पाठ्यक्रम: GS3/पर्यावरण; जलवायु परिवर्तन
संदर्भ
- राष्ट्रीय महासागरीय एवं वायुमंडलीय प्रशासन (NOAA) ने वर्ष 2026 में एल नीनो की उच्च संभावना का पूर्वानुमान व्यक्त किया है, जबकि भारतीय मौसम विज्ञान विभाग (IMD) ने सामान्य से कम मानसून का अनुमान लगाया है। इससे कृषि, मुद्रास्फीति तथा आजीविका पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ने की आशंकाएँ बढ़ गई हैं।
एल नीनो तथा वर्ष 2026 के पूर्वानुमान के बारे में
- एल नीनो एक जलवायु घटना है, जिसकी विशेषता मध्य एवं पूर्वी भूमध्यरेखीय प्रशांत महासागर में समुद्र की सतह के तापमान में असामान्य रूप से वृद्धि है।
- यह एल नीनो-दक्षिणी दोलन (ENSO) चक्र का एक चरण है तथा भारत के मानसून सहित वैश्विक मौसम प्रतिरूपों को महत्वपूर्ण रूप से प्रभावित करता है।
एल नीनो-दक्षिणी दोलन (ENSO)
- यह एक प्राकृतिक जलवायु परिघटना है, जिसमें उष्णकटिबंधीय प्रशांत महासागर के ऊपर समुद्र की सतह के तापमान तथा वायुमंडलीय दाब में आवधिक परिवर्तन होते हैं।
- यह वैश्विक मौसम एवं जलवायु परिवर्तनशीलता के सबसे महत्वपूर्ण प्रेरक कारकों में से एक है।
ENSO के घटक
- एल नीनो (उष्ण चरण): इसकी विशेषता मध्य एवं पूर्वी भूमध्यरेखीय प्रशांत महासागर में समुद्र की सतह के तापमान का सामान्य से अधिक होना है।
- यह व्यापारिक पवनों को कर देता है।
- यह प्रायः भारत में सामान्य से कम मानसूनी वर्षा, एशिया एवं ऑस्ट्रेलिया के कुछ भागों में सूखा तथा वैश्विक तापमान में वृद्धि से जुड़ा होता है।

- ला नीना (शीत चरण): इसकी विशेषता उसी क्षेत्र में समुद्र की सतह के तापमान का सामान्य से कम होना है।
- यह व्यापारिक पवनों को सशक्त बनाता है।
- यह प्रायः भारत में सामान्य से अधिक मानसूनी वर्षा, कुछ क्षेत्रों में बाढ़ तथा वैश्विक तापमान में हल्की कमी से संबंधित होता है।

- दक्षिणी दोलन : यह ताहिती (पूर्वी प्रशांत) और डार्विन, ऑस्ट्रेलिया (पश्चिमी प्रशांत) के बीच वायुमंडलीय दाब में होने वाले आवधिक उतार-चढ़ाव को संदर्भित करता है।
- इसका मापन दक्षिणी दोलन सूचकांक (SOI) के माध्यम से किया जाता है।
- दाब में परिवर्तन व्यापारिक पवनों तथा महासागरीय तापमान को प्रभावित करते हैं।
ENSO की कार्यप्रणाली
- सामान्य परिस्थितियों में व्यापारिक पवनें प्रशांत महासागर में पूर्व से पश्चिम की ओर प्रवाहित होती हैं। परिणामस्वरूप गर्म जल इंडोनेशिया एवं ऑस्ट्रेलिया के निकट एकत्रित हो जाता है, जबकि दक्षिण अमेरिका के तट के समीप ठंडा एवं पोषक तत्वों से समृद्ध जल ऊपर उठता है (अपवेलिंग)।
- एल नीनो के दौरान व्यापारिक पवनें हो जाती हैं, गर्म जल पूर्व की ओर स्थानांतरित हो जाता है, अपवेलिंग कम हो जाती है तथा वैश्विक वर्षा प्रतिरूपों में परिवर्तन होता है।
- ला नीना के दौरान व्यापारिक पवनें अधिक सशक्त हो जाती हैं, पश्चिमी प्रशांत में अधिक गर्म जल एकत्रित होता है, अपवेलिंग तीव्र हो जाती है तथा इसके परिणामस्वरूप विपरीत जलवायु प्रभाव उत्पन्न होते हैं।
एल नीनो के प्रभाव
- ताप अर्थव्यवस्था (उत्पादकता में कमी एवं असंगठित श्रमिक): भारत का विशाल असंगठित कार्यबल, जिसमें निर्माण श्रमिक, सड़क विक्रेता, डिलीवरी कर्मी तथा कृषि श्रमिक शामिल हैं, अत्यधिक गर्मी के प्रति विशेष रूप से संवेदनशील है।
- उच्च तापमान के कारण:
- गर्मी के प्रभाव से कार्य घंटों में कमी आती है।
- श्रम उत्पादकता घटती है।
- स्वास्थ्य जोखिम एवं ऊष्मा-जनित बीमारियाँ बढ़ती हैं।
- दैनिक वेतनभोगी श्रमिकों की आय असुरक्षित हो जाती है।
- उच्च तापमान के कारण:
- कृषि संकट एवं ग्रामीण कठिनाइयाँ: कृषि भारतीय अर्थव्यवस्था का सबसे अधिक जलवायु-संवेदनशील क्षेत्र है।
- दक्षिण-पश्चिम मानसून फसलों के लिए आवश्यक लगभग 70% वर्षा उपलब्ध कराता है तथा जलाशयों एवं भूजल भंडारों की पुनर्भरण प्रक्रिया में सहायक होता है।
- मानसून के परिणामस्वरूप:
- बुआई में विलंब अथवा कमी हो सकती है।
- फसल उत्पादकता घट सकती है।
- सिंचाई लागत बढ़ सकती है।
- भूजल दोहन पर निर्भरता बढ़ सकती है।
- लघु एवं सीमांत किसानों के लिए जोखिम बढ़ सकते हैं।
- खाद्य मुद्रास्फीति एवं व्यापक आर्थिक जोखिम: जलवायु संबंधी आघातों का प्रभाव प्रायः सर्वप्रथम खाद्य पदार्थों की बढ़ती कीमतों के रूप में दिखाई देता है।
- सांख्यिकी एवं कार्यक्रम कार्यान्वयन मंत्रालय (MOSPI) द्वारा वर्ष 2026 में जारी उपभोक्ता मूल्य सूचकांक (CPI) के आँकड़ों के अनुसार, अप्रैल 2026 में खाद्य मुद्रास्फीति 4.2% दर्ज की गई।
- मानसून की कमी से दालों, सब्जियों, अनाज तथा खाद्य तेलों की कीमतों पर अतिरिक्त दबाव बढ़ सकता है।
- जल सुरक्षा संबंधी चुनौतियाँ: कम वर्षा का प्रत्यक्ष प्रभाव निम्नलिखित पर पड़ता है:
- जलाशयों के भंडारण स्तर,
- भूजल पुनर्भरण,
- पेयजल उपलब्धता,
- जलविद्युत उत्पादन।
- मानसून विशेष रूप से प्रायद्वीपीय एवं पश्चिमी भारत के सूखा-प्रवण क्षेत्रों में इन चुनौतियों को और गंभीर बना सकता है।
- शहरी संवेदनशीलता एवं बढ़ती असमानता: तीव्र कंक्रीटीकरण, हरित क्षेत्रों में कमी तथा जल निकायों के लुप्त होने के कारण भारतीय नगर तीव्रता से अर्बन हीट आइलैंड में परिवर्तित हो रहे हैं।
- जनस्वास्थ्य संबंधी चिंताएँ: एल नीनो-प्रेरित ताप लहरें एवं जल संकट निम्नलिखित समस्याओं को उत्पन्न कर सकते हैं:
- हीट स्ट्रोक एवं निर्जलीकरण,
- वाहक-जनित रोगों का प्रसार,
- खाद्य मुद्रास्फीति के कारण पोषण सुरक्षा में कमी,
- परिवारों पर स्वास्थ्य व्यय का बढ़ता भार।
- विशेष रूप से सघन जनसंख्या वाले शहरी क्षेत्रों में सार्वजनिक स्वास्थ्य प्रणालियों पर अतिरिक्त दबाव पड़ सकता है।
आगे की राह : जलवायु सहनशीलता का निर्माण
- ताप कार्ययोजनाओं का सुदृढ़ीकरण:नगर-स्तरीय ताप कार्ययोजनाओं का विस्तार किया जाए।
- शीतलन आश्रय एवं पूर्व चेतावनी प्रणालियाँ स्थापित की जाएँ।
- बाहरी श्रमिकों के लिए व्यावसायिक सुरक्षा मानकों का प्रभावी क्रियान्वयन सुनिश्चित किया जाए।
- जलवायु-सहनशील कृषि: सूखा-प्रतिरोधी फसल किस्मों को प्रोत्साहन दिया जाए।
- सूक्ष्म सिंचाई एवं परिशुद्ध कृषि का विस्तार किया जाए।
- फसल बीमा एवं मौसम-आधारित परामर्श सेवाओं को सुदृढ़ बनाया जाए।
- जल संसाधन प्रबंधन: वर्षा जल संचयन को प्रोत्साहित किया जाए।
- जलागम विकास कार्यक्रमों को प्रोत्साहन दिया जाए।
- भूजल प्रबंधन एवं पुनर्भरण पहलों को सुदृढ़ किया जाए।
- शहरी जलवायु सहनशीलता: शहरी हरित क्षेत्रों का विस्तार किया जाए।
- आर्द्रभूमियों एवं जल निकायों का संरक्षण सुनिश्चित किया जाए।
- ऊष्मा-सहनशील शहरी नियोजन को प्रोत्साहन दिया जाए।
- संवेदनशील वर्गों के लिए सामाजिक सुरक्षा: महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी अधिनियम (MGNREGA) तथा आजीविका सहायता कार्यक्रमों को सुदृढ़ किया जाए।
- असंगठित श्रमिकों के लिए सामाजिक सुरक्षा कवरेज का विस्तार किया जाए।
- किफायती शीतलन सुविधाओं एवं स्वास्थ्य सेवाओं तक पहुँच में सुधार किया जाए।
| दैनिक मुख्य परीक्षा अभ्यास प्रश्न [प्रश्न] भारत की कृषि, श्रम बाज़ार, खाद्य सुरक्षा तथा शहरी सहनशीलता पर एल नीनो के सामाजिक-आर्थिक प्रभावों का परीक्षण कीजिए। |
स्रोत: TH
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