वदेशी प्रहार क्षमता प्रदान करना है, जिससे रक्षा आत्मनिर्भरता सुदृढ़ होती है।
  • इस प्रणाली का विकास रक्षा अनुसंधान एवं विकास संगठन के अंतर्गत अनुसंधान केंद्र इमारत द्वारा अन्य प्रयोगशालाओं के सहयोग से किया गया है।
  • इसमें सीकर(seeker) , एवियोनिक्स, नौवहन, नियंत्रण प्रणाली तथा डेटा लिंक सहित सभी महत्त्वपूर्ण उप-प्रणालियाँ स्वदेशी रूप से विकसित की गई हैं।

संचालनात्मक क्षमताएँ

  • सल्वो(Salvo) लॉन्च कैपेसिटी: एक ही मंच से तीव्र क्रम में अनेक मिसाइलें दागने की क्षमता, जिससे युद्ध की स्थिति में प्रहार की तीव्रता बढ़ती है।
  • वॉटर लाईन हिट कैपेसिटी : यह जहाज के ढाँचे को जलरेखा पर सटीक रूप से लक्ष्य बनाती है, जिससे अधिक जल भराव और संरचनात्मक क्षति होती है तथा लक्ष्य का प्रभावी निष्क्रियकरण सुनिश्चित होता है।

स्रोत: TH

प्रोसोपिस जुलीफ्लोरा का उपयोग 

पाठ्यक्रम: जीएस-3/पर्यावरण 

सुर्खियों में क्यों ?

  • प्रोसोपिस जुलीफ्लोरा का उपयोग अब एक जैव-मेथनॉल परियोजना में किया जा रहा है, जिसमें जैव द्रव्य को स्वच्छ ईंधन में परिवर्तित किया जाता है। 

प्रोसोपिस जुलीफ्लोरा

  • प्रोसोपिस जुलीफ्लोरा एक दलहनी वृक्ष है, जो सूखा और लवणीयता के प्रति अत्यधिक सहनशील होता है।
  • इसका मूल मेक्सिको है, और इसे गुजरात में गंडो बावल, उत्तर भारत में विलायती कीकर तथा तमिलनाडु में वेलिकाथन के नाम से जाना जाता है।
  • इसे पहली बार 1920 के दशक में ब्रिटिश शासन द्वारा दिल्ली को हरित बनाने के लिए तथा 1961 में गुजरात वन विभाग द्वारा रण क्षेत्र में फैलते लवणीय मरुस्थल को रोकने के लिए लाया गया था।

जैव-मेथनॉल परियोजना में उपयोग

  • गुजरात के कांडला (दीनदयाल) बंदरगाह पर एक पायलट परियोजना के अंतर्गत इस आक्रामक झाड़ी को स्वच्छ ईंधन में परिवर्तित किया जा रहा है, जो हरित सागर दिशा-निर्देश (2023) और समुद्री भारत दृष्टि 2030 के अंतर्गत हरित बंदरगाह और शून्य-उत्सर्जन लक्ष्यों का हिस्सा है।
  • लगभग 100 करोड़ रुपये की यह परियोजना मार्च 2027 तक पूर्ण होने की संभावना है, जिससे प्रतिदिन लगभग 5 टन मेथनॉल का उत्पादन होगा।
  • इस प्रक्रिया में जैव द्रव्य को गैसीकरण द्वारा संश्लेषण गैस में परिवर्तित किया जाता है, और फिर उत्प्रेरक अभिक्रियाओं के माध्यम से इसे मेथनॉल में परिवर्तित किया जाता है।
  • यह ईंधन बंदरगाह संचालन और नौवहन में उपयोग किया जा सकता है तथा कृत्रिम विकल्पों की तुलना में लागत में भी लाभ प्रदान कर सकता है।

महत्त्व

  • नवीकरणीय स्रोतों से बने मेथनॉल के उपयोग से जहाजों के कार्बन डाइऑक्साइड उत्सर्जन में लगभग 95% तक तथा नाइट्रोजन ऑक्साइड में लगभग 80% तक कमी लाई जा सकती है, साथ ही सल्फर ऑक्साइड और कणीय पदार्थों का उत्सर्जन समाप्त किया जा सकता है।
  • यह स्थानीय स्तर पर जैव द्रव्य के संग्रह को बढ़ावा देता है, आक्रामक प्रजातियों से होने वाले पर्यावरणीय नुकसान को कम करता है तथा सतत बंदरगाह विकास को प्रोत्साहित करता है।

स्रोत :TH

 

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