पाठ्यक्रम: GS1/ भारतीय विरासत और संस्कृति, GS3/ अर्थव्यवस्था
संदर्भ
- राष्ट्रीय हथकरघा दिवस, जो प्रत्येक वर्ष 7 अगस्त को मनाया जाता है, 1905 के स्वदेशी आंदोलन की स्मृति में मनाया जाता है। यह भारत के आर्थिक प्रतिरोध, सांस्कृतिक पहचान, ग्रामीण रोजगार और सतत विकास में हथकरघा क्षेत्र की भूमिका को रेखांकित करता है।
भारत में हथकरघा क्षेत्र एवं वर्तमान स्थिति
- ऐतिहासिक रूप से भारतीय वस्त्र वैश्विक व्यापार के केंद्र में रहे हैं और औपनिवेशिक औद्योगीकरण द्वारा स्वदेशी उत्पादन को बाधित किए जाने से पूर्व भारत को विश्व की प्रमुख विनिर्माण अर्थव्यवस्थाओं में शामिल करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते थे।
- वर्तमान में भी यह क्षेत्र पर्याप्त सामाजिक-आर्थिक महत्व रखता है।
- यह 31 लाख से अधिक परिवारों में 35 लाख से अधिक बुनकरों और संबद्ध श्रमिकों को आजीविका प्रदान करता है, जिनमें लगभग 70% कार्यबल महिलाएँ हैं।
- हथकरघा भारत के कुल वस्त्र उत्पादन में लगभग 15% का योगदान देता है। इस प्रकार, मुख्यतः मैनुअल उत्पादन पर आधारित होने के बावजूद यह ग्रामीण गैर-कृषि रोजगार का एक महत्वपूर्ण स्रोत है।
- हथकरघा महिलाओं की आर्थिक भागीदारी, विकेंद्रीकृत उत्पादन, पारंपरिक ज्ञान के संरक्षण और पर्यावरण की दृष्टि से सतत विनिर्माण को बढ़ावा देता है।
हथकरघा क्षेत्र एवं अर्थव्यवस्था
- भारतीय हथकरघा उद्योग विश्व के सबसे पुराने और सबसे जीवंत कुटीर उद्योगों में से एक है।
- हथकरघा जनगणना: भारत में अब तक हथकरघा क्षेत्र की चार जनगणनाएँ आयोजित की जा चुकी हैं:
- 1987-88
- 1995-96
- 2009-10
- 2019-20
- इन जनगणनाओं का आयोजन औसतन 8-12 वर्ष के अंतराल पर किया जाता है।
- चौथी अखिल भारतीय हथकरघा जनगणना (2019-20) के अनुसार, लगभग 35.22 लाख परिवार इस कार्य से जुड़े हुए हैं तथा आर्थिक गतिविधि में संलग्न हथकरघा बुनकरों में लगभग 72% महिलाएँ हैं।
- प्रमुख निर्यात गंतव्य: वित्त वर्ष 2024-25 में संयुक्त राज्य अमेरिका भारत के हथकरघा उत्पादों का सबसे बड़ा निर्यात गंतव्य रहा। इसके बाद क्रमशः संयुक्त अरब अमीरात (UAE), नीदरलैंड, फ्रांस और यूनाइटेड किंगडम रहे।
- उत्पाद: तैयार वस्तुएँ , जैसे कुशन कवर, पर्दे, टेबल लिनेन और अन्य घरेलू उपयोग की वस्तुओं का 2024-25 में 42.4% योगदान रहा।
- इसके बाद कालीन, गलीचे और चटाई जैसे फर्श आवरण उत्पादों का योगदान 40.6% रहा।
- वस्त्र सहायक उत्पादों का योगदान 12.7%, जबकि कपड़ों/फैब्रिक का योगदान 4.3% रहा।
प्रमुख मुद्दे एवं चिंताएँ
- घटती आर्थिक व्यवहार्यता: कम और अनिश्चित आय, बढ़ती इनपुट लागत तथा बिखरे हुए बाजार युवा पीढ़ी को इस व्यवसाय में प्रवेश करने से हतोत्साहित कर रहे हैं।
- पारंपरिक ज्ञान का लुप्त होना: कई कम प्रसिद्ध बुनाई परंपराएँ विलुप्त होने के खतरे का सामना कर रही हैं। किसी बुनाई तकनीक के लुप्त होने का अर्थ संचित शिल्प कौशल, डिज़ाइन संबंधी ज्ञान और सामुदायिक ज्ञान की हानि भी है।
- कमजोर बाजार संपर्क: कई बुनकर अभी भी मध्यस्थों पर निर्भर हैं तथा संगठित खुदरा बाजार, ई-कॉमर्स और अंतरराष्ट्रीय बाजारों तक उनकी पहुँच सीमित है।
- प्रतिस्पर्धा और नकल: पावरलूम और मशीन से निर्मित उत्पाद पारंपरिक डिजाइनों की कम कीमत पर नकल कर सकते हैं।
- भौगोलिक संकेतक (GI) के कमजोर प्रवर्तन और सांस्कृतिक विनियोग से मूल कारीगर समुदायों को मिलने वाला आर्थिक लाभ कम हो सकता है।
- अपर्याप्त आँकड़े: पारंपरिक आर्थिक आँकड़ों में हथकरघा अर्थव्यवस्था का पर्याप्त रूप से समावेश नहीं हो पाता है।
- रोजगार, परिवारों की आय, निर्यात और मूल्यवर्धन से संबंधित बेहतर आँकड़े साक्ष्य-आधारित नीतिनिर्माण के लिए आवश्यक हैं।
संबंधित प्रयास एवं पहल
- सरकार ने राष्ट्रीय हथकरघा विकास कार्यक्रम (NHDP) के अंतर्गत कौशल विकास, डिज़ाइन नवाचार, प्रौद्योगिकी अपनाने, ब्रांडिंग और बाजार तक पहुँच पर केंद्रित विभिन्न उपाय अपनाए हैं।
- ई-कॉमर्स प्लेटफॉर्म के साथ बेहतर एकीकरण से कारीगर समूहों को व्यापक उपभोक्ता बाजारों तक पहुँचने में सहायता मिली है।
- इसी प्रकार, निर्यात संवर्धन भारतीय हथकरघा उत्पादों को सतत और हस्तनिर्मित उत्पादों की वैश्विक मांग से जोड़ सकता है।
- विकास आयुक्त (हथकरघा) का कार्यालय, विलुप्तप्राय और संकटग्रस्त बुनाई परंपराओं के दस्तावेजीकरण के लिए किए जा रहे सहयोग सहित, पारंपरिक ज्ञान के संरक्षण में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है।
- GI पंजीकरण क्षेत्र-विशिष्ट उत्पादों की सुरक्षा और उनके बाजार मूल्य को बढ़ाने का एक अन्य माध्यम है।
- गुजरात में टंगालिया बुनाई का पुनरुद्धार, ओडिशा के बदतुरंग गाँव का परिवर्तन तथा सिद्दीपेट गोल्लाभामा साड़ियों की बढ़ती लोकप्रियता जैसे उदाहरण दर्शाते हैं कि जब डिज़ाइन, संस्थागत सहायता और बाजार तक पहुँच का समुचित समन्वय होता है, तो पारंपरिक शिल्प व्यावसायिक रूप से व्यवहार्य बन सकते हैं।
आगे की राह: संरक्षण से आकांक्षा तक
- हथकरघे को आकांक्षापूर्ण बनाना: नीतिगत दृष्टिकोण को हथकरघे को केवल विरासत के रूप में देखने से आगे बढ़ना चाहिए।
- युवा उपभोक्ताओं के लिए भारतीय बुनाई परंपराओं को डिजाइनरों के साथ सहयोग, सेलिब्रिटी समर्थन, डिजिटल कहानी-वाचन और सीमित संस्करण वाले संग्रहों के माध्यम से प्रीमियम, समकालीन और टिकाऊ जीवनशैली उत्पादों के रूप में स्थापित किया जाना चाहिए।
- वैश्विक स्तर पर प्रतिस्पर्धी ब्रांड तैयार करना: भारत को प्रामाणिकता, शिल्प कौशल और सततता में प्राप्त अपनी बढ़त का लाभ उठाकर हथकरघा निर्यात का विस्तार करना चाहिए।
- इसके लिए गुणवत्तापूर्ण मानक, पेशेवर ब्रांडिंग, GI का प्रभावी प्रवर्तन, उत्पादों की उत्पत्ति का पता लगाने की व्यवस्था तथा नकली उत्पादों और सांस्कृतिक दुरुपयोग के विरुद्ध कार्रवाई आवश्यक है।
- कारीगर पारिस्थितिकी तंत्र का सुदृढ़ीकरण: उत्पादक संगठनों, सहकारी समितियों और स्वयं सहायता समूहों को ऋण, प्रौद्योगिकी, डिज़ाइन सहायता, लॉजिस्टिक्स एवं डिजिटल बाजारों तक बेहतर पहुँच प्रदान की जानी चाहिए।
- राज्यों और उत्पादक संगठनों के लिए सफल कार्यप्रणालियों को साझा करने हेतु एक राष्ट्रीय मंच नवाचार को गति प्रदान कर सकता है।
- मापन और नीतिगत समन्वय में सुधार: रोजगार, परिवारों की आय, निर्यात और मूल्यवर्धन में हथकरघा क्षेत्र के योगदान से संबंधित विश्वसनीय आँकड़ों को नीतिनिर्माण का आधार बनाया जाना चाहिए।
- हथकरघा नीति का महिलाओं के सशक्तीकरण, ग्रामीण आजीविका, पर्यटन, कौशल विकास, एक जिला एक उत्पाद (ODOP) और रचनात्मक अर्थव्यवस्था से संबंधित पहलों के साथ भी समन्वय होना चाहिए।
निष्कर्ष
- हथकरघा भारत के अतीत का अवशेष नहीं, बल्कि उसके भविष्य की रणनीतिक परिसंपत्ति है। यह रोजगार-प्रधान विकास को महिला सशक्तीकरण, सांस्कृतिक संरक्षण, स्थिरता और वैश्विक ब्रांडिंग के साथ जोड़ता है।
- नीतिगत सफलता का अंतिम पैमाना यह होना चाहिए कि भारत अपने करघों को सक्रिय, लाभदायक और आगामी पीढ़ी के लिए आकर्षक बनाए रखने में कितना सफल होता है।
| दैनिक मुख्य परीक्षा अभ्यास प्रश्न [प्रश्न] भारतीय हथकरघा क्षेत्र के समक्ष उपस्थित चुनौतियों की चर्चा कीजिए तथा इसे वैश्विक स्तर पर प्रतिस्पर्धी और सतत बनाने के लिए उपाय सुझाइए। |
स्रोत: TH
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