उच्चतम न्यायालय द्वारा न्यायपालिका में कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI) के उपयोग संबंधी मसौदा विनियम प्रकाशित 

पाठ्यक्रम: GS32/न्यायपालिका; ई-गवर्नेंस

संदर्भ

  • उच्चतम न्यायालय की एआई समिति ने ऐसे मसौदा विनियम प्रस्तावित किए हैं, जिनके अंतर्गत अनिवार्य मानवीय पर्यवेक्षण के बिना एआई-सहायित दंड-निर्धारण पर प्रतिबंध लगाया गया है।
    • ये प्रस्तावित विनियम न्यायालयों द्वारा निर्णय प्रदान करने की प्रक्रिया में कृत्रिम बुद्धिमत्ता पर बढ़ती निर्भरता को लेकर उच्चतम न्यायालय द्वारा व्यक्त चिंताओं के परिप्रेक्ष्य में प्रस्तुत किए गए हैं।

विनियमों की प्रमुख विशेषताएँ

  • प्रशासनिक कार्यों जैसे वाद प्रबंधन , कारण सूची की तैयारी, सुनवाई का निर्धारण, न्यायालयीय कार्यवाहियों का प्रतिलेखन तथा निर्णयों के अनुवाद हेतु एआई के उपयोग की अनुमति प्रदान की गई है।
  • न्यायिक प्रक्रियाओं में “जोखिम मूल्यांकन” के लिए एआई प्रणालियों का उपयोग नहीं किया जा सकेगा। इसमें फरार होने की संभावना का आकलन, पुनः अपराध करने की संभावना का पूर्वानुमान, जमानत पात्रता का मूल्यांकन अथवा पक्षकारों एवं गवाहों की विश्वसनीयता का निर्धारण शामिल है।
  • एआई प्रणालियों के माध्यम से व्यक्तिगत डेटा का प्रसंस्करण डिजिटल व्यक्तिगत डेटा संरक्षण अधिनियम, 2023 के प्रावधानों के अनुसार संचालित होगा।
  • एआई प्रणालियाँ जाति, धर्म, नस्ल, लिंग, जेंडर, विकलांगता, भाषा, आर्थिक स्थिति अथवा संविधान द्वारा निषिद्ध किसी अन्य आधार पर पक्षपात को प्रोत्साहन  नहीं देंगी।
  • एआई-सहायित न्यायिक प्रणालियाँ “डिजिटल विभाजन” को व्यापक नहीं करेंगी तथा सभी हितधारकों के लिए सुलभ बनी रहेंगी।
  • न्यायपालिका में एआई के उपयोग एवं अपनाने की निगरानी हेतु उच्चतम न्यायालय में एक पूर्णकालिक “शीर्ष निकाय” के गठन का प्रस्ताव किया गया है।

भारत की न्याय प्रणाली में एआई का उपयोग

  • उच्चतम न्यायालय, उच्च न्यायालयों तथा राष्ट्रीय सूचना विज्ञान केंद्र (NIC) में एआई आधारित उपकरण वर्तमान में निम्नलिखित कार्यों में सहायता प्रदान कर रहे हैं—
    • मौखिक दलीलों का प्रतिलेखन 
    • निर्णयों का अनुवाद
    • ई-फाइलिंग में त्रुटियों की पहचान
    • विधिक अनुसंधान 
    • मेटाडेटा निष्कर्षण
  • विगत एक दशक में न्यायालयों ने सामान्य कंप्यूटरीकरण से आगे बढ़कर राष्ट्रव्यापी डिजिटल मंचों, वास्तविक समय डेटा प्रणालियों, आभासी न्यायालयों तथा बहुभाषी निर्णय उपलब्धता की दिशा में महत्वपूर्ण प्रगति की है।
  • ई-कोर्ट्स परियोजना के अंतर्गत विकसित सॉफ्टवेयर अनुप्रयोगों में एआई तथा इसकी उप-प्रौद्योगिकियों जैसे—
    • मशीन लर्निंग (ML)
    • ऑप्टिकल कैरेक्टर रिकग्निशन (OCR)
    • प्राकृतिक भाषा संसाधन (NLP) का उपयोग किया जा रहा है।

भारत की न्यायपालिका में एआई के उपयोग का महत्व

  •  मामलों के लंबित भार में कमी: भारत की न्यायिक व्यवस्था लंबे समय से लंबित मामलों के अत्यधिक भार का सामना कर रही है, जिससे समयबद्ध न्याय में जनता का विश्वास प्रभावित होता है।
    • एआई वाद प्रबंधन को अधिक कुशल बनाकर लंबित मामलों में कमी ला सकता है।
    • यह न्यायिक प्रक्रियाओं को तीव्र एवं प्रभावी बनाने में सहायक हो सकता है।
  • कारागारों में भीड़भाड़ की समस्या: भारतीय कारागार दशकों से अपनी निर्धारित क्षमता से अधिक कैदियों को समायोजित कर रहे हैं।
    • एआई शिकायत पंजीकरण प्रक्रिया को सुव्यवस्थित कर सकता है।
    • जांच की प्रगति पर निगरानी रख सकता है।
    • आवश्यक कार्रवाई को चिह्नित कर सकता है।
    • जांच की गुणवत्ता का मूल्यांकन करने में सहायता कर सकता है।
  • अनुवाद एवं सुलभता: भारत में 22 अनुसूचित भाषाएँ तथा सैकड़ों बोलियाँ प्रचलित हैं।
    • एआई-संचालित अनुवाद न्यायिक दस्तावेजों एवं निर्णयों को भाषाई बाधाओं से परे अधिक सुलभ बना सकता है।
    • सुवास (SUVAAS – उच्चतम न्यायालय विधिक अनुवाद सॉफ्टवेयर) परियोजना के माध्यम से हजारों निर्णयों का क्षेत्रीय भाषाओं में अनुवाद किया जा चुका है।
  •  सटीकता में वृद्धि: एआई महत्वपूर्ण साक्ष्यों की उपेक्षा को रोक सकता है।
    • यह आपराधिक न्याय प्रक्रिया को अधिक सूक्ष्म, सटीक एवं विश्वसनीय बनाने में सहायता कर सकता है।
  • न्याय तक पहुँच में सुधार: एआई आधारित चैटबॉट एवं वर्चुअल सहायक वादकारियों को न्यायिक प्रक्रियाओं को समझने में सहायता कर सकते हैं।
    • विशेष रूप से वे व्यक्ति जो विधिक प्रतिनिधित्व से वंचित हैं, उनके लिए यह अत्यंत उपयोगी सिद्ध हो सकता है।
    • इसके माध्यम से वाद की स्थिति का पता लगाना तथा याचिकाएँ दायर करना अधिक सरल हो सकता है।

चिंताएँ एवं चुनौतियाँ

  • पक्षपात एवं अत्यधिक निर्भरता: एआई आधारित विधिक अनुसंधान में खोज संबंधी पक्षपात की संभावना हो सकती है, जिससे प्रासंगिक नज़ीरों की उपेक्षा हो सकती है।
    • एआई पर अत्यधिक निर्भरता न्यायिक निर्णयों को मात्र नियम-आधारित निष्कर्षों तक सीमित कर सकती है तथा मानवीय विवेक एवं संवेदनशीलता को कम कर सकती है।
  • डेटा संरक्षण एवं गोपनीयता: न्यायिक डेटा के संग्रहण एवं उपयोग संबंधी स्पष्ट ढाँचों के अभाव में गोपनीयता संबंधी चिंताएँ उत्पन्न होती हैं।
  • अवसंरचनात्मक कमियाँ अनेक न्यायालयों में इंटरनेट संपर्क की असमान उपलब्धता, पुराने हार्डवेयर, तथा सीमित तकनीकी विशेषज्ञता जैसी समस्याएँ विद्यमान हैं।
  • नैतिक चिंताएँ: दंड निर्धारण एवं पैरोल जैसे संवेदनशील क्षेत्रों में एआई के उपयोग से निष्पक्षता और न्याय के नैतिक प्रश्न उत्पन्न होते हैं।
  •  मानवीय अंतर्दृष्टि का अभाव: एआई उन सूक्ष्म एवं मानवीय परिस्थितियों को समझने में असमर्थ हो सकता है, जिनमें सहानुभूति, संवेदनशीलता एवं मानवीय विवेक की आवश्यकता होती है।

आगे की राह

  • एआई उपकरणों के उपयोग में ऐसा संतुलित दृष्टिकोण अपनाया जाना चाहिए, जिससे गोपनीयता, नागरिक स्वतंत्रताओं एवं नैतिक मानकों की रक्षा सुनिश्चित हो सके।
  • साथ ही, एआई के दुरुपयोग को रोकने हेतु प्रभावी सुरक्षा उपाय विकसित किए जाने चाहिए।
  • कृत्रिम बुद्धिमत्ता का समुचित उपयोग भारत की आपराधिक न्याय प्रणाली को अधिक दक्ष, सुलभ एवं न्यायसंगत बना सकता है, बशर्ते संभावित चुनौतियों के समाधान हेतु पर्याप्त सुरक्षा उपायों को लागू किया जाए।

स्रोत: TH

 

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