पाठ्यक्रम: GS2/अंतरराष्ट्रीय संबंध
संदर्भ
- हाल ही में, संयुक्त राष्ट्र महासभा के 81वें सत्र (81st UNGA) में भारत के विदेश मंत्री (EAM) ने वैश्विक संकटों के प्रति वैश्विक दक्षिण के असमान रूप से अधिक जोखिमग्रस्त होने को रेखांकित किया और अंतरराष्ट्रीय निर्णय-निर्माण में इसके अधिक प्रतिनिधित्व का आह्वान किया।
वैश्विक दक्षिण एवं भारत का दृष्टिकोण
- वैश्विक दक्षिण से व्यापक रूप से एशिया, अफ्रीका, लैटिन अमेरिका, कैरेबियन और ओशिनिया के कुछ हिस्सों के विकासशील एवं उभरते देशों का तात्पर्य है।
- यह कोई एकसमान राजनीतिक समूह नहीं है; इसके सदस्य देशों की आर्थिक क्षमता, रणनीतिक हितों और राजनीतिक व्यवस्थाओं में पर्याप्त अंतर है।
- विकासशील देश विश्व अर्थव्यवस्था के लिए लगातार अधिक महत्त्वपूर्ण होते जा रहे हैं, लेकिन वैश्विक शासन की प्रमुख संस्थाएँ अभी भी द्वितीय विश्व युद्ध के बाद की शक्ति-वितरण व्यवस्था को प्रतिबिंबित करती हैं।
- भारत वैश्विक दक्षिण को रणनीतिक स्वायत्तता, विकासात्मक साझेदारी, समावेशी बहुपक्षवाद और दक्षिण-दक्षिण सहयोग के सिद्धांतों के माध्यम से देखता है।
- वैश्विक दक्षिण की आवाज शिखर सम्मेलन (2023) में 125 देशों के प्रतिनिधियों ने भाग लिया। यह भारत की जी20 अध्यक्षता से पहले विकासशील देशों को अपने मुद्दों को सामने रखने का अवसर प्रदान करने वाला मंच था।
- भारत ‘सुधारित बहुपक्षवाद’ का समर्थन करता है, अर्थात ऐसी व्यवस्था जो अधिक प्रतिनिधित्वपूर्ण, समावेशी और उत्तरदायी हो।
वैश्विक दक्षिण का महत्त्व
- वैश्विक शासन: विकासशील देश संयुक्त राष्ट्र के सदस्य देशों का संख्यात्मक बहुमत हैं, लेकिन संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद (UNSC) में केवल पाँच स्थायी सदस्य हैं और ये सभी वर्ष 1945 की भू-राजनीतिक वास्तविकताओं को प्रतिबिंबित करते हैं।
- इसलिए वैश्विक संस्थाओं को अधिक वैध और प्रतिनिधित्वपूर्ण बनाने के लिए अफ्रीका, एशिया और लैटिन अमेरिका का अधिक प्रतिनिधित्व अत्यंत महत्त्वपूर्ण है।
- G4 (भारत, ब्राजील, जर्मनी और जापान) लगातार संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में सुधार का समर्थन करता रहा है।
- वैश्विक अर्थव्यवस्था: विकासशील अर्थव्यवस्थाएँ वैश्विक विकास, व्यापार और निवेश की प्रमुख प्रेरक शक्तियों के रूप में निरंतर अधिक महत्त्वपूर्ण होती जा रही हैं।
- हाल के दशकों में दक्षिण-दक्षिण व्यापार और निवेश में उल्लेखनीय वृद्धि हुई है, जिससे पारंपरिक उत्तर-दक्षिण संबंधों से अलग नए आर्थिक संबंध विकसित हुए हैं।
- विकास एवं वैश्विक सार्वजनिक वस्तुएँ: वैश्विक दक्षिण की जलवायु परिवर्तन, ऊर्जा सुरक्षा, खाद्य सुरक्षा, स्वास्थ्य, डिजिटल सार्वजनिक अवसंरचना, कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI) और प्रौद्योगिकी तक पहुँच जैसे क्षेत्रों में महत्वपूर्ण हिस्सेदारी है।
- उदाहरण के लिए, जलवायु संबंधी आघात कमजोर अर्थव्यवस्थाओं के विकास के लिए अधिक महँगे और गंभीर परिणाम उत्पन्न कर सकते हैं।
वैश्विक दक्षिण के समक्ष प्रमुख मुद्दे
- भू-राजनीतिक संघर्ष: युद्ध और भू-राजनीतिक तनाव खाद्य, उर्वरक, तेल और समुद्री परिवहन मार्गों को बाधित कर रहे हैं तथा आयात पर निर्भर विकासशील देशों को असमान रूप से अधिक प्रभावित कर रहे हैं।
- विखंडित वैश्वीकरण: बढ़ती व्यापार बाधाओं, प्रतिबंधों और आपूर्ति शृंखला संबंधी व्यवधानों के कारण विकासशील देशों की बाजारों, प्रौद्योगिकी और आवश्यक आदानों तक पहुँच सीमित हो सकती है।
- ऊर्जा असुरक्षा: औद्योगीकरण के लिए सस्ती और विश्वसनीय ऊर्जा आवश्यक है, जिसकी विकासशील देशों में पर्याप्त उपलब्धता नहीं है। ऊर्जा आपूर्ति और उसकी लागत में राजनीतिक हस्तक्षेप विकास प्रक्रिया को कमजोर कर सकता है।
- जलवायु संबंधी संवेदनशीलता: विकासशील विश्व के बड़े हिस्से का अतीत में उत्सर्जन में बहुत कम योगदान रहा है, लेकिन जलवायु परिवर्तन के कारण वह विकास संबंधी गंभीर जोखिमों का सामना कर रहा है।
- कमजोर प्रतिनिधित्व: संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद और ब्रेटन वुड्स संस्थाओं जैसी संस्थाओं का निर्माण पूरी तरह अलग भू-राजनीतिक परिस्थितियों में हुआ था।
- वैश्विक आर्थिक एवं जनसांख्यिकीय परिस्थितियों में परिवर्तन के बावजूद सुधार की प्रक्रिया धीमी है।
- वैश्विक दक्षिण के अंदर विभाजन: बड़ी विकासशील अर्थव्यवस्थाओं, अल्प-विकसित देशों, छोटे द्वीपीय देशों और वस्तु निर्यातक देशों के बीच मतभेद सामूहिक सौदेबाजी को कठिन बना सकते हैं।
दक्षिण-दक्षिण सहयोग में संयुक्त राष्ट्र महासभा की भूमिका
- संयुक्त राष्ट्र महासभा (UNGA) विकासशील देशों को अपने हितों को सामूहिक रूप से व्यक्त करने और दक्षिण-दक्षिण सहयोग (SSC) को गहरा करने के लिए वैश्विक मंच प्रदान करती है।
- संयुक्त राष्ट्र प्रत्येक वर्ष 12 सितंबर को दक्षिण-दक्षिण सहयोग का अंतरराष्ट्रीय दिवस मनाता है।
- सामूहिक आवाज: G77 और चीन जैसे मंच विकासशील देशों को विकास, व्यापार, जलवायु और वैश्विक शासन से संबंधित मुद्दों पर अपने रुख में समन्वय स्थापित करने में सक्षम बनाते हैं।
- मानदंड-निर्धारण: संयुक्त राष्ट्र महासभा के प्रस्तावों में दक्षिण-दक्षिण सहयोग को विकास और अंतरराष्ट्रीय सहयोग के महत्त्वपूर्ण साधन के रूप में बढ़ती मान्यता दी गई है।
- संस्थागत सहयोग: संयुक्त राष्ट्र प्रणाली, विशेष रूप से दक्षिण-दक्षिण सहयोग के लिए संयुक्त राष्ट्र कार्यालय (UNOSSC), विकासशील देशों के बीच सूचना हस्तांतरण, क्षमता निर्माण और तकनीकी सहयोग को समर्थन प्रदान करता है।
- ब्यूनस आयर्स कार्ययोजना: ब्यूनस आयर्स कार्ययोजना (BAPA), 1978 तथा इसका अनुवर्ती BAPA+40 (2019) विकासशील देशों के बीच तकनीकी सहयोग के प्रमुख ढाँचे हैं।
- विकास एजेंडा: संयुक्त राष्ट्र महासभा सतत विकास लक्ष्यों (SDGs), जलवायु न्याय, खाद्य एवं ऊर्जा सुरक्षा, प्रौद्योगिकी तक पहुँच और विकास वित्त जैसी साझा प्राथमिकताओं को बढ़ावा देने का मंच है।
- अधिक प्रतिनिधित्व: विकासशील देश संयुक्त राष्ट्र महासभा की व्यापक सदस्यता का उपयोग सुधारित बहुपक्षवाद की वकालत करने के लिए करते हैं, जिसमें संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद तथा अंतरराष्ट्रीय वित्तीय संस्थाओं में सुधार भी शामिल है।
- गठबंधन निर्माण: G77, गुटनिरपेक्ष आंदोलन (NAM), ब्रिक्स और क्षेत्रीय समूह संयुक्त राष्ट्र महासभा की वार्ताओं के माध्यम से वैश्विक दक्षिण के मुद्दों के लिए व्यापक समर्थन एकत्रित कर सकते हैं।
जी20 की भूमिका
- जी20 विकसित और विकासशील अर्थव्यवस्थाओं को जोड़ने वाला एक महत्त्वपूर्ण मंच है।
- भारत की 2023 की अध्यक्षता के दौरान अफ्रीकी संघ को जी20 के स्थायी सदस्य के रूप में शामिल किया गया, जिससे विकासशील विश्व का प्रतिनिधित्व सुदृढ़ हुआ।
ब्रिक्स
- ब्रिक्स दक्षिण-दक्षिण सहयोग के एक प्रमुख मंच के रूप में उभरा है। इसका न्यू डेवलपमेंट बैंक (NDB) विकास वित्त का एक वैकल्पिक स्रोत उपलब्ध कराता है, जबकि ब्रिक्स के विस्तार से उभरती अर्थव्यवस्थाओं की भागीदारी व्यापक हुई है।
वैश्विक दक्षिण के लिए भारत के प्रयास
- भारत ने विकासशील विश्व और वैश्विक संस्थाओं के बीच सेतु के रूप में कार्य करने के प्रयासों को लगातार बढ़ाया है।
- वर्ष 2023 में वैश्विक दक्षिण की आवाज शिखर सम्मेलन के आभासी उद्घाटन के अवसर पर 125 देशों के प्रतिनिधि एकत्र हुए और उन्होंने साझा विकासात्मक प्राथमिकताओं को निर्धारित करने पर विचार किया।
- वर्ष 2023 में जी20 की अपनी अध्यक्षता के दौरान भारत ने अफ्रीकी संघ को जी20 में स्थायी रूप से शामिल कराने में भूमिका निभाई, जिससे विकासशील देशों की आवाज सुदृढ़ हुई।
- भारत ने ब्रिक्स, IBSA, जी20 और G4 जैसे मंचों का उपयोग विकासशील देशों के लिए अधिक प्रतिनिधित्व और प्रभाव की वकालत करने के लिए किया है।
- भारत ने विकास साझेदारी, ऋण सहायता, क्षमता निर्माण और प्रौद्योगिकी सहयोग के माध्यम से दक्षिण-दक्षिण सहयोग को बढ़ावा दिया है।
- डिजिटल सार्वजनिक अवसंरचना, सस्ती औषधियाँ, जलवायु-अनुकूल विकास और आपदा-प्रतिरोधी अवसंरचना पर भारत का ध्यान व्यापक सहयोग के लिए संभावित मॉडल प्रस्तुत करता है।
- वर्तमान राजनयिक सहयोग में कृत्रिम बुद्धिमत्ता, अंतरिक्ष, स्वास्थ्य विज्ञान, ऊर्जा और संपर्क जैसे क्षेत्र शामिल हैं। इसके उदाहरणों में भारत–संयुक्त अरब अमीरात–फ्रांस त्रिपक्षीय सहयोग तथा भारत–मध्य पूर्व–यूरोप आर्थिक गलियारा (IMEC) जैसी पहलें शामिल हैं।
आगे की राह: अधिक प्रतिनिधित्वपूर्ण वैश्विक व्यवस्था की ओर
- वैश्विक संस्थाओं में सुधार: संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में सुधार के माध्यम से स्थायी एवं अस्थायी दोनों प्रकार के सदस्यों का प्रतिनिधित्व बढ़ाया जाना चाहिए तथा परिषद को वर्तमान भू-राजनीतिक परिस्थितियों के अधिक अनुरूप बनाया जाना चाहिए।
- दक्षिण-दक्षिण सहयोग का सुदृढ़ीकरण: विकासशील देशों को प्रौद्योगिकी, स्वास्थ्य देखभाल, खाद्य सुरक्षा, ऊर्जा, वित्त और लचीली आपूर्ति शृंखलाओं के क्षेत्रों में सहयोग को सुदृढ़ करना चाहिए।
- वैश्विक वित्त का लोकतंत्रीकरण: अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष (IMF), विश्व बैंक और अन्य बहुपक्षीय वित्तीय संस्थाओं में सुधार आवश्यक है, ताकि वे वर्तमान आर्थिक स्थिति और गरीब देशों की विकास संबंधी आवश्यकताओं का बेहतर प्रतिनिधित्व कर सकें।
- रणनीतिक स्वतंत्रता की रक्षा: वैश्विक दक्षिण को किसी एक भू-राजनीतिक निर्भरता-बिंदु पर अत्यधिक निर्भरता को कम करने के लिए आपूर्ति शृंखलाओं, ऊर्जा स्रोतों, वित्तीय माध्यमों और संचार नेटवर्कों में विविधता लानी चाहिए।
- एकरूपता की माँग किए बिना एकजुटता का निर्माण: एक सुदृढ़ वैश्विक दक्षिण का एक विशिष्ट या अलग-थलग समूह बनना आवश्यक नहीं है। इसके बजाय यह बहुपक्षवाद को अधिक प्रतिनिधित्वपूर्ण, न्यायसंगत और प्रभावी बनाने में योगदान दे सकता है।
निष्कर्ष
- चुनौती केवल वैश्विक दक्षिण को अधिक मुखर आवाज प्रदान करने की नहीं है, बल्कि यह सुनिश्चित करने की है कि उसकी चिंताएँ नीति-निर्धारण और निर्णय-निर्माण की वास्तविक शक्ति में परिवर्तित हों।
- भारत का मत है कि एक स्थिर और कानून-आधारित अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था के लिए ऐसी संस्थाओं की आवश्यकता है जो 21वीं सदी की वास्तविकताओं को प्रतिबिंबित करें, न कि केवल 1945 के शक्ति-संतुलन को।
| दैनिक मुख्य परीक्षा अभ्यास प्रश्न [प्रश्न]: वैश्विक दक्षिण के समक्ष उपस्थित चुनौतियों का परीक्षण कीजिए तथा वैश्विक व्यवस्था को अधिक प्रतिनिधित्वपूर्ण, समावेशी एवं उत्तरदायी बनाने में भारत की भूमिका की चर्चा कीजिए। |
स्रोत: IE