IMEC: व्यापारिक हितों और भू-राजनीतिक चुनौतियों के मध्य 

पाठ्यक्रम: GS2/अंतरराष्ट्रीय संबंध

संदर्भ

  • ईरान में जारी संघर्ष और होर्मुज़ जलडमरूमध्य में उत्पन्न व्यवधानों ने ऊर्जा सुरक्षा, सामुद्रिक संकरे मार्गों तथा भारत-मध्य पूर्व-यूरोप आर्थिक गलियारे (IMEC) की सामरिक प्रासंगिकता को लेकर वैश्विक चिंताओं को पुनर्जीवित कर दिया है।

भारत-मध्य पूर्व-यूरोप आर्थिक गलियारा (IMEC) के बारे में

  • इसका औपचारिक शुभारंभ 2023 में नई दिल्ली में आयोजित जी-20 शिखर सम्मेलन के दौरान किया गया।
  • यह एक प्रमुख संपर्क पहल है जिसका उद्देश्य भारत को पश्चिम एशिया के माध्यम से यूरोप से जोड़ना है।
  • इसे एक आधुनिक बहु-आयामी गलियारे के रूप में परिकल्पित किया गया है, जो परिवहन लागत को कम कर सकता है, आपूर्ति शृंखला  की स्थिरता को बढ़ा सकता है और एशिया, पश्चिम एशिया तथा यूरोप के बीच आर्थिक एकीकरण को सुदृढ़ कर सकता है।
  • इसका लक्ष्य रेलमार्गों, बंदरगाहों, राजमार्गों, ऊर्जा पाइपलाइनों, डिजिटल संपर्क अवसंरचना तथा हरित हाइड्रोजन गलियारों का एकीकृत नेटवर्क विकसित करना है।
  • इस गलियारे को परंपरागत समुद्री मार्गों—जैसे स्वेज़ नहर और होर्मुज़ जलडमरूमध्य—पर निर्भरता के सामरिक विकल्प के रूप में देखा जाता है।

IMEC की संरचना

  • पूर्वी गलियारा: भारत को समुद्री मार्गों के माध्यम से संयुक्त अरब अमीरात (UAE) से जोड़ता है।
    • भारतीय बंदरगाहों को UAE के जेबेल अली और फुजैरा जैसे बंदरगाहों से जोड़ा जाएगा।
  • मध्य गलियारा: एक स्थलीय रेल और सड़क नेटवर्क जो UAE, सऊदी अरब, जॉर्डन एवं इज़राइल से होकर गुजरता है।
    • यह भूमध्यसागर तट पर स्थित इज़राइली बंदरगाह हाइफ़ा पर समाप्त होता है।
  • पश्चिमी गलियारा: हाइफ़ा को यूरोपीय बंदरगाहों से जोड़ने वाला समुद्री मार्ग।
    • यूरोप के वर्तमान परिवहन नेटवर्क महाद्वीप में वस्तुओं के वितरण को सुगम बनाते हैं।

सामरिक संकरे मार्गों के बंद होने की स्थिति में IMEC का महत्व

  • कमज़ोर समुद्री मार्गों पर निर्भरता में कमी: ईरान संघर्ष ने दिखाया कि होर्मुज़ जलडमरूमध्य में व्यवधान वैश्विक अर्थव्यवस्था को अस्थिर कर सकता है।
    • IMEC एक वैकल्पिक मार्ग प्रदान करता है जो परंपरागत संकरे मार्गों पर अत्यधिक निर्भरता को कम कर सकता है।
  • भारत की ऊर्जा सुरक्षा को सुदृढ़ करना: भारत का कच्चे तेल के आयात पर भारी निर्भर होना परिवहन गलियारों के विविधीकरण को आवश्यक बनाता है।
    • IMEC आपूर्ति व्यवधानों के विरुद्ध स्थिरता को बढ़ा सकता है।
  • आपूर्ति शृंखला  की स्थिरता को सुदृढ़ीकरण: वैश्विक व्यापार को विविध और सुरक्षित लॉजिस्टिक्स नेटवर्क की आवश्यकता होती है।
    • IMEC भारत और यूरोप के बीच तीव्र और अधिक विश्वसनीय परिवहन उपलब्ध करा सकता है।
  • चीन की बेल्ट एंड रोड पहल (BRI) का सामरिक विकल्प: IMEC को प्रायः चीन की BRI के सहयोगी और पारदर्शी विकल्प के रूप में देखा जाता है, जो नियम-आधारित संपर्क को प्रोत्साहन देता है।
  • आर्थिक एकीकरण को प्रोत्साहन : यह गलियारा व्यापार, निवेश, औद्योगिक सहयोग और तकनीकी संपर्क को प्रोत्साहित कर सकता है।
  • हरित ऊर्जा संक्रमण का समर्थन: हरित हाइड्रोजन गलियारों और ऊर्जा ग्रिडों का समावेश वैश्विक जलवायु एवं स्थिरता लक्ष्यों के अनुरूप है।

IMEC से संबंधित प्रमुख चिंताएँ और मुद्दे

  • पश्चिम एशिया में क्षेत्रीय अस्थिरता: गाज़ा संघर्ष और ईरान-इज़राइल टकराव ने प्रस्तावित मार्ग को सीधे प्रभावित किया है, विशेषकर इज़राइल और हाइफ़ा बंदरगाह से जुड़े क्षेत्रों को।
  • खाड़ी बंदरगाहों की संवेदनशीलता: ईरानी हमलों और होर्मुज़ जलडमरूमध्य के आसपास तनाव ने UAE के जेबेल अली और फुजैरा जैसे बंदरगाहों के सामरिक जोखिमों को उजागर किया है।
  • सऊदी अरब-UAE सामरिक मतभेद: सऊदी अरब और UAE के भिन्न भू-राजनीतिक दृष्टिकोण गलियारे के समन्वय और क्रियान्वयन को प्रभावित कर सकते हैं।
  • राजनीतिक स्थिरता पर निर्भरता: IMEC की सफलता सतत क्षेत्रीय सहयोग पर निर्भर करती है, जो संघर्ष-प्रवण क्षेत्र में अनिश्चित बनी हुई है।
  • अवसंरचना की सुरक्षा: संवेदनशील क्षेत्रों से होकर गुजरने वाली रेलमार्ग, बंदरगाह और ऊर्जा पाइपलाइन तोड़फोड़, मिसाइल हमलों और भू-राजनीतिक प्रतिद्वंद्विता के प्रति संवेदनशील हैं।
  • वित्तपोषण और क्रियान्वयन चुनौतियाँ: इस गलियारे को विशाल निवेश, नीतिगत समन्वय और दीर्घकालिक राजनीतिक प्रतिबद्धता की आवश्यकता है।

IMEC के लिए आगे की राह

  • वैकल्पिक मार्गों का विकास: भारत और साझेदार देशों को सुरक्षित विकल्पों की खोज करनी चाहिए, जैसे:
    • ओमान के बंदरगाह (सलालाह, दूक़्म और मस्कट) को पूर्वी प्रवेश बिंदु के रूप में।
    • मिस्र के भूमध्यसागरीय बंदरगाहों को हाइफ़ा के पश्चिमी विकल्प के रूप में।
  • लचीला और अनुकूलनशील ढाँचा: IMEC को एक लचीले संपर्क ढाँचे में विकसित होना चाहिए, जो भू-राजनीतिक परिस्थितियों के अनुसार मार्गों को समायोजित कर सके।
  • क्षेत्रीय कूटनीति का सुदृढ़ीकरण: भारत, फ्रांस और इटली जैसे देशों को सक्रिय रूप से मध्यस्थता करनी चाहिए तथा खाड़ी देशों के बीच क्षेत्रीय सहयोग को प्रोत्साहन देना चाहिए।
  • सामुद्रिक सुरक्षा सहयोग को प्रोत्साहन : संयुक्त नौसैनिक अभ्यास, खुफ़िया जानकारी साझा करना और अवसंरचना संरक्षण तंत्र को संस्थागत रूप दिया जाना चाहिए।
  • आर्थिक परस्पर निर्भरता को प्रोत्साहन : सहभागी देशों के बीच अधिक व्यापार और निवेश संबंध सामरिक अविश्वास को कम कर सकते हैं तथा सहयोग को बेहतर कर सकते हैं।
  • संस्थागत समन्वय तंत्र: एक स्थायी बहुपक्षीय समन्वय निकाय नीतिगत निरंतरता, अवसंरचना वित्तपोषण और विवाद समाधान सुनिश्चित करने में सहायक हो सकता है।

निष्कर्ष

  • ईरान संघर्ष ने ऐसे वैकल्पिक व्यापार और संपर्क गलियारों की सामरिक आवश्यकता को सुदृढ़ किया है, जो संघर्ष क्षेत्रों एवं सामुद्रिक संकरे मार्गों को दरकिनार कर सकें।
  • IMEC एक भू-राजनीतिक और सामरिक परियोजना है, साथ ही एक आर्थिक पहल भी, जिसका उद्देश्य आपूर्ति शृंखला  की स्थिरता और क्षेत्रीय एकीकरण को बढ़ाना है।
  • हालाँकि, इसकी सफलता इस पर निर्भर करेगी कि सहभागी देश पश्चिम एशिया की जटिल भू-राजनीतिक वास्तविकताओं को किस प्रकार संभालते हैं।
  • भारत के लिए, IMEC यूरोप से संपर्क सुदृढ़ करने, ऊर्जा हितों को सुरक्षित करने और भविष्य की वैश्विक व्यापार संरचना को आकार देने में केंद्रीय भूमिका निभाने का ऐतिहासिक अवसर प्रदान करता है।
दैनिक मुख्य परीक्षा अभ्यास प्रश्न
[प्रश्न]:पश्चिम एशिया में उभरते भू-राजनीतिक तनावों की पृष्ठभूमि में भारत–मध्य पूर्व–यूरोप आर्थिक गलियारे (IMEC) के भारत के लिए सामरिक महत्त्व की विवेचना कीजिए। इस गलियारे के समक्ष विद्यमान प्रमुख चुनौतियों का परीक्षण करते हुए इसके सफल क्रियान्वयन हेतु आवश्यक उपाय सुझाइए। 

Source: TH

 

Other News

पाठ्यक्रम: राजव्यवस्था एवं शासन; स्थानीय स्वशासन संदर्भ हाल ही में नेशनल ब्यूरो ऑफ इकोनॉमिक रिसर्च (NBER) द्वारा लगभग 12 लाख वार्ड सदस्यों पर किए गए एक अध्ययन में पाया गया कि पंचायतों में निर्वाचित प्रतिनिधियों की संख्या बढ़ाने मात्र से शासन-प्रदर्शन या कल्याणकारी योजनाओं के वितरण में उल्लेखनीय सुधार नहीं...
Read More

पाठ्यक्रम: GS3/कृषि; अर्थव्यवस्था संदर्भ  हाल ही में, भारत के विभिन्न राज्यों ने विभिन्न गैर-सब्सिडी युक्त विशेष उर्वरकों की बिक्री पर प्रतिबंध लगाए हैं, जिससे भारत के उर्वरक क्षेत्र में नीतिगत सामंजस्य को लेकर प्रश्न उठे हैं। यह स्थिति तब और महत्वपूर्ण हो जाती है जब भारत के प्रधानमंत्री ने सतत...
Read More

पाठ्यक्रम: GS3/अर्थव्यवस्था संदर्भ एक दशक से अधिक समय पश्चात, सांख्यिकी एवं कार्यक्रम कार्यान्वयन मंत्रालय (MoSPI) ने 2022-23 और 2023-24 के उपभोक्ता व्यय सर्वेक्षण (CES) जारी किए, जिससे भारत में गरीबी के आकलन, गरीबी रेखा की पद्धति तथा वास्तविक वंचना की सीमा पर पुनः परिचर्चा प्रारम्भ हो गई। भारत में निर्धनता...
Read More

पाठ्यक्रम: GS2/अंतरराष्ट्रीय संबंध संदर्भ ऑस्ट्रेलिया की विदेश मंत्री पेनी वोंग की भारत यात्रा, क्वाड विदेश मंत्रियों की बैठक के लिए, ने भारत-ऑस्ट्रेलिया व्यापक आर्थिक सहयोग समझौते (CECA) पर चर्चाओं को पुनर्जीवित किया है। भारत-ऑस्ट्रेलिया संबंधों के बारे में भारत और ऑस्ट्रेलिया के संबंध राष्ट्रमंडल, लोकतांत्रिक मूल्यों, क्रिकेट कूटनीति एवं जन-से-जन...
Read More

पाठ्यक्रम: GS3/अर्थव्यवस्था संदर्भ 16वें वित्त आयोग (FC) की सिफारिशों से राज्यों की राजकोषीय स्वायत्तता, संसाधनों के वितरण में समानता एवं दक्षता, तथा परिसीमन के पश्चात उत्पन्न राजनीतिक एवं जनसांख्यिकीय प्रभावों को लेकर परिचर्चा शुरू हो गई है। भारत में वित्त आयोग एवं राजकोषीय संघवाद वित्त आयोग भारतीय संविधान के अनुच्छेद...
Read More

पाठ्यक्रम: GS3/ऊर्जा संदर्भ पश्चिम एशिया में हालिया संघर्ष की गंभीरता और इसके परिणामस्वरूप वैश्विक कच्चे तेल तथा एलएनजी की कीमतों में वृद्धि ने एक बार पुनः भारत के बाह्य ऊर्जा आघातों के प्रति संवेदनशीलता को उजागर किया है। भारत के जीवाश्म ईंधन आयात का लगभग आधा हिस्सा होरमुज़ जलडमरूमध्य से...
Read More
scroll to top