पश्चिम बंगाल के चाय श्रमिकों ने अंतर्राष्ट्रीय श्रम संगठन के अनुच्छेद 24 का सहारा लिया 

पाठ्यक्रम: जीएस-3 / अर्थव्यवस्था

सन्दर्भ

  • पश्चिम बंगाल के चाय बागान श्रमिकों ने श्रम अधिकारों के उल्लंघन के मुद्दों को अंतर्राष्ट्रीय श्रम संगठन के समक्ष अनुच्छेद 24 का सहारा लेकर उठाया है।

परिचय

  • श्रमिकों ने आरोप लगाया है कि भारत द्वारा अनुमोदित अंतरराष्ट्रीय समझौतों के बावजूद श्रम अधिकारों का व्यवस्थित रूप से उल्लंघन हो रहा है।
  • वे भूख से मृत्यु, गंभीर कुपोषण, मजदूरी एवं बकाया का भुगतान न होना, न्यूनतम मजदूरी का अभाव तथा महिलाओं और आदिवासी श्रमिकों के साथ भेदभाव जैसे मुद्दों का उल्लेख करते हैं।

अनुच्छेद 24 का प्रावधान

  • अनुच्छेद 24 के अंतर्गत नियोक्ताओं या श्रमिकों के औद्योगिक संगठन किसी भी सदस्य देश के विरुद्ध प्रतिवेदन प्रस्तुत कर सकते हैं, यदि वह अपने क्षेत्र में अनुमोदित अंतर्राष्ट्रीय श्रम संगठन अभिसमयों के प्रभावी पालन को सुनिश्चित करने में विफल रहा हो।
  • इस प्रतिवेदन की जाँच के लिए संचालन निकाय द्वारा तीन-सदस्यीय त्रिपक्षीय समिति गठित की जा सकती है।
  • समिति अपनी रिपोर्ट में मामले के विधिक तथा व्यावहारिक पक्षों का विवरण देती है, प्रस्तुत सूचनाओं की समीक्षा करती है और अंत में सिफारिशें प्रस्तुत करती है।

अंतर्राष्ट्रीय श्रम मानक

वर्ष 1919 से अंतर्राष्ट्रीय श्रम संगठन ने अंतरराष्ट्रीय श्रम मानकों की व्यवस्था को बनाए रखा है और विकसित किया है।

ये मानक ऐसे विधिक साधन हैं जिन्हें सरकार, नियोक्ता और श्रमिक मिलकर तैयार करते हैं और जो कार्यस्थल पर मूल सिद्धांतों एवं अधिकारों को निर्धारित करते हैं। 

ये दो प्रकार के होते हैं:

अभिसमय और प्रोटोकॉल: ये विधिक रूप से बाध्यकारी अंतरराष्ट्रीय संधियाँ होती हैं, जिन्हें सदस्य देश अनुमोदित कर सकते हैं।

सिफारिशें: ये गैर-बाध्यकारी मार्गदर्शक सिद्धांत के रूप में कार्य करती हैं।

किसी मानक को अपनाए जाने के बाद सदस्य देशों को अंतर्राष्ट्रीय श्रम संगठन के संविधान के अनुच्छेद 19(6) के अंतर्गत 12 माह के भीतर उसे अपने सक्षम प्राधिकरण के समक्ष विचार हेतु प्रस्तुत करना होता है।

यदि अभिसमय अनुमोदित हो जाता है, तो सामान्यतः वह एक वर्ष बाद उस देश में लागू हो जाता है।

अनुमोदन करने वाले देश उसे अपने राष्ट्रीय कानून और व्यवहार में लागू करने तथा समय-समय पर उसके क्रियान्वयन की रिपोर्ट देने के लिए बाध्य होते हैं।

आवश्यकता होने पर अंतर्राष्ट्रीय श्रम संगठन तकनीकी सहायता भी प्रदान करता है।

जिन देशों ने किसी अभिसमय को अनुमोदित किया है, उनके द्वारा उल्लंघन की स्थिति में उनके विरुद्ध प्रतिवेदन और शिकायत की प्रक्रिया शुरू की जा सकती है।

अंतरराष्ट्रीय श्रम संगठन (ILO)

  • अंतर्राष्ट्रीय श्रम संगठन एक संयुक्त राष्ट्र की एजेंसी है, जिसकी स्थापना 1919 में वर्साय की संधि के अंतर्गत हुई, जिसने प्रथम विश्व युद्ध को समाप्त किया।
  • वर्ष 1946 में यह संयुक्त राष्ट्र की पहली विशिष्ट एजेंसी बनी।
  • भारत 1919 में, स्वतंत्रता से पहले ही, इसका संस्थापक सदस्य बना।
  • इसके 187 सदस्य देश हैं।
  • यह श्रम मानकों का निर्धारण करता है, नीतियाँ बनाता है और सभी महिलाओं एवं पुरुषों के लिए सम्मानजनक कार्य को बढ़ावा देने हेतु कार्यक्रम तैयार करता है।
  • यह संयुक्त राष्ट्र की एकमात्र त्रिपक्षीय एजेंसी है, जिसमें सरकार, नियोक्ता और श्रमिक तीनों सम्मिलित होते हैं।
  • इसका मुख्यालय जिनेवा,स्विट्जरलैंड में स्थित है।

भारत में श्रम कानून

  • भारत सरकार ने 2025 से चार श्रम संहिताओं को लागू करने की घोषणा की है, जिनसे 29 पुराने श्रम कानूनों को सरल बनाया गया है:
  • वेतन संहिता, 2019: मजदूरी, बोनस तथा समान पारिश्रमिक को नियंत्रित करती है।
  • औद्योगिक संबंध संहिता, 2020: श्रमिक संघ, रोजगार की शर्तें, छंटनी तथा विवाद निपटान से संबंधित है।
  • सामाजिक सुरक्षा संहिता, 2020: भविष्य निधि, पेंशन, बीमा, मातृत्व लाभ तथा सेवा-समाप्ति लाभ को एकीकृत करती है।
  • व्यावसायिक सुरक्षा, स्वास्थ्य और कार्य परिस्थितियाँ संहिता, 2020: कार्यस्थल की सुरक्षा, कार्य समय, स्वास्थ्य और श्रमिक कल्याण से जुड़े प्रावधानों को समेकित करती है।
  • भारत में श्रम कानून संगठित तथा असंगठित दोनों क्षेत्रों पर लागू होते हैं, किन्तु असंगठित क्षेत्र में इनका प्रभावी पालन अभी भी चुनौती बना हुआ है।
  • इनके क्रियान्वयन में श्रम और रोज़गार मंत्रालय, राज्य श्रम विभाग तथा कर्मचारी भविष्य निधि संगठन और कर्मचारी राज्य बीमा निगम जैसे निकाय शामिल हैं।

स्रोत: DTE

 

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