भारत में जन्म-दर में आई अप्रत्याशित गिरावट विश्व के लिए एक चेतावनी

पाठ्यक्रम: जीएस-2/सामाजिक मुद्दे

सन्दर्भ

  • नमूना पंजीकरण प्रणाली (SRS) सांख्यिकीय प्रतिवेदन तथा राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण-5 (NFHS-5) के अनुसार, भारत की कुल प्रजनन दर (TFR) प्रतिस्थापन स्तर 2.1 से नीचे गिर गई है और लगभग 2.0 तथा उसके बाद 1.9 तक पहुँच गई है। यह संकेत देता है कि भारत की जनसंख्या पहले की अपेक्षा अधिक तेज़ी से वृद्ध हो सकती है तथा अंततः उसमें कमी आ सकती है।

‘बेबी बस्ट’ क्या है?

  • बेबी बस्ट से तात्पर्य प्रजनन दर में निरंतर गिरावट से है, जिसके परिणामस्वरूप जन्मों की संख्या मौजूदा जनसंख्या के प्रतिस्थापन हेतु आवश्यक स्तर से कम हो जाती है।
  • भारत की वर्तमान स्थिति:
    • प्रतिस्थापन स्तर (2.1) से नीचे कुल प्रजनन दर (टीएफआर): दक्षिणी और पश्चिमी राज्यों सहित अधिकांश राज्यों में प्रजनन दर प्रतिस्थापन स्तर से काफी नीचे पहुँच चुकी है।
    • जनसंख्या वृद्धि में उल्लेखनीय गिरावट: भारत की जनसंख्या वृद्धि दर में स्पष्ट कमी आ रही है।
    • जनसंख्या स्थिरीकरण शीघ्र होने की संभावना: भविष्य में जनसंख्या का स्थिरीकरण अनुमानित समय से पहले हो सकता है।

भारत में प्रजनन दर में गिरावट क्यों आ रही है?

  • महिला शिक्षा में वृद्धि: उच्च शिक्षा प्राप्त करने से विवाह और मातृत्व की आयु बढ़ती है तथा कार्यबल में बढ़ती भागीदारी प्रजनन संबंधी प्राथमिकताओं को प्रभावित करती है।
  • नगरीकरण: बढ़ती जीवन-यापन लागत बड़े परिवारों को हतोत्साहित करती है तथा छोटे परिवार का मानदंड व्यापक होता जा रहा है।
  • स्वास्थ्य सेवाओं और परिवार नियोजन तक बेहतर पहुँच: प्रजनन स्वास्थ्य सेवाओं का विस्तार, साथ ही गर्भनिरोधक साधनों के प्रति बेहतर जागरूकता और उपलब्धता।
  • शिशु एवं बाल मृत्यु-दर में कमी: अब परिवारों को बाल मृत्यु के जोखिम से सुरक्षा हेतु अधिक बच्चों को जन्म देने की आवश्यकता नहीं पड़ती।
  • आकांक्षात्मक एवं जीवन-शैली संबंधी परिवर्तन: प्रत्येक बच्चे की शिक्षा की गुणवत्ता तथा मानव पूँजी में निवेश पर अधिक बल दिया जा रहा है।

यह विश्व के लिए चेतावनी क्यों है?

  • जनसांख्यिकीय संक्रमण अपेक्षा से अधिक तेज़ हो सकता है: अनेक विकासशील देश यह मानते हैं कि जनसंख्या के वृद्ध होने की समस्या का सामना करने में अभी कई दशक लगेंगे।
  • भारत का अनुभव दर्शाता है कि सामाजिक-आर्थिक परिस्थितियों में सुधार होने पर प्रजनन दर बहुत तेज़ी से गिर सकती है।
  • कार्यबल में कमी का जोखिम: युवा जनसंख्या में गिरावट से श्रमबल की उपलब्धता कम हो सकती है, आर्थिक विकास की गति धीमी पड़ सकती है तथा आश्रितता अनुपात बढ़ सकता है।
  • बढ़ता राजकोषीय बोझ: सरकारों को पेंशन व्यय, स्वास्थ्य सेवाओं पर बढ़ते खर्च तथा सामाजिक सुरक्षा संबंधी दायित्वों में वृद्धि का सामना करना पड़ सकता है।
  • परिणामस्वरूप अनेक विकासशील देश “समृद्ध होने से पहले वृद्ध” होने की स्थिति में पहुँच सकते हैं।
  • पूर्वी एशिया से मिलने वाले सबक: जापान, दक्षिण कोरिया और चीन जैसे देश पहले से ही वृद्ध होती जनसंख्या, श्रमबल की कमी तथा निम्न प्रजनन-दर के दुष्चक्र का सामना कर रहे हैं।
  • आने वाले दशकों में भारत को भी इसी प्रकार की चुनौतियों का सामना करना पड़ सकता है।

भारत के लिए निहितार्थ

सकारात्मक परिणाम:

जनसांख्यिकीय लाभांश (अल्पकाल में):

  • आश्रित जनसंख्या का बोझ कम होगा।
  • शिक्षा एवं कौशल विकास में निवेश की अधिक संभावनाएँ उत्पन्न होंगी।
  • उत्पादकता में वृद्धि की संभावना रहेगी।

बेहतर मानव विकास:

  • मातृ एवं शिशु स्वास्थ्य में सुधार होगा।
  • प्रत्येक बच्चे पर शिक्षा, स्वास्थ्य और विकास संबंधी निवेश बढ़ेगा।

उभरती चुनौतियाँ:

जनसंख्या का वृद्ध होना:

  • वृद्ध जनसंख्या का अनुपात बढ़ेगा।
  • जेरियाट्रिक (वृद्धजन) स्वास्थ्य सेवाओं तथा दीर्घकालिक देखभाल प्रणालियों की आवश्यकता बढ़ेगी।

क्षेत्रीय जनसांख्यिकीय असंतुलन:

  • दक्षिणी राज्य अपेक्षाकृत अधिक तेज़ी से वृद्ध हो सकते हैं।
  • उत्तरी राज्य कार्यबल का बड़ा हिस्सा प्रदान करते रह सकते हैं।

श्रम बाज़ार पर दबाव:

  • श्रम-प्रधान क्षेत्रों में श्रमिकों की कमी उत्पन्न हो सकती है।
  • उत्पादकता-आधारित आर्थिक वृद्धि पर अधिक बल देना होगा।

सामाजिक सुरक्षा संबंधी चिंताएँ:

  • पेंशन तथा स्वास्थ्य सेवा प्रणालियों को अधिक सुदृढ़ बनाने की आवश्यकता होगी।

सरकारी पहलें एवं नीतिगत प्रतिक्रिया

  • राष्ट्रीय जनसंख्या नीति (NPP), 2000: स्वैच्छिक एवं सूचित विकल्पों के माध्यम से जनसंख्या स्थिरीकरण पर बल देती है।
  • मिशन परिवार विकास: उच्च प्रजनन-दर वाले जिलों को लक्षित करता है तथा परिवार नियोजन सेवाओं तक पहुँच में सुधार करता है।
  • वृद्धजन स्वास्थ्य देखभाल हेतु राष्ट्रीय कार्यक्रम (NPHCE ): वृद्धावस्था से संबंधित उभरती स्वास्थ्य आवश्यकताओं को संबोधित करता है।
  • डिजिटल स्वास्थ्य एवं सामाजिक सुरक्षा उपाय: आयुष्मान भारत के विस्तार तथा भविष्य के जनसांख्यिकीय परिवर्तनों को ध्यान में रखते हुए स्वास्थ्य अवसंरचना को सुदृढ़ करने पर बल दिया जा रहा है।

भारत को क्या करना चाहिए?

  • जनसंख्या नियंत्रण से जनसंख्या प्रबंधन की ओर बढ़ना चाहिए: प्रजनन-दर को कम करने के बजाय जनसांख्यिकीय स्थिरता और संतुलन पर ध्यान देना चाहिए।
  • मानव पूँजी में निवेश बढ़ाना चाहिए: शिक्षा, कौशल विकास, स्वास्थ्य एवं पोषण को प्राथमिकता दी जानी चाहिए।
  • महिला श्रमबल भागीदारी को प्रोत्साहित करना चाहिए: बाल देखभाल सहायता तथा लचीले रोजगार अवसर उपलब्ध कराए जाने चाहिए।
  • वृद्ध होती जनसंख्या के लिए तैयारी करनी चाहिए: सार्वभौमिक पेंशन कवरेज, वृद्धजन स्वास्थ्य अवसंरचना तथा दीर्घकालिक देखभाल तंत्र का विकास आवश्यक है।
  • उत्पादक कार्यबल वृद्धि को बढ़ावा देना चाहिए: श्रम सुधार, प्रौद्योगिकी अपनाने तथा प्रवासन-अनुकूल नीतियों को प्रोत्साहित किया जाना चाहिए।
दैनिक मुख्य परीक्षा अभ्यास प्रश्न
[प्रश्न] जनसंख्या विस्फोट से प्रतिस्थापन स्तर से नीचे की प्रजनन-दर तक भारत का संक्रमण एक महत्त्वपूर्ण जनसांख्यिकीय मोड़ है। भारत में घटती प्रजनन-दर के कारणों का परीक्षण कीजिए तथा इसके सामाजिक-आर्थिक निहितार्थों की चर्चा कीजिए। (250 शब्द) 

स्रोत: Economist

 

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