भारत में बीमा वितरण व्यवस्था में सुधार 

पाठ्यक्रम: GS3/अर्थव्यवस्था

संदर्भ

  • भारतीय बीमा विनियामक और विकास प्राधिकरण (IRDAI) बीमा नियामक ढाँचे की व्यापक समीक्षा कर रहा है, जिसमें वितरण व्यवस्था, मध्यस्थों के पारिश्रमिक, मूल्य निर्धारण और कॉरपोरेट प्रशासन में सुधार प्रमुख चिंताओं के रूप में उभर रहे हैं।

भारत में बीमा क्षेत्र एवं इसके वितरण के बारे में

  • बीमा भारत की वित्तीय प्रणाली का एक महत्त्वपूर्ण घटक है, जो जोखिम से सुरक्षा तथा दीर्घकालिक बचत और निवेश के लिए संसाधन उपलब्ध कराता है।
  • वित्त वर्ष 2025-26 में बीमा उद्योग की वार्षिक आय लगभग ₹13.4 लाख करोड़ रही, जिसमें ₹10 लाख करोड़ जीवन बीमा तथा ₹3.4 लाख करोड़ गैर-जीवन बीमा से प्राप्त हुए।
  • भारत में बीमा का वितरण मुख्यतः विनियमित मध्यस्थों, जैसे व्यक्तिगत एजेंट, कॉरपोरेट एजेंट, बीमा ब्रोकर, वेब एग्रीगेटर और डिजिटल माध्यमों के जरिए किया जाता है।
  • पूर्व में बीमा अधिनियम, 1938 के अंतर्गत व्यय और कमीशन पर वैधानिक प्रतिबंध लगाए गए थे।
  • IRDAI के व्यय प्रबंधन (EOM) विनियम, 2024 ने बीमाकर्ताओं को अधिक परिचालन स्वतंत्रता प्रदान करने के लिए कई उप-सीमाओं को कम किया। हालाँकि, समग्र EOM सीमा 30% निर्धारित रही।

बीमा का महत्त्व

  • वित्तीय स्थिरता: बीमा कंपनियाँ बैंकों, पूँजी बाजारों, कराधान और सरकारी प्रतिभूतियों से जुड़ी होती हैं।
  • बचत का संचारण: जीवन बीमा कंपनियाँ प्रमुख संस्थागत निवेशक तथा दीर्घकालिक निधियों की प्रदाता होती हैं।
  • जोखिम प्रबंधन: बीमा परिवारों, व्यवसायों और अवसंरचना को वित्तीय आघातों से सुरक्षा प्रदान करता है।
  • पूँजी निर्माण: बीमा निधियाँ सरकारी प्रतिभूतियों तथा अन्य अनुमोदित निवेशों में योगदान करती हैं।
  • वित्तीय समावेशन: व्यापक बीमा कवरेज स्वास्थ्य, कृषि और आजीविका संबंधी जोखिमों के प्रति लोगों की संवेदनशीलता को कम कर सकता है।
  • आर्थिक विकास: एक सुदृढ़ वित्तीय स्थिति वाला बीमा क्षेत्र उद्यमिता और उत्पादक निवेश को समर्थन प्रदान कर सकता है।

प्रमुख कानून एवं वैधानिक प्रावधान

  • बीमा अधिनियम, 1938: यह बीमा व्यवसाय को नियंत्रित करने वाला प्रमुख कानून है, जिसमें पंजीकरण, व्यवसाय संचालन और पॉलिसीधारकों की सुरक्षा से संबंधित प्रावधान शामिल हैं।
  • IRDAI अधिनियम, 1999: बीमा क्षेत्र को निजी भागीदारी के लिए उदार बनाए जाने के बाद क्षेत्रीय नियामक के रूप में IRDAI की स्थापना के लिए यह अधिनियम बनाया गया।
  • बीमा कानून (संशोधन) अधिनियम, 2015: इसने नियामक ढाँचे को सुदृढ़ किया तथा अनुमोदित विदेशी निवेश की अधिकतम सीमा में वृद्धि की।
  • IRDAI EOM विनियम, 2024: व्यय नियंत्रण को तर्कसंगत बनाया गया तथा अनेक उप-सीमाओं को एक समग्र ढाँचे से प्रतिस्थापित किया गया।
  • Ind AS एवं जोखिम-आधारित सॉल्वेंसी मानदंड: इनका उद्देश्य वित्तीय रिपोर्टिंग, जोखिम आकलन और तुलनीयता को बेहतर बनाना है।

बीमा वितरण में सुधार की आवश्यकता क्यों है?

  • वर्ष 2000 में बीमा क्षेत्र के उदारीकरण से प्रतिस्पर्धा बढ़ी और बीमाकर्ताओं ने मध्यस्थों को अधिक भुगतान तथा आक्रामक मूल्य निर्धारण के माध्यम से व्यवसाय हासिल करना शुरू किया।
  • कुछ मामलों में व्ययों को विपणन, प्रचार, यात्रा, मुद्रण या IT लागत के रूप में दर्ज किया गया, जिससे नियामक प्रतिबंधों की प्रभावशीलता कम होती है।
  • इसलिए मुद्दा केवल कमीशन की राशि तक सीमित नहीं है, बल्कि यह भी महत्त्वपूर्ण है कि पारिश्रमिक अंडरराइटिंग संबंधी निर्णयों, उत्पाद मूल्य निर्धारण और जोखिम लेने के व्यवहार को किस प्रकार प्रभावित करता है।

संबंधित प्रमुख चिंताएँ एवं मुद्दे

  • आक्रामक मूल्य निर्धारण: उच्च अधिग्रहण लागत और कम प्रीमियम के कारण अत्यधिक प्रतिस्पर्धा की स्थिति उत्पन्न हो सकती है, जिसमें कीमतों को लगातार नीचे रखने की प्रवृत्ति बढ़ती है।
    • IRDAI ने बीमाकर्ताओं को अग्नि बीमा पोर्टफोलियो में अत्यधिक छूट देने के विरुद्ध चेतावनी दी है, जिसमें मानक दरों पर कथित रूप से 99% तक की छूट शामिल है।
    • भारतीय रिज़र्व बैंक (RBI) ने अपनी जून 2026 की वित्तीय स्थिरता रिपोर्ट में तीन सार्वजनिक क्षेत्र की बीमा कंपनियों द्वारा सॉल्वेंसी संबंधी नियमों के निरंतर अनुपालन न किए जाने को रेखांकित किया।
    • लगातार कम मूल्य निर्धारण, विशेष रूप से समूह स्वास्थ्य बीमा में, तथा उच्च लागत के कारण वित्तीय दबाव और बढ़ गया है।
  • शासन संबंधी अंतर: औपचारिक कॉरपोरेट प्रशासन नीतियों और कंपनियों की वास्तविक कार्यप्रणाली के बीच अंतर दिखाई देता है।
    • बीमाकर्ता IRDAI को बोर्ड द्वारा अनुमोदित योजनाएँ प्रस्तुत करते हैं, किंतु अत्यधिक अधिग्रहण व्यय या प्रीमियम में भारी कटौती की स्थिति में आंतरिक नियंत्रण, उत्तरदायित्व और अनुपालन को लेकर प्रश्न उठते हैं।
  • संकेंद्रण जोखिम: IBAI-McKinsey के विश्लेषण के अनुसार, 462 ब्रोकरों में से 10 ब्रोकर बाजार के 70% हिस्से को नियंत्रित करते हैं, जिससे बाजार संकेंद्रण और सौदेबाजी की शक्ति को लेकर चिंताएँ उत्पन्न होती हैं।
  • दावे एवं पारदर्शिता: पोर्टफोलियो-वार दावों, लंबित विवादों और कानूनी कार्यवाहियों के सार्वजनिक प्रकटीकरण से मना करने के कारण बार-बार सामने आने वाले पैटर्न की पहचान करना कठिन हो सकता है। इनका प्रकटीकरण क्षेत्र में विश्वास की कमी को दूर करने में सहायता कर सकता है।
  • सॉल्वेंसी एवं निवेश संबंधी जोखिम: निरंतर घाटे जोखिम-संवेदनशील सॉल्वेंसी विनियमन की आवश्यकता को रेखांकित करते हैं, जबकि सार्वजनिक क्षेत्र की बीमा कंपनियों को पर्याप्त पूँजीगत सहायता प्राप्त होती है।
    • केवल सकल निवेश स्टॉक की निगरानी करने के बजाय वृद्धिशील निवेशों की निगरानी करने से बीमा कंपनियों के नकदी प्रवाह और निवेश योग्य अधिशेष की बेहतर समझ प्राप्त हो सकती है।

आगे की राह: डेटा-आधारित विनियमन

  • मध्यस्थों के संबंध में पारदर्शिता: बीमा कंपनियों को अप्रत्यक्ष भुगतानों सहित मध्यस्थों और उनके साझेदारों को किए गए भुगतानों की जानकारी प्रस्तुत करनी चाहिए। इससे संकेंद्रण जोखिम की पहचान करने में सहायता मिलेगी।
  • दावों में पारदर्शिता: पोर्टफोलियो स्तर पर अस्वीकृत और लंबित दावों का उनके मूल्य तथा कानूनी स्थिति के साथ प्रकटीकरण करने से वर्तमान समस्याओं पर ध्यान आकर्षित किया जा सकता है और उपभोक्ता विश्वास बढ़ाया जा सकता है।
  • बेहतर मूल्य निर्धारण संबंधी सूचना: कॉरपोरेट संपत्ति और समूह स्वास्थ्य बीमा जैसे क्षेत्रों में प्रीमियम, दावों एवं मध्यस्थ व्ययों से संबंधित दीर्घकालिक आँकड़े नियामकों को बार-बार होने वाले कम मूल्य निर्धारण की पहचान करने में सहायता कर सकते हैं।
  • निवेश प्रवाह की निगरानी: नियामकों को सकल निवेश, वृद्धिशील निवेश और वार्षिक निवेश योग्य अधिशेष की निगरानी करनी चाहिए।
  • एकीकृत नियामक समन्वय:वित्तीय स्थिरता और विकास परिषद (FSDC) IRDAI, RBI और SEBI के बीच सूचना के आदान-प्रदान को सुगम बना सकती है।
    • बीमा कंपनियों और बैंकों/NBFCs के बीच भुगतानों, सार्वजनिक निर्गम संबंधी प्रकटीकरण तथा परस्पर संबद्ध वित्तीय जोखिमों के माध्यम से नियामकीय मध्यस्थता की पहचान की जा सकती है।

निष्कर्ष

  • भारत का बीमा क्षेत्र ऐसे चरण में प्रवेश कर रहा है, जहाँ विकास की मात्रा के साथ-साथ विकास की गुणवत्ता भी समान रूप से महत्त्वपूर्ण है।
  • सुधारों की आगामी पीढ़ी में पारदर्शी मध्यस्थ पारिश्रमिक, दावों के बेहतर प्रकटीकरण, जोखिम-संवेदनशील सॉल्वेंसी मानदंड, सुदृढ़ कॉरपोरेट प्रशासन और डेटा-आधारित पर्यवेक्षण का समावेश होना चाहिए।
  • उद्देश्य केवल बीमा की पहुँच का विस्तार करना नहीं होना चाहिए, बल्कि ऐसा बीमा बाजार विकसित करना होना चाहिए, जिसमें उचित मूल्य निर्धारण, सतत अंडरराइटिंग, उपभोक्ता विश्वास और वित्तीय सुदृढ़ता सुनिश्चित हो।
  • ऐसे सुधार भारत के दीर्घकालिक निवेश, सामाजिक सुरक्षा और आर्थिक विकास के उद्देश्यों में बीमा क्षेत्र के अधिक प्रभावी योगदान को संभव बना सकते हैं।
दैनिक मुख्य परीक्षा अभ्यास प्रश्न
[प्रश्न]: भारत की बीमा वितरण प्रणाली के समक्ष विद्यमान प्रमुख चुनौतियों पर चर्चा कीजिए तथा इसके नियामक ढाँचे को सुदृढ़ करने के उपाय सुझाइए। 

स्रोत: BL

 

Other News

पाठ्यक्रम: GS2/राजव्यवस्था और शासन संदर्भ प्रस्तावित विदेशी अंशदान विनियमन संशोधन विधेयक, 2026 का उद्देश्य निष्क्रिय हो चुके या जिनका पंजीकरण नवीनीकृत नहीं हुआ है, ऐसे NGO और संघों की विदेशी वित्तपोषित परिसंपत्तियों के संबंध में व्यापक परिवर्तन करना है। वर्तमान में यह विधेयक एक संयुक्त संसदीय समिति द्वारा समीक्षा के...
Read More

पाठ्यक्रम: GS3/अर्थव्यवस्था संदर्भ भारत का वस्त्र क्षेत्र वर्ष 2030 तक 350 अरब डॉलर का उद्योग बनने का लक्ष्य रखता है, जिससे निर्यात प्रतिस्पर्धा, बाजार तक पहुँच, संसाधन दक्षता तथा रोजगार-आधारित उत्तरदायी विकास के लिए सततता को केंद्रीय महत्व प्राप्त हो रहा है। भारत के वस्त्र क्षेत्र के बारे में भारत...
Read More

पाठ्यक्रम: GS2/अंतरराष्ट्रीय संबंध; GS3/अर्थव्यवस्था संदर्भ भारत ने भारत–न्यूज़ीलैंड मुक्त व्यापार समझौते (FTA) को लागू करने के लिए न्यूज़ीलैंड के कानून के पारित होने का स्वागत किया है। यह द्विपक्षीय व्यापार एवं निवेश संबंधों को बढ़ावा देने के उद्देश्य से किए गए समझौते को क्रियान्वित करने की दिशा में एक महत्वपूर्ण...
Read More

पाठ्यक्रम: GS3/सुरक्षा संदर्भ आतंकवाद का स्वरूप बड़े एवं केंद्रीकृत पदानुक्रमित संगठनों से बदलकर विकेंद्रीकृत नेटवर्कों में परिवर्तित हो गया है, जो ड्रोन, साइबर उपकरणों और उभरती प्रौद्योगिकियों का उपयोग कर रहे हैं। इस बदलते स्वरूप के कारण भारत को आतंकवाद-रोधी एक व्यापक रणनीति अपनाने की आवश्यकता हुई है। आतंकवाद का...
Read More

पाठ्यक्रम: GS3/अर्थव्यवस्था  संदर्भ हाल ही में आंध्र प्रदेश ने विश्व जनसंख्या दिवस के अवसर पर आयोजित कार्यक्रम में ‘पिल्लले संपदा’ (‘बच्चे ही संपदा हैं’) पहल का शुभारंभ किया, जो जनसंख्या नियंत्रण से हटकर निम्न प्रजनन दर और वृद्धावस्था की चुनौतियों के समाधान की दिशा में नीतिगत बदलाव का संकेत देता...
Read More

पाठ्यक्रम: GS2/अंतरराष्ट्रीय संबंध संदर्भ हालिया ‘आठ सूत्रीय परिणाम एवं सहमति’ तथा ब्रिक्स शिखर सम्मेलन के दौरान मोदी–शी बैठक ने इस बहस को पुनर्जीवित किया है कि क्या भारत–चीन द्विपक्षीय संबंध एक टिकाऊ तनाव-शैथिल्य (Détente) के चरण में प्रवेश कर रहे हैं। नैश संतुलन के बारे में खेल सिद्धांत (Game Theory)...
Read More

पाठ्यक्रम: GS3/विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी संदर्भ भारत के अनुसंधान उत्पादन में 2020 से 2025 के बीच उल्लेखनीय वृद्धि हुई है, किंतु कमजोर उद्धरण-प्रभाव, पेटेंटों के निम्न वाणिज्यीकरण तथा बढ़ती शोध-पत्र वापसी की घटनाओं ने उभरते हुए ‘शोध-पत्र दुर्ग’ को लेकर चिंताएँ बढ़ा दी हैं। भारत का अनुसंधान पारिस्थितिकी तंत्र भारत वैश्विक...
Read More
scroll to top