पाठ्यक्रम: GS3/सुरक्षा
संदर्भ
- आतंकवाद का स्वरूप बड़े एवं केंद्रीकृत पदानुक्रमित संगठनों से बदलकर विकेंद्रीकृत नेटवर्कों में परिवर्तित हो गया है, जो ड्रोन, साइबर उपकरणों और उभरती प्रौद्योगिकियों का उपयोग कर रहे हैं। इस बदलते स्वरूप के कारण भारत को आतंकवाद-रोधी एक व्यापक रणनीति अपनाने की आवश्यकता हुई है।
आतंकवाद का विकास
- पदानुक्रमित नेटवर्कों से विकेंद्रीकृत मॉड्यूल तक: 11 सितंबर, 2001 के अल-कायदा हमलों ने वैश्विक आतंकवाद-रोधी प्रयासों की दिशा को मूल रूप से बदल दिया। इसके बाद के दशकों में केंद्रीकृत आतंकवादी संगठनों की संरचना कमजोर हुई।
- ओसामा बिन लादेन और अबू बक्र अल-बगदादी जैसे व्यक्तियों के नेतृत्व वाले संगठनों के साथ-साथ छोटे स्वायत्त मॉड्यूल तथा एकल-आतंकवादी हमलों का भी उदय हुआ।
- प्रौद्योगिकी एक शक्ति-वर्धक कारक के रूप में: आतंकवादी नेटवर्क भर्ती, प्रचार, वित्तपोषण और अभियानों के लिए ड्रोन, एन्क्रिप्टेड संचार, सोशल मीडिया, त्वरित संदेश सेवाओं, डार्क वेब, क्रिप्टो-वॉलेट तथा साइबर क्षमताओं का बढ़ता हुआ उपयोग कर रहे हैं।
- गृह मंत्रालय की राष्ट्रीय आतंकवाद-रोधी नीति एवं रणनीति में रोबोटिक्स, साइबर हमलों तथा CBRNED सामग्रियों [रासायनिक , जैविक , रेडियोलॉजिकल , परमाणु , विस्फोटक एवं डिजिटल ] से उत्पन्न जोखिमों की पहचान की गई है।
भारत का प्रारंभिक अनुभव
- बहुआयामी एवं बदलते हुए खतरे: भारत में सीमा-पार आतंकवाद का स्वरूप 1990 के दशक के प्रारंभ में कश्मीर में अधिक तीव्र हुआ।
- वर्ष 1991 में श्रीपेरंबदूर में लिट्टे (LTTE) द्वारा राजीव गांधी की हत्या ने प्रदर्शित किया कि आतंकवाद केवल कश्मीर तक सीमित नहीं था।
- मुंबई सिलसिलेवार बम विस्फोट (1993) तथा IC-814 का अपहरण (दिसंबर, 1999) ने पाकिस्तान के साथ आतंकवादी गतिविधियों के संबंध को अधिक स्पष्ट किया। भारत ने 160 से अधिक बंधकों के बदले अहमद उमर शेख और मसूद अजहर सहित आतंकवादियों को रिहा किया।
- संसद पर हमला (दिसंबर, 2001), जिसका आरोप पाकिस्तान स्थित जैश-ए-मोहम्मद (JeM) पर लगाया गया, के परिणामस्वरूप ऑपरेशन पराक्रम चलाया गया, जिसमें बड़े पैमाने पर सैन्य लामबंदी की गई।
- अन्य प्रमुख आतंकवादी हमलों में अक्षरधाम (2002), वाराणसी (2006), जर्मन बेकरी, पुणे (2010) तथा दिल्ली में लाल किला (2000), सिलसिलेवार बाजार विस्फोट (2005), दिल्ली विस्फोट (2008) और दिल्ली उच्च न्यायालय विस्फोट (2011) शामिल थे, जिसमें 15 लोगों की मृत्यु हुई।
- हालाँकि, परमाणु प्रतिरोध तथा संघर्ष के बढ़ने के जोखिम के कारण अंतरराष्ट्रीय कूटनीतिक हस्तक्षेप हुआ और लगभग दो वर्षों के बाद अंततः दोनों पक्षों ने सैन्य गतिरोध समाप्त किया।
भारत: रणनीतिक संयम से सीमा-पार कार्रवाई तक
- उरी एवं सर्जिकल स्ट्राइक: सितंबर, 2016 में जैश-ए-मोहम्मद के आतंकवादियों द्वारा किए गए उरी हमले के बाद भारत ने नियंत्रण रेखा (LoC) के पार आतंकवादी लॉन्च पैडों के विरुद्ध सर्जिकल स्ट्राइक की।
- पुलवामा एवं बालाकोट: फरवरी, 2019 में CRPF के काफिले पर हुए पुलवामा हमले के बाद भारतीय वायु सेना (IAF) ने बालाकोट में जैश-ए-मोहम्मद के एक शिविर पर हवाई हमले किए। यह आतंकवादी लक्ष्य के विरुद्ध पाकिस्तानी हवाई क्षेत्र में भारतीय वायु सेना की पहली ऐसी कार्रवाई थी।
- पहलगाम एवं ऑपरेशन सिंदूर: अप्रैल, 2025 में हुए पहलगाम आतंकवादी हमले के बाद ऑपरेशन सिंदूर चलाया गया।
- भारत का दृष्टिकोण मुख्यतः कूटनीतिक एवं रक्षात्मक प्रतिक्रियाओं से विकसित होकर खुफिया-आधारित आतंकवाद-निवारण तथा सुनियोजित एवं संतुलित सीमा-पार कार्रवाई के संयोजन की ओर बढ़ा है।
संबंधित प्रयास एवं पहल
- वैश्विक स्तर:
- संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद के आतंकवाद-रोधी तंत्र तथा आतंकवादी संगठनों/व्यक्तियों के नामांकन एवं प्रतिबंध संबंधी व्यवस्थाएँ।
- आतंकवादी वित्तपोषण, प्रत्यर्पण तथा खुफिया सूचनाओं के आदान-प्रदान के संबंध में अंतरराष्ट्रीय सहयोग।
- वित्तीय कार्रवाई कार्यबल (FATF) की कार्रवाई: वर्ष 2010 में FATF का सदस्य बनने के बाद भारत ने आतंकवादी वित्तपोषण के विरुद्ध वैश्विक कार्रवाई को सुदृढ़ करने तथा राज्य-प्रायोजित आतंकवाद को उजागर करने के लिए FATF मंच का सक्रिय रूप से उपयोग किया है।
- ‘नो मनी फॉर टेरर’ मंत्रिस्तरीय सम्मेलन (2018–19): भारत ने आतंकवाद पर व्यापक अभिसमय (CCIT) को शीघ्र अपनाने का आह्वान किया तथा FATF मानकों के निष्पक्ष एवं गैर-राजनीतिक प्रवर्तन का समर्थन किया।
- INTERPOL के साथ समन्वय: BHARATPOL पोर्टल, भारत में INTERPOL के राष्ट्रीय केंद्रीय ब्यूरो के रूप में कार्यरत केंद्रीय अन्वेषण ब्यूरो (CBI) को देश की सभी कानून-प्रवर्तन एजेंसियों के साथ एकल मंच पर जोड़ता है। इसके अंतर्गत अंतरराष्ट्रीय संगठित अपराध, मादक पदार्थों की तस्करी, हथियार, साइबर अपराध, आर्थिक धोखाधड़ी, बाल अश्लील सामग्री तथा आतंकवाद सहित विभिन्न क्षेत्रों को शामिल किया गया है।
भारत का उभरता व्यापक दृष्टिकोण एवं रणनीति
- गैरकानूनी गतिविधियाँ (रोकथाम) संशोधन अधिनियम, 2019: इसने केंद्र सरकार एवं जाँच एजेंसियों की शक्तियों का विस्तार करके भारत के आतंकवाद-रोधी कानूनी ढाँचे को सुदृढ़ किया।

- राष्ट्रीय अन्वेषण अभिकरण (NIA) संशोधन अधिनियम, 2019: इसका उद्देश्य NIA के क्षेत्राधिकार एवं अधिदेश का विस्तार करना है। इसके अंतर्गत NIA को भारत के हितों के विरुद्ध विदेशों में किए गए आतंकवाद-संबंधी अपराधों की जाँच करने में सक्षम बनाया गया है।
- धन शोधन निवारण अधिनियम (PMLA) के प्रावधानों का सुदृढ़ीकरण: इन प्रावधानों ने प्रवर्तन निदेशालय (ED) को आतंकवाद से संबद्ध परिसंपत्तियों का पता लगाने, उन्हें फ्रीज करने तथा जब्त करने के लिए अधिक प्रभावी साधन उपलब्ध कराए हैं।
- भारतीय न्याय संहिता (BNS), 2023: प्रथम बार आतंकवाद एवं संगठित अपराध को परिभाषित किया गया है तथा नए आपराधिक कानूनों के अंतर्गत इनके लिए कठोर दंड के प्रावधान किए गए हैं।
- आयुध (संशोधन) अधिनियम, 2019: इसने अवैध हथियार नेटवर्क को लक्षित करके आतंकवाद, उग्रवाद एवं संगठित अपराध के विरुद्ध भारत की प्रतिक्रिया को सुदृढ़ किया।

- राष्ट्रीय आतंकवाद-रोधी नीति एवं रणनीति (PRAHAAR): यह सात प्रमुख स्तंभों पर आधारित एक व्यापक ढाँचा प्रदान करती है:
- आतंकवादी हमलों की रोकथाम;
- त्वरित एवं आनुपातिक प्रतिक्रिया;
- संपूर्ण-सरकार दृष्टिकोण के माध्यम से आंतरिक क्षमताओं का एकीकरण;
- मानवाधिकार एवं विधि के शासन पर आधारित प्रक्रियाएँ;
- कट्टरपंथीकरण के लिए अनुकूल परिस्थितियों का समाधान;
- अंतरराष्ट्रीय सहयोग; तथा
- संपूर्ण-समाज दृष्टिकोण के माध्यम से पुनर्प्राप्ति एवं प्रत्यास्थता।
- यह आतंकवादियों एवं उनके वित्तपोषकों, सहयोगियों, ओवरग्राउंड वर्कर्स, हथियार नेटवर्क तथा डिजिटल प्रचार तंत्रों को लक्षित करती है।
- इसमें खुफिया एजेंसियों, पुलिस, केंद्रीय सशस्त्र पुलिस बलों (CAPFs), NIA तथा राष्ट्रीय सुरक्षा गार्ड (NSG) के बीच समन्वय पर बल दिया गया है।
आगे की राह
- केंद्र, राज्यों एवं सुरक्षा एजेंसियों के बीच वास्तविक समय में खुफिया सूचनाओं के एकीकरण को सुदृढ़ करना।
- सभी राज्यों/केंद्रशासित प्रदेशों में एकरूप आतंकवाद-रोधी/आतंकवाद-रोधी दस्ता (CT/ATS) संरचनाओं, संसाधनों, प्रशिक्षण एवं जाँच क्षमताओं का विकास करना।
- ड्रोन-रोधी, साइबर तथा AI-सक्षम खतरा-पहचान क्षमताओं को बढ़ाना।
- घरेलू एवं अंतरराष्ट्रीय स्तर पर सुदृढ़ सहयोग के माध्यम से आतंकवादी वित्तपोषण को बाधित करना।
- संवैधानिक अधिकारों की सुरक्षा सुनिश्चित करते हुए कट्टरपंथ-निवारण, प्रतिवादात्मक विमर्श , शिक्षा एवं सामुदायिक सहभागिता को बढ़ावा देना।
- जाँच में विधि विशेषज्ञों की प्रारंभिक सहभागिता के माध्यम से अभियोजन को सुदृढ़ करना।
- सुरक्षित पनाहगाहों, आतंकवादी वित्तपोषण, हथियारों तथा डिजिटल पारिस्थितिकी तंत्र के विरुद्ध अंतरराष्ट्रीय सहयोग को गंभीर करना।
- राष्ट्रीय सुरक्षा, आनुपातिकता, मानवाधिकार तथा विधि के शासन के बीच संतुलन बनाए रखना।
निष्कर्ष
- 11 सितंबर, 2001 के हमलों के 25 वर्ष बाद भी आतंकवाद समाप्त नहीं हुआ है; बल्कि यह अधिक विखंडित, प्रौद्योगिकी-आधारित एवं अंतरराष्ट्रीय स्वरूप वाला हो गया है।
- परिणामस्वरूप, भारत की आतंकवाद-रोधी संरचना प्रतिक्रियात्मक सुरक्षा व्यवस्था से आगे बढ़कर एक एकीकृत मॉडल की ओर अग्रसर हो रही है, जिसमें रोकथाम, खुफिया जानकारी, प्रतिक्रिया, अंतरराष्ट्रीय सहयोग, कट्टरपंथ-निवारण तथा सामाजिक प्रत्यास्थता को समाहित किया गया है। यही PRAHAAR का मूल तर्क है।
| दैनिक मुख्य परीक्षा अभ्यास प्रश्न [प्रश्न]: आतंकवाद के बदलते स्वरूप का परीक्षण कीजिए तथा रणनीतिक संयम से लेकर PRAHAAR के अंतर्गत एक व्यापक एवं खुफिया-आधारित दृष्टिकोण तक भारत की आतंकवाद-रोधी रणनीति के विकास का विश्लेषण कीजिए। |
स्रोत: TH
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भारत की आतंकवाद-रोधी रणनीति