पाठ्यक्रम: GS2/ शासन
संदर्भ
- भारत में शासन की बढ़ती जटिल चुनौतियाँ प्रशासन की खंडित और आवधिक व्यवस्था से आगे बढ़कर कृत्रिम बुद्धिमत्ता-सक्षम, वास्तविक समय पर आधारित, पूर्वानुमानात्मक और साक्ष्य-आधारित शासन व्यवस्था की ओर संक्रमण की आवश्यकता को रेखांकित करती हैं।
वर्तमान शासन संबंधी मुद्दे
- शासन संरचना का विखंडन: सरकारी विभाग अलग-अलग डेटाबेस, रिपोर्टिंग प्रारूपों और निगरानी तंत्रों के माध्यम से कार्य करते हैं, जिससे सूचनाओं के एकीकरण में बाधा उत्पन्न होती है और संपूर्ण-सरकार दृष्टिकोण कमजोर होता है।
- निगरानी में विलंब: आवधिक रिपोर्टों और समीक्षाओं पर अत्यधिक निर्भरता के कारण परियोजनाओं में देरी, वित्तीय रिसाव, लागत में वृद्धि तथा सार्वजनिक सेवाओं के वितरण में कमियों का समय पर पता नहीं चल पाता है।
- निर्णय-निर्माण का विभागीयकरण: यद्यपि स्वास्थ्य, कृषि, ऊर्जा, कल्याण और रोजगार जैसे क्षेत्र परस्पर निकटता से जुड़े हुए हैं, फिर भी नीतियाँ प्रायः अलग-अलग विभागों में स्वतंत्र रूप से बनाई और उनका मूल्यांकन किया जाता है।
- वास्तविक समय की सीमित दृश्यता: नीति-निर्माताओं के पास वास्तविक समय की सूचनाओं का अभाव रहता है, जिसके कारण वे उभरती हुई समस्याओं की पहचान समय रहते नहीं कर पाते और उनके बड़े प्रशासनिक या राजकोषीय संकट में परिवर्तित होने से पहले प्रभावी कार्रवाई करने में असमर्थ रहते हैं।
शासन में कृत्रिम बुद्धिमत्ता का महत्त्व
- पूर्वानुमानात्मक शासन: कृत्रिम बुद्धिमत्ता आधारित पूर्वानुमानात्मक मॉडल रोगों के संभावित प्रकोप, बुनियादी ढाँचा परियोजनाओं में विलंब, असामान्य व्यय प्रवृत्तियों और संसाधनों की कमी जैसी संभावित समस्याओं की पहचान कर सकते हैं, जिससे समय पर निवारक कार्रवाई करना संभव होता है।
- उदाहरण: एकीकृत रोग निगरानी कार्यक्रम (IDSP) डिजिटल रोग-निगरानी आँकड़ों और कृत्रिम बुद्धिमत्ता आधारित विश्लेषण का उपयोग करके उभरती हुई रोग प्रवृत्तियों की पहचान कर सकता है तथा प्रारंभिक सार्वजनिक स्वास्थ्य हस्तक्षेपों को समर्थन प्रदान कर सकता है।
- बेहतर सार्वजनिक सेवा वितरण: कृत्रिम बुद्धिमत्ता दोहराव, अपवर्जन और पात्रता संबंधी विसंगतियों की पहचान करके तथा सार्वजनिक संसाधनों को उभरती आवश्यकताओं के अनुरूप लक्षित करके कल्याणकारी योजनाओं के बेहतर लक्ष्यीकरण और वितरण में सहायता कर सकती है।
- उदाहरण: आधार-सक्षम डेटा प्रणालियाँ और डेटा विश्लेषण कल्याणकारी कार्यक्रमों में दोहराए गए या अपात्र लाभार्थियों की पहचान करने में सहायता कर सकते हैं।
- राजकोषीय प्रबंधन में सुधार: कृत्रिम बुद्धिमत्ता असामान्य वित्तीय लेन-देन, निधियों के उपयोग में विलंब तथा संभावित राजकोषीय दबाव की पहचान करने में सहायता कर सकती है। इससे व्यय प्रबंधन को अधिक प्रभावी बनाया जा सकता है और संभावित वित्तीय रिसाव को कम किया जा सकता है।
- एकीकृत शासन: कृत्रिम बुद्धिमत्ता विभिन्न विभागों से प्राप्त सूचनाओं का विश्लेषण करने में सहायता कर सकती है, जिससे नीति-निर्माता विभिन्न क्षेत्रों के बीच परस्पर संबंधों को बेहतर ढंग से समझ सकें और संपूर्ण-सरकार दृष्टिकोण अपनाकर निर्णय ले सकें।
- उदाहरण: पीएम गतिशक्ति राष्ट्रीय मास्टर प्लान एक साझा GIS प्लेटफॉर्म पर अनेक मंत्रालयों और बुनियादी ढाँचा क्षेत्रों से संबंधित डेटा को एकीकृत करता है, जिससे समन्वित बुनियादी ढाँचा नियोजन को बेहतर बनाने में सहायता मिलती है।
- साक्ष्य-आधारित निर्णय-निर्माण: कृत्रिम बुद्धिमत्ता आधारित विश्लेषण नीति-निर्माताओं को आँकड़ों पर आधारित निर्णय लेने में सहायता कर सकता है तथा विलंबित रिपोर्टों और व्यक्तिपरक आकलनों पर अत्यधिक निर्भरता को कम कर सकता है।
चुनौतियाँ
- डेटा की निम्न गुणवत्ता: डेटा की अशुद्धता के कारण कृत्रिम बुद्धिमत्ता द्वारा उत्पन्न परिणाम अविश्वसनीय हो सकते हैं। सरकारी अभिलेखों में गलत, अपूर्ण या पुराने आँकड़े पूर्वानुमानात्मक प्रणालियों की प्रभावशीलता को प्रभावित कर सकते हैं।
- एल्गोरिद्मिक पक्षपात: जब कृत्रिम बुद्धिमत्ता प्रणालियों को ऐसे डेटा पर प्रशिक्षित किया जाता है जो पर्याप्त रूप से प्रतिनिधित्वकारी नहीं है, तो वे वर्तमान सामाजिक या प्रशासनिक पक्षपात को सुदृढ़ कर सकती हैं।
- डिजिटल विभाजन: इंटरनेट, डिजिटल साक्षरता या डिजिटल उपकरणों तक पहुँच न रखने वाले नागरिक हाशिए पर जा सकते हैं। इसलिए कृत्रिम बुद्धिमत्ता-सक्षम सेवाओं को सेवा वितरण के भौतिक और मानवीय माध्यमों का विकल्प बनने के बजाय उनका पूरक होना चाहिए।
- संस्थागत क्षमता: कृत्रिम बुद्धिमत्ता आधारित शासन के लिए प्रशिक्षित कर्मचारियों, सुदृढ़ डिजिटल अवसंरचना, साइबर सुरक्षा क्षमताओं और उपयुक्त नियामक संरचनाओं की आवश्यकता होती है।
आगे की राह
- अंतर-संचालनीय शासन प्लेटफॉर्म का निर्माण: सरकारी एजेंसियों को साझा डेटा मानकों और अंतर-संचालनीय डिजिटल प्रणालियों को अपनाना चाहिए, ताकि एजेंसियों तथा सरकार के विभिन्न स्तरों के बीच सूचनाओं का सुरक्षित और वैधानिक आदान-प्रदान सुनिश्चित किया जा सके।
- डेटा की गुणवत्ता में सुधार: कृत्रिम बुद्धिमत्ता की प्रभावशीलता अत्यंत सीमा तक अंतर्निहित डेटा की गुणवत्ता पर निर्भर करती है। सरकारों को यह सुनिश्चित करना चाहिए कि सार्वजनिक डेटासेट सटीक, अद्यतन, मानकीकृत और पर्याप्त रूप से प्रतिनिधित्वकारी हों।
- मानव-समावेशी दृष्टिकोण अपनाना: कृत्रिम बुद्धिमत्ता को प्रशासनिक निर्णय-निर्माण में सहायता प्रदान करनी चाहिए, न कि मानवीय विवेक का स्थान लेना चाहिए। विशेष रूप से उन निर्णयों में मानवीय निर्णय क्षमता आवश्यक है, जो कल्याणकारी लाभों, सार्वजनिक सेवाओं और व्यक्तिगत अधिकारों से संबंधित हों।
- साइबर सुरक्षा: कृत्रिम बुद्धिमत्ता-सक्षम शासन को भारत के डेटा-संरक्षण ढाँचे का अनुपालन करना चाहिए तथा डेटा के दुरुपयोग, अनधिकृत पहुँच एवं साइबर हमलों को रोकने के लिए सुदृढ़ सुरक्षा उपाय सुनिश्चित करने चाहिए।
- एल्गोरिद्मिक जवाबदेही सुनिश्चित करना: शासन में प्रयुक्त कृत्रिम बुद्धिमत्ता प्रणालियों की पक्षपात, सटीकता और व्याख्येयता के संबंध में नियमित ऑडिट किया जाना चाहिए। साथ ही, मानवीय समीक्षा और शिकायत निवारण के लिए स्पष्ट तंत्र स्थापित किए जाने चाहिए।
स्रोत: TH
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संक्षिप्त समाचार 08-08-2026