पाठ्यक्रम: GS3/अर्थव्यवस्था; वित्तीय समावेशन
संदर्भ
- भारत में डिजिटल ऋण के तीव्र विस्तार ने वित्तीय समावेशन में सुधार किया है, लेकिन प्रभावी उधार लागत के अधिक होने तथा एक साथ कई असुरक्षित ऋण लेने की बढ़ती प्रवृत्ति ने उपभोक्ता संरक्षण से संबंधित कुछ कमियों को उजागर किया है।
भारत की डिजिटल ऋण व्यवस्था में क्रांति के बारे में
- डिजिटल ऋण ने भारत में ऋण वितरण की व्यवस्था में व्यापक परिवर्तन किया है।
- स्मार्टफोन-आधारित प्लेटफॉर्म, ई-KYC, आधार-सक्षम सेवाओं, अकाउंट एग्रीगेटर अवसंरचना और डिजिटल भुगतान ने लेन-देन की लागत को कम किया है तथा कुछ ही मिनटों में ऋण स्वीकृत करना संभव बनाया है।
- यह परिवर्तन प्रथम बार ऋण लेने वाले, युवा तथा सीमित क्रेडिट इतिहास वाले उधारकर्ताओं के लिए विशेष रूप से महत्वपूर्ण है, जिन्हें पहले औपचारिक ऋण तक पहुँच प्राप्त करने में कठिनाइयों का सामना करना पड़ता था।
- परिणामस्वरूप, डिजिटल ऋण भारत के व्यापक वित्तीय समावेशन और डिजिटल सार्वजनिक अवसंरचना (DPI) पारिस्थितिकी तंत्र का एक महत्वपूर्ण घटक बन गया है।
- भारतीय रिज़र्व बैंक (RBI) का नियामकीय ढाँचा प्रकटीकरण संबंधी आवश्यकताओं, मुख्य तथ्य विवरण (KFS), ऋण वितरण एवं पुनर्भुगतान, डेटा संरक्षण, शिकायत निवारण तथा ऋण वसूली की प्रक्रियाओं को शामिल करता है।
वर्तमान स्थिति
- व्यक्तिगत ऋण बैंक ऋण का एक प्रमुख घटक बन गए हैं। असुरक्षित खुदरा ऋण में तीव्र वृद्धि के कारण RBI ने कुछ उपभोक्ता ऋण जोखिमों पर अधिक जोखिम भार लगाने सहित मैक्रो-प्रूडेंशियल उपाय अपनाए हैं।
- डिजिटल ऋणदाता तीव्रता से ऐसे उधारकर्ताओं को सेवाएँ प्रदान कर रहे हैं, जिन्हें कम राशि और अल्पावधि के ऋण की आवश्यकता होती है।
- ऐसे ऋणों की संरचना के कारण पुनर्भुगतान का भार अधिक हो सकता है, क्योंकि प्रसंस्करण शुल्क, बीमा या अन्य अनिवार्य शुल्क तथा कम पुनर्भुगतान अवधि ऋण की प्रभावी लागत को काफी बढ़ा सकती है, भले ही इससे ऋण तक पहुँच आसान होती हो।
- अतः वित्तीय समावेशन के साथ वित्तीय संरक्षण भी सुनिश्चित किया जाना आवश्यक है।
डिजिटल ऋण व्यवस्था में क्रांति के पीछे प्रमुख कारक
- डिजिटल सार्वजनिक अवसंरचना: आधार, UPI, ई-KYC और अकाउंट एग्रीगेटर त्वरित प्रमाणीकरण, भुगतान तथा सहमति-आधारित डेटा साझा करने की सुविधा प्रदान करते हैं।
- फिनटेक नवाचार: एल्गोरिद्मिक ऋण मूल्यांकन के माध्यम से ऋणदाता सीमित पारंपरिक क्रेडिट इतिहास वाले उधारकर्ताओं की ऋण-योग्यता का आकलन कर सकते हैं।
- लेन-देन की कम लागत: कागज रहित ऑनबोर्डिंग और स्वचालित ऋण मूल्यांकन से ऋण देने की लागत और समय दोनों कम होते हैं।
- स्मार्टफोन और इंटरनेट की बढ़ती पहुँच: डिजिटल कनेक्टिविटी के विस्तार से संभावित उधारकर्ताओं का आधार व्यापक हुआ है।
- नियामकीय विकास: RBI के डिजिटल ऋण दिशानिर्देशों तथा बाद में जारी निर्देशों का उद्देश्य डिजिटल ऋण व्यवस्था को जिम्मेदार ऋण प्रदान करने के ढाँचे के अंतर्गत लाना है।
संबंधित मुद्दे एवं चिंताएँ
- प्रभावी लागत बनाम घोषित ब्याज दर: केवल जानकारी का प्रकटीकरण ही उधारकर्ताओं को सूचित निर्णय लेने में सक्षम बनाने के लिए पर्याप्त नहीं हो सकता।
- चिकित्सकीय आपातस्थिति, आय में अचानक कमी या तरलता संबंधी बाधाओं का सामना कर रहे उधारकर्ता प्रायः ऋण की लागत की तुलना करने के बजाय तत्काल धन प्राप्त करने को प्राथमिकता देते हैं।
- इस प्रकार, वर्तमान-पूर्वाग्रह जैसे व्यवहारगत कारक प्रकटीकरण-आधारित उपभोक्ता संरक्षण की प्रभावशीलता को कमजोर कर सकते हैं।
- एकाधिक ऋण और अति-ऋणग्रस्तता: किसी उधारकर्ता द्वारा एक साथ लिए जा सकने वाले असुरक्षित डिजिटल ऋणों की संख्या पर बाजार-स्तर पर कोई सरल और सार्वभौमिक सीमा नहीं है।
- विभिन्न ऋणदाता स्वतंत्र रूप से उधारकर्ता की पुनर्भुगतान क्षमता का आकलन कर सकते हैं, जबकि विभिन्न प्लेटफॉर्मों पर कुल ऋणग्रस्तता की निगरानी करना कठिन हो सकता है।
- इस प्रकार, अल्पावधि वाले डिजिटल ऋण अनुपातहीन रूप से अधिक मासिक पुनर्भुगतान दायित्व उत्पन्न कर सकते हैं, जिससे ऋण चक्रण की प्रवृत्ति बढ़ सकती है—अर्थात वर्तमान ऋण चुकाने के लिए नया ऋण लेना।
- उपभोक्ता एवं डेटा संरक्षण: डिजिटल ऋण से आक्रामक ऋण-वसूली प्रक्रियाओं, व्यक्तिगत डेटा के दुरुपयोग, अपारदर्शी एल्गोरिद्म, साइबर जोखिमों और भ्रामक डिजिटल इंटरफेस से संबंधित चिंताएँ भी उत्पन्न होती हैं।
संबंधित प्रयास एवं पहल
- RBI ने डिजिटल ऋण दिशानिर्देशों, मुख्य तथ्य विवरण (KFS) संबंधी आवश्यकताओं, ऋण सेवा प्रदाताओं (LSPs) के विनियमन, उधारकर्ताओं के बैंक खातों में सीधे ऋण वितरण, शिकायत निवारण तंत्र तथा अनुचित डेटा संग्रह पर प्रतिबंधों के माध्यम से डिजिटल ऋण पारिस्थितिकी तंत्र को सुदृढ़ किया है।
- डिजिटल व्यक्तिगत डेटा संरक्षण ढाँचा, अकाउंट एग्रीगेटर पारिस्थितिकी तंत्र तथा RBI के पर्यवेक्षी हस्तक्षेप जिम्मेदार डिजिटल वित्त को अधिक सुदृढ़ करते हैं।
- अत्यधिक ऋण दरों या उच्च स्प्रेड वाले पाए गए संस्थाओं के विरुद्ध RBI की कार्रवाई यह दर्शाती है कि ऋण की कीमत स्वयं भी वैध नियामकीय चिंता का विषय हो सकती है।
आगे की राह: सुदृढ़ीकरण के उपाय
- उधारकर्ता-स्तरीय ऋण सीमा: एक साथ लिए गए असुरक्षित डिजिटल ऋणों पर विवेकपूर्ण सीमाएँ निर्धारित करने के लिए क्रेडिट ब्यूरो तथा अन्य विनियमित डेटा अवसंरचनाओं का उपयोग किया जाना चाहिए।
- प्रभावी लागत का विनियमन: उधार की कुल लागत को मापने के लिए एक मानकीकृत समावेशी मानक विकसित किया जाना चाहिए, जिसमें ब्याज और सभी अनिवार्य शुल्क शामिल हों।
- पुनर्भुगतान क्षमता का आकलन: केवल प्रत्येक ऋणदाता के स्तर पर आकलन करने के बजाय उधारकर्ता के सभी ऋण दायित्वों को समग्र रूप से ध्यान में रखकर पुनर्भुगतान क्षमता का आकलन किया जाना चाहिए।
- व्यवहारगत सुरक्षा उपाय: केवल लंबे और जटिल प्रकटीकरणों पर निर्भर रहने के बजाय सरल एवं प्रमुख रूप से प्रदर्शित जानकारी, कूलिंग-ऑफ अवधि तथा पुनर्भुगतान सिमुलेशन जैसे उपाय अपनाए जाने चाहिए।
- वित्तीय साक्षरता: वार्षिक प्रतिशत दर (APR)/प्रभावी लागत, एक साथ कई ऋण लेने तथा बार-बार ऋण लेने के परिणामों के संबंध में जागरूकता को सुदृढ़ किया जाना चाहिए।
- जिम्मेदार नवाचार: फिनटेक नवाचार को प्रोत्साहित किया जाना चाहिए, साथ ही एल्गोरिद्मिक जवाबदेही, डेटा न्यूनतमीकरण तथा पारदर्शी शिकायत निवारण तंत्र सुनिश्चित किए जाने चाहिए।
| दैनिक मुख्य परीक्षा अभ्यास प्रश्न [प्रश्न]: भारत में उत्तरदायी और सतत डिजिटल ऋण व्यवस्था सुनिश्चित करने में शामिल नियामकीय चुनौतियों की चर्चा कीजिए तथा आवश्यक उपाय सुझाइए। |
स्रोत: BL
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भारत की डिजिटल ऋण व्यवस्था में क्रांति