कृत्रिम जैविकी (Synthetic Biology) की उभरती हुई क्षमता 

पाठ्यक्रम: GS3/ जैव प्रौद्योगिकी

समाचार में

  • जीनोम अनुक्रमण, जीन संपादन, कृत्रिम बुद्धिमत्ता और डीएनए संश्लेषण में हालिया प्रगति ने सिंथेटिक बायोलॉजी के विकास को तीव्र गति प्रदान की है।

सिंथेटिक बायोलॉजी के बारे में

  • सिंथेटिक बायोलॉजी जीवविज्ञान में अभियांत्रिकी सिद्धांतों का अनुप्रयोग है, जिसमें जैविक घटकों को विशिष्ट कार्यों को संपन्न करने हेतु डिज़ाइन, संयोजित और संशोधित किया जाता है।
  • इसमें जीवों को इस प्रकार अभियांत्रिकीकृत किया जाता है कि वे प्रकृति में पाए जाने वाले गुणों से परे नए या उन्नत गुणों को धारण कर सकें।

अनुप्रयोग

  • स्वास्थ्य सेवा: अभियांत्रिकीकृत सूक्ष्मजीव अब आर्टेमिसिनिन (मलेरिया-रोधी) और इंसुलिन का उत्पादन करते हैं, बिना पौधों या पशुओं से निष्कर्षण के।
  • CAR-T सेल थेरेपी, जिसमें प्रतिरक्षा कोशिकाओं को कैंसर पर आक्रमण हेतु पुनः प्रोग्राम किया जाता है, सिंथेटिक बायोलॉजी तकनीकों का प्रत्यक्ष उत्पाद है।
  • कृषि: नाइट्रोजन स्थिरीकरण करने वाले सूक्ष्मजीवों को पौधों को सीधे पोषक तत्व देने हेतु अभियांत्रिकीकृत किया जा रहा है, जिससे रासायनिक उर्वरकों पर निर्भरता घटे।
  • ऊर्जा और पर्यावरण: डिज़ाइनर सूक्ष्मजीव ग्रीनहाउस गैसों जैसे मीथेन को उच्च-मूल्य यौगिकों में परिवर्तित कर सकते हैं।
  • फॉरेंसिक और सामग्री: सिंथेटिक डीएनए वॉटरमार्किंग यह दर्शाती है कि जैविक प्रणालियाँ एन्कोडेड सूचना वहन कर सकती हैं।

चुनौतियाँ और चिंताएँ

  • जैव सुरक्षा और जैव संरक्षा: यदि अभियांत्रिकीकृत जीव गलती से या जानबूझकर छोड़े जाएँ तो वे पारिस्थितिक तंत्र को बाधित कर सकते हैं।
  • नियामक अंतराल: भारत में वर्तमान में सिंथेटिक बायोलॉजी हेतु कोई व्यापक, स्वतंत्र विनियमन नहीं है।
    • डीएनए प्रौद्योगिकी (उपयोग और अनुप्रयोग) विनियमन विधेयक वर्षों से लंबित है (अब वापस ले लिया गया)।
  • अपर्याप्त ढाँचे: पर्यावरण संरक्षण अधिनियम और पुनः संयोजित डीएनए सुरक्षा दिशानिर्देश वर्तमान गतिविधियों के पैमाने के लिए पर्याप्त नहीं हैं।
  • समानता और पहुँच: सिंथेटिक बायोलॉजी जैव विविधता डेटा पर अत्यधिक निर्भर है, जो भारत जैसे मेगाविविध देशों से आता है। किन्तु लाभ प्रायः वैश्विक उत्तर के प्रयोगशालाओं और निगमों को मिलता है। इससे नागोया प्रोटोकॉल से जुड़े “प्रवेश और लाभ साझा करने” (ABS) के प्रश्न उठते हैं।
  • नैतिक चिंताएँ: बहुकोशिकीय जीवों को अभियांत्रिकीकृत करने या निषेचित अंडों में डिज़ाइनर जीनोम डालने की संभावना गहन नैतिक प्रश्न उत्पन्न करती है। चिकित्सा और संवर्धन के बीच की रेखा विवादित बनी हुई है।

भारत की नीतिगत प्रतिक्रिया

  • BioE3 नीति (अर्थव्यवस्था, पर्यावरण और रोजगार हेतु जैव प्रौद्योगिकी): अगस्त 2024 में केंद्रीय मंत्रिमंडल द्वारा अनुमोदित। इसमें छह विषयगत क्षेत्र पहचाने गए हैं – जैव-आधारित रसायन, बायोपॉलिमर, API और स्मार्ट प्रोटीन, प्रिसीजन बायोथेरेप्यूटिक्स, जलवायु-सहिष्णु कृषि एवं कार्बन कैप्चर।
  • भारत की जैव-अर्थव्यवस्था, जो 2014 में मात्र $10 अरब थी, 2024 में $165 अरब पार कर गई और 2030 तक $300 अरब का लक्ष्य रखा गया है। भारत विश्व के उन पहले देशों में है जिनके पास समर्पित जैव-अर्थव्यवस्था नीति ढाँचा है।
  • “मूलांकुर” बायोफाउंड्री हब्स: स्टार्टअप्स, अकादमिक संस्थानों और लघु एवं मध्यम उद्यमों को साझा जैव-निर्माण अवसंरचना तक पहुँच देने हेतु प्रारंभ किए गए।

आगे की राह

  • भारत को एक समर्पित राष्ट्रीय सिंथेटिक बायोलॉजी नीति की आवश्यकता है, जो नियामक ढाँचों को समेकित करे, स्पष्ट जैव सुरक्षा प्रोटोकॉल स्थापित करे और भारत के जैव विविधता-संबंधी डेटा हितों की रक्षा करे।
  • शैक्षणिक पाठ्यक्रमों में पारंपरिक प्रयोगशाला विज्ञान के साथ-साथ संगणनात्मक जीवविज्ञान और कृत्रिम बुद्धिमत्ता को भी सम्मिलित किया जाना चाहिए।
  • कार्टाजेना प्रोटोकॉल और CBD-COP जैसे अंतरराष्ट्रीय मंचों पर भारत की भागीदारी उसके जैव विविधता-समृद्ध राष्ट्र एवं उभरते सिंथेटिक बायोलॉजी शक्ति दोनों रूपों में हितों को प्रतिबिंबित करनी चाहिए।

निष्कर्ष

  • भारत के गुणवत्ता सुधारों का आगामी चरण केवल मानकों और प्रमाणनों की संख्या बढ़ाने तक सीमित नहीं होना चाहिए।
  • अब ध्यान एक विश्वसनीय, भरोसेमंद और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर मान्यता प्राप्त गुणवत्ता शासन प्रणाली बनाने पर होना चाहिए, जो उपभोक्ता संरक्षण, निर्यात प्रतिस्पर्धा और वैश्विक विनिर्माण केंद्र बनने के लक्ष्य को समर्थन दे।

स्रोत: TH

 

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