पाठ्यक्रम: GS3/अर्थव्यवस्था
संदर्भ
- भारत का वस्त्र क्षेत्र वर्ष 2030 तक 350 अरब डॉलर का उद्योग बनने का लक्ष्य रखता है, जिससे निर्यात प्रतिस्पर्धा, बाजार तक पहुँच, संसाधन दक्षता तथा रोजगार-आधारित उत्तरदायी विकास के लिए सततता को केंद्रीय महत्व प्राप्त हो रहा है।
भारत के वस्त्र क्षेत्र के बारे में
- भारत का वस्त्र एवं परिधान क्षेत्र रेशे, सूत, कपड़े, प्रसंस्करण, परिधान, तकनीकी वस्त्र तथा तैयार वस्तुओं तक विस्तृत है और प्रत्यक्ष रूप से 4.9 करोड़ से अधिक लोगों की आजीविका का समर्थन करता है।
- भारत का घरेलू बाजार लगभग 196 अरब डॉलर का है, जिसके वर्ष 2030 तक 250 अरब डॉलर तक पहुँचने का अनुमान है, जबकि वस्त्र निर्यात का लक्ष्य 100 अरब डॉलर रखा गया है।
- प्रधानमंत्री मोदी का ‘पर्यावरण एवं सशक्तीकरण के लिए फैशन’ का दृष्टिकोण उभरती हुई कार्यपद्धति को दर्शाता है। इसके अनुसार सततता को केवल पर्यावरणीय दायित्व के रूप में नहीं, बल्कि औद्योगिक प्रतिस्पर्धा के एक महत्वपूर्ण घटक के रूप में देखा जा रहा है।
- भारत की जलवायु प्रतिबद्धताएँ, जैसे 500 गीगावाट गैर-जीवाश्म विद्युत क्षमता, ऊर्जा आवश्यकताओं का 50% नवीकरणीय ऊर्जा से पूरा करना तथा 2070 तक शुद्ध-शून्य उत्सर्जन का लक्ष्य, कम-कार्बन आधारित वस्त्र उत्पादन की दिशा में संक्रमण को और सुदृढ़ करते हैं।
भारत के वस्त्र क्षेत्र से संबंधित चिंताएँ एवं मुद्दे
- सततता: वस्त्र प्रसंस्करण में विशेष रूप से जल, ऊर्जा और रसायनों की अत्यधिक खपत होती है। वैश्विक ब्रांड सतत आपूर्ति शृंखलाओं की बढ़ती मांग कर रहे हैं।
- निर्यात बाजार पुनर्चक्रित सामग्री, अनुरेखणीयता, रसायनों, जल एवं ऊर्जा के उपयोग से संबंधित आवश्यकताओं को लगातार अधिक कठोर बना रहे हैं।
- वस्त्र अपशिष्ट: 2026 में वस्त्र मंत्रालय द्वारा 15 राज्यों और 250 से अधिक हितधारकों के साथ किए गए अध्ययन के अनुसार वार्षिक वस्त्र अपशिष्ट लगभग 70.73 लाख टन होने का अनुमान है।
- उपभोक्ता-उपरांत अपशिष्ट का अंतर: उपभोक्ता-उपरांत वस्त्र अपशिष्ट का संग्रह, पृथक्करण एवं पुनर्चक्रण अभी भी अपर्याप्त है। यद्यपि 70% से अधिक वस्त्र अपशिष्ट का पुनर्प्राप्ति किया जाता है और उपभोक्ता-पूर्व अपशिष्ट की पुनर्प्राप्ति 95% से अधिक है, फिर भी उपभोक्ता-उपरांत अपशिष्ट के संग्रह, पृथक्करण तथा आर्थिक रूप से व्यवहार्य पुनर्प्राप्ति की स्थिति अपेक्षाकृत कमजोर है।
- सूक्ष्म, लघु एवं मध्यम उद्यमों की बाधाएँ: छोटी इकाइयों को प्रायः हरित प्रौद्योगिकियों, वित्त, तकनीकी विशेषज्ञता तथा विश्वसनीय सततता संबंधी आँकड़ों तक सीमित पहुँच का सामना करना पड़ता है।
- वैश्विक अनुपालन: निर्यात बाजारों में अनुरेखणीयता, पुनर्चक्रित सामग्री, रासायनिक सुरक्षा तथा जल, ऊर्जा एवं कार्बन पदचिह्न को कम करने की आवश्यकताओं में लगातार वृद्धि हो रही है।
- मिश्रित वस्त्र: मिश्रित रेशों एवं गैर-पुनर्चक्रणीय सामग्रियों के कारण रेशों की पुनर्प्राप्ति तकनीकी एवं आर्थिक रूप से कठिन हो जाती है।
भारत के लिए उपलब्ध लाभ
- भारत के पास पर्याप्त विनिर्माण आधार, विविध कच्चा माल, तकनीकी क्षमताएँ तथा एक स्थापित पुनर्चक्रण पारिस्थितिकी तंत्र उपस्थित है।
- रफूगरी, कांथा, गोधड़ी, चिंदी की दरियाँ और खेस बुनाई जैसी परंपराओं के माध्यम से चक्रीयता की भारत में गंभीर सांस्कृतिक आधार भी हैं।
- वस्त्र पुनर्चक्रण बाजार के वर्ष 2030 तक लगभग 3.5 अरब डॉलर तक पहुँचने की संभावना है। इससे संग्रह, छँटाई, पुनर्चक्रण, मरम्मत एवं पुनरुपयोग के क्षेत्रों में लगभग एक लाख हरित रोजगार सृजित हो सकते हैं।
संबंधित प्रमुख प्रयास एवं पहल
- चक्रीय अर्थव्यवस्था एवं अपशिष्ट प्रबंधन: विभिन्न शहरों में वस्त्र पुनर्प्राप्ति सुविधाओं का प्रायोगिक स्तर पर संचालन किया जा रहा है।
- नवी मुंबई में एक प्रायोगिक परियोजना के माध्यम से 3,323 किलोग्राम से अधिक वस्त्र अपशिष्ट को भराव क्षेत्र में भेजे जाने या भस्मीकरण से बचाया गया तथा 12,000 से अधिक परिवारों तक पहुँच बनाई गई।
- अपसाइकल्ड टेक्सटाइल मार्क के अंतर्गत 31 पुनरुपयोगकर्ताओं को प्रमाणित किया गया है; सरकारी ई-बाजार (GeM) पर 27 श्रेणियों के 40 उत्पाद उपलब्ध हैं।
- स्वच्छ उत्पादन: संयुक्त राष्ट्र औद्योगिक विकास संगठन (UNIDO), वैश्विक पर्यावरण सुविधा (GEF) तथा अन्य भागीदारों के साथ एक कार्यक्रम के अंतर्गत प्रत्यक्ष रूप से 10,530 टन विषैले रसायनों तथा अप्रत्यक्ष रूप से 21,000 टन विषैले रसायनों में कमी लाने का लक्ष्य है। इसके अतिरिक्त प्रत्यक्ष रूप से 1,47,000 टन तथा अप्रत्यक्ष रूप से 2,94,000 टन कार्बन डाइऑक्साइड समतुल्य उत्सर्जन को कम करने का लक्ष्य रखा गया है।
- इससे प्रत्यक्ष रूप से 40,000 लोगों तक पहुँचने की अपेक्षा है, जिनमें 60% महिलाएँ होंगी।
- पीएम मित्र: लगभग 10 अरब डॉलर के अपेक्षित निवेश वाले सात पीएम मित्र पार्कों में एकीकृत जल, अपशिष्ट जल तथा साझा प्रसंस्करण अवसंरचना विकसित करने की परिकल्पना की गई है।
- राष्ट्रीय तकनीकी वस्त्र मिशन: यह अपशिष्ट से रेशा बनाने वाली प्रौद्योगिकियों को समर्थन देता है। वहीं, आईआईटी दिल्ली का पानीपत परिसर एरामिड रेशा अपशिष्ट जैसी सामग्रियों के पुनर्चक्रण पर शोध कर रहा है।
अन्य संबंधित प्रयास
- ईएसजी कार्यबल प्रमाणन, क्लस्टर स्तर पर मार्गदर्शन, क्षमता निर्माण, सतत फैशन प्रौद्योगिकी, कृत्रिम बुद्धिमत्ता तथा डिजिटल अनुरेखणीयता के क्षेत्रों में कार्य करता है।
- यूरोपीय संघ-भारत संसाधन दक्षता एवं चक्रीय अर्थव्यवस्था पहल (EU-I RECEI) ने वस्त्र अपशिष्ट के आकलन, तमिलनाडु के लिए चक्रीय अर्थव्यवस्था संबंधी कार्ययोजना, पानीपत के सूक्ष्म, लघु एवं मध्यम उद्यमों के लिए कार्य-उपकरण तथा वस्त्र पुनर्प्राप्ति सुविधाओं के लिए मानक संचालन प्रक्रियाओं को समर्थन दिया है।
- टेक्स-इको पहल: केंद्रीय बजट 2026–27 में प्रस्तावित इस पहल के माध्यम से चार प्रमुख स्तंभों के तहत वस्त्र क्षेत्र के विकास में सततता को एकीकृत करने की परिकल्पना की गई है:
- संसाधन पुनर्प्राप्ति एवं पुनर्चक्रण
- जल संरक्षण एवं कार्बन उत्सर्जन में कमी
- संस्थागत क्षमता
- नवाचार एवं डिजिटलीकरण
- इसमें भारत सततता चिह्न शुरू करने का प्रस्ताव है।
आगे की राह
- भारत को प्रायोगिक परियोजनाओं से आगे बढ़कर व्यापक स्तर पर लागू किए जा सकने वाले, मापनीय एवं बाजार से जुड़े समाधानों की ओर बढ़ने की आवश्यकता है।
- प्रमुख प्राथमिकताओं में उपभोक्ता-उपरांत अपशिष्ट का बेहतर संग्रह, प्रतिलोम आपूर्ति व्यवस्था, मिश्रित रेशों का पुनर्चक्रण, सूक्ष्म, लघु एवं मध्यम उद्यमों के लिए सुलभ हरित वित्त, नवीकरणीय ऊर्जा, स्वच्छ रसायन, शून्य द्रव निर्वहन (ZLD) प्रणालियाँ तथा विश्वसनीय ईएसजी अनुरेखणीयता शामिल होनी चाहिए।
- उद्देश्य एक न्यायसंगत संक्रमण सुनिश्चित करना होना चाहिए, जिसमें पर्यावरणीय लाभों के साथ श्रमिक कल्याण, औपचारिकीकरण तथा हरित रोजगार को भी जोड़ा जाए।
- इसलिए, सततता को वस्त्र क्षेत्र के विकास में बाधा बनने की आवश्यकता नहीं है; बल्कि यह संसाधन उत्पादकता, निर्यात बाजार तक पहुँच, नवाचार तथा क्षेत्र की प्रत्यास्थता को बेहतर बना सकती है।
| दैनिक मुख्य परीक्षा अभ्यास प्रश्न [प्रश्न]: भारत के वस्त्र क्षेत्र के विकास को सतत बनाने में आने वाली प्रमुख चुनौतियों पर चर्चा कीजिए तथा क्षेत्र की वैश्विक प्रतिस्पर्धात्मकता को बढ़ाने में चक्रीय अर्थव्यवस्था, हरित प्रौद्योगिकियों एवं सूक्ष्म, लघु एवं मध्यम उद्यम (MSME) केंद्रित नीतिगत हस्तक्षेपों की भूमिका का परीक्षण कीजिए। |
स्रोत: BL