पाठ्यक्रम: GS3: पर्यावरण और पारिस्थितिकी
संदर्भ
- हाल ही में राजस्थान के विभिन्न क्षेत्रों में आए धूल-आंधियों ने उत्तरी भारत को धूल-आंधियों से सुरक्षित रखने में अरावली पर्वतमाला की महत्वपूर्ण पारिस्थितिक भूमिका को उजागर किया।
उत्तर-पश्चिमी भारत में धूल-आंधियाँ
- धूल-आंधियाँ उत्तर-पश्चिमी भारत में प्रायः मानसून-पूर्व अवधि, अर्थात् अप्रैल से जून के महीनों के दौरान आती हैं।
- भूमि सतह के तीव्र ताप से शुष्क एवं अस्थिर वायुमंडलीय परिस्थितियाँ उत्पन्न होती हैं, जो धूल-आंधियों के निर्माण के लिए अनुकूल होती हैं।
- प्रबल दक्षिण-पश्चिमी एवं पश्चिमी पवनें थार मरुस्थल तथा उससे सटे क्षेत्रों से बड़ी मात्रा में धूल को उत्तरी भारत की ओर ले जाती हैं।
अरावली पर्वतमाला उत्तरी भारत की रक्षा कैसे करती है?
- लगभग 692 किलोमीटर (430 मील) लंबाई में उत्तर-पूर्वी दिशा में विस्तृत अरावली पर्वतमाला, जो गुजरात, राजस्थान और हरियाणा राज्यों से होकर दिल्ली तक पहुँचती है, भारत की सबसे प्राचीन पर्वतमाला है।
- इस पर्वतमाला का लगभग दो-तिहाई भाग राजस्थान में स्थित है।
- अरावली जल-पुनर्भरण तंत्रों को समर्थन प्रदान करती है तथा साबरमती और लूनी जैसी नदियों का उद्गम स्थल है।
- यह क्षेत्र बलुआ पत्थर, चूना पत्थर, संगमरमर, ग्रेनाइट, सीसा, जस्ता, ताँबा, स्वर्ण तथा टंग्स्टन जैसे खनिजों से समृद्ध है।
- महत्त्व: अरावली पर्वतमाला थार मरुस्थल और सघन जनसंख्या वाले इंडो-गंगा के मैदानों के मध्य एक प्राकृतिक अवरोधक के रूप में कार्य करती है।
- धूल से युक्त पवनें जब अरावली की पहाड़ियों से टकराती हैं, तो उनकी गति कम हो जाती है, जिससे रेत एवं धूल के कण पश्चिमी ढलानों पर ही जम जाते हैं।
- वनों एवं वनस्पतियों की उपस्थिति वायुमंडल में उपस्थित धूल कणों को अवरुद्ध कर उनकी आवाजाही को कम करती है।
- यह पर्वतमाला मरुस्थलीय परिस्थितियों के पूर्व की ओर विस्तार को रोकने में सहायक है तथा कृषि एवं शहरी क्षेत्रों को अत्यधिक धूल जमाव से सुरक्षित रखती है।
अरावली पर्वतमाला के क्षरण के कारण
- ग्रेनाइट, लाल सिलिका, संगमरमर तथा अन्य खनिजों के व्यापक खनन ने पर्वतमाला की पहाड़ियों एवं प्राकृतिक भू-दृश्यों को क्षति पहुँचाई है।
- वनों एवं प्राकृतिक वनस्पति के हटने से धूल को अवरुद्ध करने तथा मृदा को स्थिर बनाए रखने की अरावली की क्षमता में कमी आई है।
- वन एवं चारागाह भूमि का बस्तियों तथा कृषि क्षेत्रों में रूपांतरण पारिस्थितिकीय सहनशीलता को कमजोर कर रहा है।
अरावली ग्रीन वॉल पहल
- वर्ष 2025 में केंद्र सरकार ने अरावली ‘ग्रीन वॉल’ परियोजना का शुभारंभ किया।
- इस पहल का उद्देश्य अरावली पर्वतमाला के चारों ओर पाँच किलोमीटर के बफर क्षेत्र में हरित आवरण का विस्तार करना है।
- यह परियोजना गुजरात, राजस्थान, हरियाणा और दिल्ली के 29 जिलों को आच्छादित करती है।
- इस परियोजना का लक्ष्य वर्ष 2030 तक 26 मिलियन हेक्टेयर अवनत भूमि का पुनर्स्थापन करना तथा मरुस्थलीकरण के विरुद्ध पारिस्थितिकीय सहनशीलता को सुदृढ़ बनाना है।
स्रोत: IE
Previous article
संक्षिप्त समाचार 30-05-2026
Next article
भारत में सूक्ष्म वित्त का पुनःपरिकल्पन