पाठ्यक्रम: GS2/राजव्यवस्था और शासन
संदर्भ
- प्रस्तावित विदेशी अंशदान विनियमन संशोधन विधेयक, 2026 का उद्देश्य निष्क्रिय हो चुके या जिनका पंजीकरण नवीनीकृत नहीं हुआ है, ऐसे NGO और संघों की विदेशी वित्तपोषित परिसंपत्तियों के संबंध में व्यापक परिवर्तन करना है। वर्तमान में यह विधेयक एक संयुक्त संसदीय समिति द्वारा समीक्षा के अधीन है, क्योंकि इसे विपक्ष की ओर से विरोध का सामना करना पड़ा है।
NGO के लिए विदेशी वित्तपोषण के बारे में
- NGO को प्राप्त होने वाले विदेशी अंशदान का विनियमन मुख्य रूप से विदेशी अंशदान (विनियमन) अधिनियम (FCRA), 2010 के माध्यम से किया जाता है। इसने FCRA, 1976 का स्थान लिया था।
- विदेशी अंशदान में विदेशी स्रोतों से प्राप्त दान, हस्तांतरण या अन्य प्रकार की प्राप्तियाँ शामिल होती हैं।
- NGO तथा अन्य पात्र संगठनों को ऐसे धन प्राप्त करने के लिए FCRA पंजीकरण या पूर्व अनुमति प्राप्त करना आवश्यक होता है।
- इस नियामक ढाँचे का उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि विदेशी धन राष्ट्रीय हित, संप्रभुता, सुरक्षा या लोक व्यवस्था को प्रतिकूल रूप से प्रभावित न करे।
विदेशी वित्तपोषण क्यों महत्वपूर्ण है?
- विदेशी सहायता ने भारत के स्वैच्छिक क्षेत्र में मिश्रित, किंतु महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है।
- ‘भारतीय NGO के लिए विदेशी मदद: समस्या या समाधान?’’ में उद्धृत शोध के अनुसार, अनेक NGO को विदेशी वित्तपोषण से निम्नलिखित लाभ प्राप्त हुए:
- नए विचारों, प्रौद्योगिकियों और संगठनात्मक कार्यप्रणालियों का परिचय;
- क्षमता निर्माण और व्यावसायिकता को बढ़ावा;
- स्वास्थ्य, शिक्षा और सामाजिक कल्याण कार्यक्रमों के लिए सहायता; तथा
- पारंपरिक सरकारी वित्तपोषण की तुलना में अधिक लचीलापन।
- हालाँकि, बाहरी दाताओं पर निर्भरता किसी संगठन की प्राथमिकताओं को प्रभावित कर सकती है, जिससे दाता की जवाबदेही और नीतिगत स्वायत्तता का व्यापक प्रश्न उठता है।
- अतः मूल प्रश्न केवल ‘विदेशी वित्तपोषण बनाम कोई विदेशी वित्तपोषण नहीं’ का नहीं है, बल्कि संस्थागत स्वतंत्रता के साथ पारदर्शी वित्तपोषण सुनिश्चित करने का है।
विदेशी वित्तपोषण से संबंधित प्रमुख विधायी उपाय
- FCRA, 1976: विदेशी धन के घरेलू राजनीतिक और सामाजिक प्रक्रियाओं को प्रभावित करने की आशंकाओं के बीच इसे लागू किया गया।
- FCRA, 2010: इसने 1976 के कानून का स्थान लिया तथा विदेशी अंशदान के लिए अधिक विस्तृत नियामक ढाँचा स्थापित किया।
- FCRA संशोधन, 2020: अनुपालन संबंधी आवश्यकताओं को अधिक कठोर बनाया गया, जिसमें विदेशी अंशदान के हस्तांतरण और प्रशासनिक व्यय पर प्रतिबंध शामिल थे।
- FCRA संशोधन विधेयक, 2026: संगठन का पंजीकरण समाप्त होने की स्थिति में विदेशी अंशदान और उससे निर्मित परिसंपत्तियों से संबंधित अतिरिक्त उपाय प्रस्तावित करता है।
प्रस्तावित FCRA संशोधन विधेयक, 2026 क्या परिवर्तन करना चाहता है?
- एक महत्वपूर्ण प्रस्ताव उस स्थिति में विदेशी अंशदान तथा उससे निर्मित परिसंपत्तियों के प्रबंधन से संबंधित है, जब किसी संगठन का FCRA प्रमाणपत्र रद्द, समर्पित या समाप्त हो जाता है।
- प्रस्तावित व्यवस्था के अंतर्गत:
- ऐसी निधियाँ और परिसंपत्तियाँ प्रारंभ में सरकार द्वारा नियुक्त ‘नामित प्राधिकरण’ में निहित हो जाएँगी।
- यदि निर्धारित अवधि के अंदर पंजीकरण पुनर्स्थापित हो जाता है, तो परिसंपत्तियाँ और अप्रयुक्त अंशदान वापस किए जा सकते हैं।
- यदि निर्धारित अवधि के भीतर नया प्रमाणपत्र प्राप्त नहीं किया जाता है, तो परिसंपत्तियों को बेचा या किसी सरकारी विभाग को हस्तांतरित किया जा सकता है।
- ऐसी परिसंपत्तियों के निपटान से प्राप्त राशि भारत की संचित निधि में जमा की जाएगी।
- विधेयक जिला न्यायाधीश के समक्ष पुनरीक्षण और अपील का प्रावधान करता है।
- यह उपाय इसलिए आवश्यक माना गया है ताकि विदेशी वित्तपोषण से निर्मित परिसंपत्तियाँ प्रभावी नियामक नियंत्रण से बाहर न रहें।
प्रस्तावित परिवर्तनों से संबंधित प्रमुख चिंताएँ
- नागरिक समाज पर प्रभाव: नागरिक-समाज समूहों को आशंका है कि कठोर विनियमन वैध NGO को हतोत्साहित कर सकता है तथा स्वतंत्र सामाजिक कार्रवाई के लिए उपलब्ध अवसरों को सीमित कर सकता है।
- धार्मिक तटस्थता: कुछ संगठनों ने आशंका व्यक्त की है कि यह ढाँचा धार्मिक अल्पसंख्यकों से संबंधित क्षेत्रों में कार्य करने वाले संगठनों को असमान रूप से प्रभावित कर सकता है।
- हालाँकि, सरकार ने विदेशी वित्तपोषण के दुरुपयोग को लेकर चिंताएँ व्यक्त की हैं, जिनमें धर्मांतरण के लिए इसके संभावित उपयोग का मुद्दा भी शामिल है।
- कल्याणकारी सेवाओं का वितरण: अनेक NGO विद्यालयों, अस्पतालों, वृद्धाश्रमों और ग्रामीण विकास कार्यक्रमों का संचालन करते हैं।
- पूर्वोत्तर तथा जनजातीय क्षेत्रों के कुछ हिस्सों में ऐसी संस्थाएँ आवश्यक सेवाओं के कुछ चुनिंदा या एकमात्र प्रदाताओं में शामिल हो सकती हैं।
- संपत्ति अधिकार और आनुपातिकता: परिसंपत्तियों का स्वतः या लंबे समय तक निहित रहना उचित प्रक्रिया, आनुपातिकता और प्रभावी उपचार के अधिकार से संबंधित प्रश्न उठाता है, विशेषकर तब जब पंजीकरण नियामक कारणों से रद्द या समाप्त हो जाता है।
अन्य मुद्दे एवं चिंताएँ
- उपलब्ध आँकड़ों के अनुसार, 2015 से अब तक 22,496 NGO के पंजीकरण रद्द किए जा चुके हैं, जिसके बाद लगभग 14,466 सक्रिय पंजीकृत संघ विदेशी अंशदान प्राप्त करने के लिए पात्र रह गए हैं।
- इसी समय, भारत का घरेलू परोपकारी पारिस्थितिकी तंत्र भी विस्तार कर रहा है।
- वित्त वर्ष 2025 में निजी परोपकार का अनुमानित आकार ₹1.43 लाख करोड़ था, जबकि खुदरा स्तर पर दान लगभग ₹37,000 करोड़ वार्षिक रहने का अनुमान था।
- सूचीबद्ध कंपनियों द्वारा CSR व्यय वित्त वर्ष 2025 में कथित रूप से ₹22,563 करोड़ तक पहुँच गया, जो 17.5% की वृद्धि दर्शाता है।
- हालाँकि, मांग अभी भी उपलब्ध संसाधनों से अधिक है और परोपकार का नया स्वरूप पारंपरिक कल्याणकारी सेवाओं के बजाय तीव्रता से वैज्ञानिक अनुसंधान, उच्च शिक्षा और पारिस्थितिकी तंत्र के निर्माण की ओर बढ़ रहा है।
आगे की राह: संतुलित FCRA ढाँचा
- भारत को ऐसे ढाँचे की आवश्यकता है जो एक साथ राष्ट्रीय सुरक्षा, वित्तीय पारदर्शिता और लोकतांत्रिक नागरिक समाज की रक्षा करे। इसके लिए:
- FCRA के नियमों को समान रूप से और धर्म-निरपेक्ष तरीके से लागू किया जाए।
- व्यापक प्रतिबंध लगाने के बजाय जोखिम-आधारित लेखापरीक्षण को सुदृढ़ किया जाए।
- परिसंपत्तियों को स्थायी रूप से निहित करने से पहले समयबद्ध नोटिस, सुनवाई और प्रभावी अपीलीय उपचार उपलब्ध कराया जाए।
- विदेशी अंशदान और उसके उपयोग के डिजिटल प्रकटीकरण के माध्यम से पारदर्शिता बढ़ाई जाए।
- NGO के वित्तपोषण में विविधता लाने के लिए घरेलू परोपकार, CSR और सामुदायिक दान को प्रोत्साहित किया जाए।
- सरकार, दाताओं और नागरिक-समाज संगठनों के बीच रचनात्मक संवाद को बढ़ावा दिया जाए।
निष्कर्ष
- एक सशक्त लोकतंत्र के लिए जवाबदेह सरकार के साथ-साथ एक स्वतंत्र नागरिक समाज भी आवश्यक है। विदेशी वित्तपोषण को न तो स्वाभाविक रूप से लाभकारी और न ही स्वाभाविक रूप से खतरनाक माना जा सकता है। उद्देश्य यह होना चाहिए कि वैध संस्थाओं को कमजोर किए बिना अवैध विदेशी प्रभाव को रोका जाए, विशेषकर उन संस्थाओं को जो आवश्यक सार्वजनिक सेवाएँ प्रदान करती हैं।
- अंततः, एक अधिक सुदृढ़ घरेलू परोपकारी पारिस्थितिकी तंत्र विदेशी सहायता पर अत्यधिक निर्भरता को कम कर सकता है, जबकि भारत के लोकतांत्रिक विकास के लिए आवश्यक बहुलवाद और संस्थागत स्वतंत्रता को बनाए रखा जा सकता है।
| दैनिक मुख्य परीक्षा अभ्यास प्रश्न [प्रश्न]: FCRA संशोधन विधेयक, 2026 में प्रस्तावित परिवर्तनों के औचित्य तथा NGO और कल्याणकारी सेवाओं के वितरण पर उनके प्रभावों की चर्चा कीजिए। एक ऐसे पारदर्शी, किंतु सक्षमकारी नियामक ढाँचे को सुनिश्चित करने के लिए आवश्यक उपाय सुझाइए। |
स्रोत: TH