पाठ्यक्रम: GS1/भूगोल; GS3/कृषि; आपदा प्रबंधन; विज्ञान और प्रौद्योगिकी
संदर्भ
- AI, उच्च-प्रदर्शन कंप्यूटिंग और जलवायु विज्ञान में तीव्र प्रगति भारत के मानसून के पूर्वानुमान के लिए नई संभावनाएँ प्रशस्त कर रही है, जबकि जलवायु परिवर्तन के कारण चरम वर्षा की घटनाओं का पूर्वानुमान लगाना निरंतर अधिक कठिन होता जा रहा है।
भारत में मानसून की पूर्वानुमेयता के बारे में
- भारतीय ग्रीष्मकालीन मानसून एक अत्यंत जटिल जलवायु प्रणाली है। इसका व्यवहार स्थल–समुद्र तापीय विषमता, हिंद महासागर और प्रशांत महासागर के समुद्र-सतह तापमान, हिमालय की स्थलाकृति, वायुमंडलीय परिसंचरण, ग्रीनहाउस गैसों एवं एरोसोल से प्रभावित होता है।
- मानसून की पूर्वानुमेयता पूर्वानुमान की समय-सीमा पर भी निर्भर करती है।
- 3–10 दिनों के पूर्वानुमान किसानों के लिए बुवाई, सिंचाई और फसल कटाई संबंधी निर्णयों हेतु अत्यंत महत्वपूर्ण हैं।
- उप-मौसमी पूर्वानुमान मानसून के सक्रिय और विराम चरणों का पूर्वानुमान लगाने में सहायता करते हैं।
- दशकीय और दीर्घकालिक पूर्वानुमान जलाशयों, जल निकासी प्रणालियों और सिंचाई नेटवर्क जैसे बुनियादी ढाँचे के लिए आवश्यक हैं।
- एक प्रमुख कठिनाई वायुमंडलीय मॉडलों और वास्तविक वर्षा प्रक्रियाओं के बीच पैमाने के अंतर की है।
- मानसून की अधिकांश वर्षा के लिए उत्तरदायी संवहनीय बादल केवल कुछ किलोमीटर के क्षेत्र में फैले हो सकते हैं, जबकि वैश्विक जलवायु मॉडल सामान्यतः इससे कहीं अधिक मोटे स्थानिक रिज़ॉल्यूशन पर कार्य करते हैं।
- इसलिए बादल निर्माण, अशांति और एरोसोल–बादल अंतःक्रियाओं जैसी प्रक्रियाओं का लगभग अनुमान लगाकर मॉडल में निरूपण करना पड़ता है।
मानसून की पूर्वानुमेयता से संबंधित प्रमुख पैरामीटर
- स्थल–समुद्र तापीय विषमता : भारतीय भूभाग और आसपास के महासागरों के असमान तापन से मौसमी मानसूनी परिसंचरण संचालित होता है।
- महासागरीय परिस्थितियाँ : हिंद महासागर और प्रशांत महासागर के समुद्र-सतह तापमान, जिसमें ENSO से संबंधित परिवर्तनशीलता भी शामिल है, मानसूनी परिसंचरण और वर्षा को प्रभावित करते हैं।
- हिमालयी स्थलाकृति : हिमालय वायुमंडलीय परिसंचरण के लिए एक प्रमुख अवरोध के रूप में कार्य करता है और दक्षिण एशियाई मानसून को आकार देने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है।
- एरोसोल : औद्योगिक गतिविधियों, जैव-द्रव्य के दहन और अन्य स्रोतों से उत्पन्न एरोसोल विकिरण तथा बादल की सूक्ष्म भौतिकी को प्रभावित कर सकते हैं। मानसूनी वर्षा पर उनका कुल प्रभाव अभी भी वैज्ञानिक अनिश्चितता का एक महत्वपूर्ण क्षेत्र बना हुआ है।
- वायुमंडलीय आर्द्रता और संवहन : वर्षा मुख्य रूप से आर्द्रता की उपलब्धता, वायुमंडलीय अस्थिरता और संवहनीय प्रणालियों के संगठन पर निर्भर करती है।
- इन छोटे पैमाने की प्रक्रियाओं का अनुकरण करना विशेष रूप से कठिन है।
मानसून की पूर्वानुमेयता की आवश्यकता
- बेहतर पूर्वानुमान का खाद्य, जल और आपदा सुरक्षा पर प्रत्यक्ष प्रभाव पड़ता है।
- किसानों के लिए विश्वसनीय अल्पकालिक पूर्वानुमान बुवाई, उर्वरक के प्रयोग और सिंचाई से संबंधित निर्णयों में सुधार कर सकते हैं।
- सरकारों के लिए बेहतर पूर्वानुमान जलाशय प्रबंधन, बाढ़ की तैयारी और सूखा-प्रतिक्रिया में सहायता करते हैं।
- दीर्घकालिक पूर्वानुमान भी समान रूप से महत्वपूर्ण हैं, क्योंकि आज निर्मित शहरी जल निकासी प्रणालियाँ, पुल, जलाशय और अन्य बुनियादी ढाँचे कई दशकों तक कार्यरत रह सकते हैं।
- इसलिए, इनके डिजाइन में उष्ण होती जलवायु के अंतर्गत अधिक तीव्र वर्षा की संभावना को ध्यान में रखना आवश्यक है।
वर्तमान प्रौद्योगिकियाँ और उपाय
- संख्यात्मक मौसम पूर्वानुमान : भारत मौसम विज्ञान विभाग (IMD) प्रेक्षणों को संख्यात्मक मौसम पूर्वानुमान प्रणालियों तथा अन्य पूर्वानुमान तकनीकों के साथ संयोजित करता है।
- उपग्रह प्रेक्षण, मौसम रडार, वर्षामापी और महासागरीय प्रेक्षण प्रारंभिक वायुमंडलीय सूचना की गुणवत्ता में सुधार करते हैं।
- AI और मशीन लर्निंग : AI-आधारित मौसम मॉडल पारंपरिक संख्यात्मक मॉडलों के लिए एक आशाजनक पूरक के रूप में उभर रहे हैं।
- ये बड़े ऐतिहासिक डेटासेट से वायुमंडलीय पैटर्न सीख सकते हैं और कुछ अनुप्रयोगों में पारंपरिक कम्प्यूटेशनल दृष्टिकोणों की तुलना में बहुत तीव्र गति से पूर्वानुमान उत्पन्न कर सकते हैं।
- इनके संभावित अनुप्रयोगों में वर्षा पूर्वानुमान, लू का पूर्वानुमान और उप-मौसमी मानसून पूर्वानुमान शामिल हैं।
- हालाँकि, AI मॉडल मुख्य रूप से ऐतिहासिक आँकड़ों से सीखते हैं, जिससे ऐसी जलवायु परिस्थितियों का पूर्वानुमान लगाने में कठिनाई उत्पन्न होती है जिनका ऐतिहासिक आँकड़ों में कोई निकट समान उदाहरण उपलब्ध नहीं है।
- उच्च-प्रदर्शन कंप्यूटिंग : भारत इंडियाAI मिशन जैसी पहलों तथा C-DAC जैसे संस्थानों के सहयोग से विकसित उच्च-प्रदर्शन कंप्यूटिंग अवसंरचना के माध्यम से अपनी कम्प्यूटेशनल क्षमताओं का विस्तार कर रहा है।
- GPU की बढ़ती उपलब्धता विशेष रूप से महत्वपूर्ण है, क्योंकि समान हार्डवेयर का उपयोग AI मॉडलों तथा नवीन जलवायु-मॉडलिंग दृष्टिकोणों, दोनों के लिए किया जा सकता है।
- हाइब्रिड मॉडल : दीर्घकालिक दृष्टि से सबसे आशाजनक दृष्टिकोण संभवतः भौतिकी-आधारित जलवायु मॉडलों को AI/ML तकनीकों के साथ संयोजित करना है।
- AI कम्प्यूटेशन की दृष्टि से कठिन प्रक्रियाओं के निरूपण में सहायता कर सकता है, जबकि भौतिक मॉडल ऐतिहासिक जलवायु से आगे के पूर्वानुमानों के लिए आवश्यक वैज्ञानिक ढाँचा प्रदान करते हैं।
संबंधित मुद्दे और चिंताएँ
- मॉडल पूर्वाग्रह : भारतीय मानसूनी वर्षा के स्थानिक वितरण को सटीक रूप से पुनरुत्पादित करने में जलवायु मॉडलों को ऐतिहासिक रूप से कठिनाइयों का सामना करना पड़ा है, जिसमें भूभाग और आसपास के महासागरों से संबंधित पूर्वाग्रह भी शामिल हैं।
- एरोसोल–बादल अनिश्चितता : सूक्ष्म एरोसोल कणों, बादल की बूंदों और वर्षा के बीच अंतःक्रिया में अत्यंत भिन्न स्थानिक और समय संबंधी पैमानों पर होने वाली प्रक्रियाएँ शामिल होती हैं। इनका प्रत्यक्ष निरूपण अभी भी कठिन है।
- चरम घटनाएँ : सबसे गंभीर लू और वर्षा की घटनाएँ ऐतिहासिक डेटासेट में अपेक्षाकृत दुर्लभ होती हैं। इससे पूर्णतः डेटा-आधारित AI प्रणालियों की ऐसी घटनाओं को सीखने की क्षमता सीमित हो जाती है।
- भविष्य की जलवायु अतीत जैसी नहीं है: उष्ण वायुमंडल अधिक आर्द्रता धारण कर सकता है, जिससे तीव्र वर्षण की संभावना बढ़ जाती है।
- अनुसंधान से संकेत मिलता है कि वैश्विक तापन के अंतर्गत चरम वर्षा की तीव्रता में पर्याप्त वृद्धि हो सकती है।
- हालाँकि, भारतीय मानसूनी वर्षा में भविष्य के परिवर्तनों का सटीक स्थान, परिमाण और समय अभी भी अनिश्चित है।
- मानसून का आगमन और सक्रिय–विराम चक्र : मानसून के आगमन, वापसी तथा सक्रिय और विराम चरणों की आवृत्ति या अवधि में भविष्य में होने वाले परिवर्तनों को लेकर पर्याप्त अनिश्चितता बनी हुई है।
आगे की राह: दीर्घकालिक मानसून पूर्वानुमेयता के लिए
- भारत को ‘बेहतर पूर्वानुमान लगाएँ और लचीले ढंग से निर्माण करें’ दृष्टिकोण अपनाने की आवश्यकता है।
- अधिक वर्षामापी, डॉप्लर मौसम रडार, उपग्रहों और महासागरीय बोया(Ocean Buoys) के माध्यम से प्रेक्षण प्रणालियों को सुदृढ़ करना।
- IMD, विश्वविद्यालयों, अनुसंधान संस्थानों और निजी क्षेत्र के नवोन्मेषकों को एकीकृत करना।
- उच्च-रिज़ॉल्यूशन वाले क्षेत्रीय जलवायु मॉडल विकसित करना, जो भारत की विविध भौगोलिक परिस्थितियों का बेहतर निरूपण करने में सक्षम हों।
- AI को भौतिकी-आधारित मॉडलों के साथ संयोजित करना, न कि दोनों को प्रतिस्पर्धी विकल्पों के रूप में देखना।
- एरोसोल–बादल–वर्षण अंतःक्रियाओं की बेहतर समझ विकसित करना।
- योजनाकारों और इंजीनियरों के लिए जिला-स्तरीय जलवायु जोखिम संबंधी जानकारी तैयार करना।
- किसान परामर्श सेवाओं, मोबाइल अनुप्रयोगों और पूर्व-चेतावनी प्रणालियों के माध्यम से पूर्वानुमानों की अंतिम-मील पहुँच को सुदृढ़ करना।
- अनुकूली अवसंरचना नियोजन अपनाना, ताकि वैज्ञानिक पूर्वानुमानों में सुधार होने के साथ जल निकासी, जलाशयों और बाढ़-प्रबंधन प्रणालियों को उन्नत किया जा सके।
निष्कर्ष
- भारत की मानसून संबंधी चुनौती केवल यह पूर्वानुमान लगाने तक सीमित नहीं है कि वर्षा होगी या नहीं। चुनौती यह जानने की है कि वर्षा कब, कहाँ और कितनी तीव्रता से हो सकती है तथा जलवायु के उष्ण होने के साथ इसमें किस प्रकार के परिवर्तन हो सकते हैं।
- AI और उच्च-प्रदर्शन कंप्यूटिंग अल्प और मध्यम अवधि के पूर्वानुमानों में उल्लेखनीय सुधार कर सकते हैं, लेकिन वे दीर्घकालिक जलवायु परिवर्तन से जुड़ी अनिश्चितताओं को समाप्त नहीं कर सकते।
- इसलिए, भौतिकी-आधारित मॉडल, बेहतर प्रेक्षण और AI को एक साथ कार्य करना होगा।
- किसान के लिए प्राथमिकता आने वाले दिनों के लिए अधिक उपयोगी पूर्वानुमान की है। इंजीनियर के लिए प्राथमिकता ऐसी अवसंरचना की है जो अनिश्चित भविष्य के बावजूद सुरक्षित बनी रहे।
- भारत की जलवायु प्रत्यास्थता इस बात पर निर्भर करेगी कि इन दोनों आवश्यकताओं को एक साथ संबोधित किया जाए।
| दैनिक मुख्य परीक्षा अभ्यास प्रश्न [प्रश्न: भारत में मानसून की पूर्वानुमेयता को निर्धारित करने वाले प्रमुख कारकों की चर्चा कीजिए। वर्तमान पूर्वानुमान प्रणालियों की सीमाओं का परीक्षण कीजिए तथा अल्पकालिक और दीर्घकालिक, दोनों प्रकार के मानसून पूर्वानुमानों में सुधार के लिए उपाय सुझाइए। |
स्रोत: HT
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भारत में मानसून की पूर्वानुमेयता