भारत की जेलें विचाराधीन  बंदियों के कारण निरंतर अत्यधिक भीड़भाड़ से ग्रस्त 

पाठ्यक्रम: GS2/ शासन / सामाजिक न्याय

संदर्भ

  • राष्ट्रीय अपराध अभिलेख ब्यूरो द्वारा जारी नवीनतम कारागार सांख्यिकी रिपोर्ट से ज्ञात हुआ है कि वर्ष 2024 में भारतीय जेलों का उपयोग दर घटकर दशक के न्यूनतम स्तर 112.7% पर आ गया।
    • फिर भी, भारतीय कारागारों में भीड़भाड़ की समस्या बनी हुई है, जिसका मुख्य कारण विचाराधीन  बंदियों की उच्च संख्या है।

प्रमुख बिंदु

  • जेलों में भीड़भाड़: वर्ष 2024 के अंत में भारत में लगभग 1,333 जेलें थीं जिनकी क्षमता 4.53 लाख बंदियों की थी।
    • किन्तु 5.11 लाख से अधिक बंदियों की वास्तविक संख्या के कारण कारागार अब भी भीड़भाड़ वाले रहे।
  • राज्यों में कारागार क्षमता उपयोग दर : वर्ष 2024 में आधे से अधिक राज्यों में उपयोग दर 100% से अधिक रही। दिल्ली ने देश में सर्वाधिक उपयोग दर 194% दर्ज की।
    • किसी भी जेल का उपयोग दर उस जेल में रखे गए बंदियों की संख्या को उसकी स्वीकृत क्षमता (100) के अनुपात में परिभाषित किया जाता है। यदि यह दर 100 से अधिक हो, तो जेल को भीड़भाड़ वाला माना जाता है।
  • विचाराधीन  बंदियों की अधिक संख्या: वर्ष 2024 में कुल बंदी जनसंख्या का लगभग 73% विचाराधीन  बंदी थे।
    • दिल्ली और बिहार में क्रमशः 87% से अधिक बंदी विचाराधीन थे, जिससे ये राज्य/केंद्रशासित प्रदेश सर्वाधिक अनुपात वाले रहे।

भारत में जेलों की भीड़भाड़ के कारण

  • न्यायिक विलंब: आपराधिक मामलों की भारी लंबित संख्या के कारण विचाराधीन  बंदियों की हिरासत लंबी होती जाती है।
  • अतिअपराधीकरण: छोटे अपराधों के लिए भी कारावास का अत्यधिक प्रयोग जेलों में भीड़  वृद्धि करता है।
  • जमानत संबंधी चुनौतियाँ: आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग वित्तीय कठिनाइयों के कारण जमानत प्राप्त नहीं कर पाते। जागरूकता की कमी और अपर्याप्त कानूनी सहायता भी हिरासत को लंबा करती है।
  • अपर्याप्त कारागार अवसंरचना: बढ़ती बंदी संख्या के अनुरूप कारागार अवसंरचना का विस्तार नहीं हुआ है।

चिंताएँ

  • मूलभूत आवश्यकताओं की पूर्ति में विफलता: भीड़भाड़ के कारण बंदियों की स्वास्थ्य सेवा, भोजन और आवास जैसी मूलभूत आवश्यकताओं की पूर्ति बाधित होती है।
  • मौलिक अधिकारों का हनन: यह बंदियों के पर्याप्त जीवन स्तर और शारीरिक व मानसिक स्वास्थ्य के अधिकार को भी खतरे में डालता है।
  • सुरक्षा और स्वास्थ्य समस्याएँ: भीड़भाड़ सुरक्षा समस्याएँ उत्पन्न करती है, आवश्यक सेवाओं पर दबाव डालती है, गंभीर स्वास्थ्य संकट उत्पन्न करती है और सुधारात्मक कार्यक्रमों को बाधित करती है।
  • प्रशासनिक समस्या: भीड़भाड़ वाले कारागारों में कठोर अपराधियों को कम गंभीर अपराधियों से अलग करना असंभव हो जाता है।
  • अंतरराष्ट्रीय मानक: भीड़भाड़ के कारण बंदियों को संयुक्त राष्ट्र के न्यूनतम मानकों के विपरीत परिस्थितियों में रखा जाता है, जिनका भारत हस्ताक्षरकर्ता है।

कारागार सुधार समितियाँ

  • न्यायमूर्ति ए.एन. मुल्ला समिति (1980–83): विचाराधीन  बंदियों को दोषसिद्ध बंदियों से अलग रखने तथा कारागार की स्थिति, पोषण और स्वच्छता सुधारने की सिफारिश की।
  • न्यायमूर्ति अमिताभ रॉय समिति: कारागारों में भीड़ कम करने, शीघ्र सुनवाई, कानूनी सहायता सुधार और प्रबंधन में तकनीक के प्रयोग की सिफारिश की।
  • कृष्ण अय्यर समिति: महिलाओं के लिए अलग कारागार सुविधाओं का समर्थन किया ताकि शोषण रोका जा सके।

न्यायिक हस्तक्षेप

  • हुसैनारा खातून बनाम बिहार राज्य: सर्वोच्च न्यायालय ने कहा कि शीघ्र सुनवाई का अधिकार अनुच्छेद 21 के अंतर्गत मौलिक अधिकार है।
  • राजस्थान राज्य बनाम बलचंद: सर्वोच्च न्यायालय ने “जमानत नियम है और जेल अपवाद” का सिद्धांत स्थापित किया, जिससे व्यक्तिगत स्वतंत्रता को बल मिला।

सरकारी पहल

  • मॉडल कारागार एवं सुधारात्मक सेवाएँ अधिनियम, 2023:  गृह मंत्रालय ने वर्ष 2023 में ‘मॉडल कारागार एवं सुधारात्मक सेवाएँ अधिनियम’ तैयार किया था।
    • इस अधिनियम में बंदियों के सुधार, पुनर्वास तथा समाज में पुनः एकीकरण के लिए उपयुक्त प्रावधान किए गए हैं। 
    • इसके अतिरिक्त, इसमें ‘बंदी कल्याण कार्यक्रमों’ तथा ‘अनुवर्ती देखभाल एवं पुनर्वास सेवाओं’ को संस्थागत देखभाल के अभिन्न अंग के रूप में शामिल किया गया है।
  • विचाराधीन  बंदी समीक्षा समितियाँ (UTRCs): सर्वोच्च न्यायालय के निर्देशों के अनुपालन में प्रत्येक जिले में विचाराधीन  बंदी समीक्षा समितियों का गठन किया गया है।
    • ये समितियाँ समय-समय पर उन विचाराधीन  बंदियों के मामलों की समीक्षा करती हैं जो जमानत या निजी मुचलके पर रिहाई के पात्र होते हैं। 
    • इससे अनावश्यक एवं दीर्घकालिक निरुद्धता में कमी आती है तथा कारागारों में भीड़भाड़ कम करने में सहायता मिलती है।
  • ई-प्रिज़न्स परियोजना : यह राष्ट्रीय ई-शासन योजना के अंतर्गत एक मिशन मोड परियोजना है।
    • इसके माध्यम से कारागार अभिलेखों का डिजिटलीकरण किया जाता है तथा कारागारों को न्यायालयों, पुलिस और विधिक सेवा प्राधिकरणों से एकीकृत किया जाता है। 
    • इससे जमानत, पैरोल तथा रिहाई संबंधी आदेशों के त्वरित निष्पादन में सुविधा होती है और अनावश्यक विलंब कम होता है।
  • खुले कारागार/खुले सुधारात्मक संस्थान : ये संस्थान पात्र बंदियों को अपेक्षाकृत कम प्रतिबंधात्मक वातावरण में अपनी सजा पूर्ण करने का अवसर प्रदान करते हैं।
    • इससे पारंपरिक कारागारों पर दबाव कम होता है तथा बंदियों के पुनर्वास एवं सामाजिक पुनर्समावेशन को प्रोत्साहन मिलता है।
  • विधिक सहायता एवं जमानत सुधार : राष्ट्रीय विधिक सेवा प्राधिकरण तथा राज्य विधिक सेवा प्राधिकरणों के माध्यम से आर्थिक रूप से कमजोर बंदियों को निःशुल्क विधिक सहायता उपलब्ध कराई जाती है।
    • इसके अतिरिक्त, ‘सपोर्ट टू पुअर प्रिजनर्स स्कीम’ के अंतर्गत उन बंदियों को सहायता प्रदान की जाती है जो जमानत बांड या जुर्माने की राशि वहन करने में असमर्थ होते हैं, जिससे उनकी रिहाई संभव हो पाती है।
  • कारागार अवसंरचना का विस्तार : अनेक राज्यों द्वारा नए सुधारात्मक संस्थानों के निर्माण तथा वर्तमान कारागारों के आधुनिकीकरण हेतु विभिन्न परियोजनाएँ प्रारंभ की गई हैं।
    • इन पहलों का उद्देश्य कारागार क्षमता में वृद्धि करना तथा बंदियों के लिए बेहतर सुविधाएँ उपलब्ध कराना है।

आगे की राह

  • प्रौद्योगिकी का एकीकरण :  अभिलेखों के बेहतर संधारण, निगरानी तथा पारदर्शिता सुनिश्चित करने के लिए डिजिटल कारागार प्रबंधन प्रणालियों को प्रभावी रूप से लागू किया जाना चाहिए।
    • इसके अतिरिक्त, न्यायालयीन सुनवाई को सुगम बनाने तथा अनावश्यक विलंब को कम करने हेतु वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग सुविधाओं का व्यापक विस्तार किया जाना चाहिए।
  • बंदियों का सामाजिक पुनर्समावेशन :  कारागार व्यवस्था में व्यावसायिक प्रशिक्षण तथा कौशल विकास कार्यक्रमों को प्राथमिकता दी जानी चाहिए, जिससे रिहाई के पश्चात बंदियों की रोजगार-योग्यता में वृद्धि हो सके और वे समाज में सम्मानजनक रूप से पुनः स्थापित हो सकें।
  • विधिक सहायता का सुदृढ़ीकरण:  विधिक सहायता तंत्र को अधिक सशक्त बनाया जाना चाहिए ताकि बंदियों, विशेषकर विचाराधीन  बंदियों तथा आर्थिक रूप से कमजोर वर्गों के व्यक्तियों को समयबद्ध एवं प्रभावी विधिक प्रतिनिधित्व उपलब्ध कराया जा सके।
  • कारावास के विकल्पों को प्रोत्साहन :  लघु एवं कम गंभीर अपराधों के मामलों में सामुदायिक सेवा, परिवीक्षा  तथा गैर-अभिरक्षात्मक दंड जैसे विकल्पों को प्रोत्साहित किया जाना चाहिए।
  • खुले कारागार मॉडल का विस्तार:  कारागारों में भीड़भाड़ को कम करने तथा बंदियों के पुनर्वास को बढ़ावा देने के लिए विभिन्न राज्यों में खुले कारागार मॉडल का विस्तार किया जाना चाहिए।

स्रोत: TH

 

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