पाठ्यक्रम: GS3/ विज्ञान और प्रौद्योगिकी / आंतरिक सुरक्षा
संदर्भ
- नायरा एनर्जी के लिए अमेरिकी प्रतिबंध अनुपालन के कारण माइक्रोसॉफ्ट की क्लाउड सेवाओं में व्यवधान की संभावना ने भारत में डिजिटल संप्रभुता की आवश्यकता को रेखांकित किया।
डिजिटल संप्रभुता क्या है?
- डिजिटल संप्रभुता का आशय किसी राष्ट्र की उस क्षमता से है जिसके माध्यम से वह अपने डिजिटल अवसंरचना, डेटा, प्रौद्योगिकियों और साइबरस्पेस को अपने कानूनों एवं रणनीतिक हितों के अनुसार नियंत्रित कर सके।
- इसमें डेटा भंडारण, क्लाउड अवसंरचना, कृत्रिम बुद्धिमत्ता प्रणालियाँ, सेमीकंडक्टर आपूर्ति श्रृंखलाएँ और महत्वपूर्ण डिजिटल सेवाओं पर नियंत्रण शामिल है।
डिजिटल संप्रभुता के महत्व का कारण
- डिजिटल अवसंरचना पर निर्भरता: सरकारें, बैंक, अस्पताल, व्यवसाय और महत्वपूर्ण अवसंरचना तीव्रता से क्लाउड कंप्यूटिंग और डिजिटल प्लेटफॉर्म पर निर्भर हो रही हैं।
- इन सेवाओं में व्यवधान आर्थिक गतिविधि, शासन और राष्ट्रीय सुरक्षा को प्रभावित कर सकता है।
- भूराजनीतिक विखंडन: प्रमुख शक्तियों के बीच तकनीकी प्रतिस्पर्धा वैश्विक डिजिटल परिदृश्य को पुनः आकार दे रही है।
- प्रतिबंध, निर्यात नियंत्रण और प्रौद्योगिकी प्रतिबंध तीव्रता से भूराजनीतिक प्रभाव के उपकरण के रूप में उपयोग किए जा रहे हैं।
- डेटा का रणनीतिक महत्व: डेटा एक महत्वपूर्ण आर्थिक और रणनीतिक संसाधन के रूप में उभरा है और डेटा प्रवाह पर नियंत्रण आर्थिक प्रतिस्पर्धा, नवाचार एवं राष्ट्रीय सुरक्षा को प्रभावित करता है।
भारत का डिजिटल सार्वजनिक अवसंरचना (DPI) मॉडल
- आधार: विश्व का सबसे बड़ा बायोमेट्रिक-आधारित डिजिटल पहचान प्रणाली स्थापित की, जिससे सार्वजनिक और निजी सेवाओं तक सुरक्षित अवं समावेशी पहुँच संभव हुई।
- यूनिफाइड पेमेंट्स इंटरफेस (UPI): डिजिटल भुगतान में क्रांति लाकर त्वरित, कम लागत और अंतःसंचालनीय वित्तीय लेन-देन को संभव बनाया, जिससे वित्तीय समावेशन को बढ़ावा मिला।
- डिजीलॉकर और ई-साइन: सुरक्षित डिजिटल दस्तावेज़ भंडारण और विधिक रूप से मान्य इलेक्ट्रॉनिक प्रमाणीकरण सेवाएँ प्रदान कर कागजरहित शासन को सक्षम बनाया।
- आयुष्मान भारत डिजिटल मिशन (ABDM): अंतःसंचालनीय स्वास्थ्य अभिलेखों और निर्बाध स्वास्थ्य सेवा वितरण के माध्यम से एकीकृत डिजिटल स्वास्थ्य पारिस्थितिकी तंत्र का निर्माण कर रहा है।
- ओपन नेटवर्क फॉर डिजिटल कॉमर्स (ONDC): एक खुला, अंतःसंचालनीय और प्लेटफॉर्म-तटस्थ डिजिटल बाज़ार को प्रोत्साहन देकर ई-कॉमर्स का लोकतंत्रीकरण करने का प्रयास।
भारत की डिजिटल यात्रा में अवसंरचना अंतराल
- विदेशी क्लाउड प्रदाताओं पर निर्भरता: भारत की डिजिटल अर्थव्यवस्था का बड़ा हिस्सा AWS, माइक्रोसॉफ्ट एज़्योर और गूगल क्लाउड द्वारा प्रदत्त क्लाउड सेवाओं पर संचालित होता है।
- महत्वपूर्ण डेटा और सेवाएँ विदेशी न्यायक्षेत्रों द्वारा शासित अवसंरचना पर निर्भर हैं।
- विदेशी AI मॉडलों पर निर्भरता: अधिकांश उन्नत AI प्रणालियाँ और बड़े भाषा मॉडल (LLMs) अमेरिका अवं चीन स्थित कंपनियों द्वारा विकसित किए गए हैं। भारत का उनके प्रशिक्षण डेटा, एल्गोरिद्म, सुरक्षा मानकों और शासन ढाँचों पर सीमित नियंत्रण है।
- सेमीकंडक्टर आपूर्ति श्रृंखलाओं पर निर्भरता: सेमीकंडक्टर डिजिटल प्रौद्योगिकियों का आधार हैं और भारत अभी भी आयातित चिप्स अवं विदेशी विनिर्माण पारिस्थितिकी तंत्र पर भारी निर्भर है।
डिजिटल निर्भरता से जुड़े जोखिम
- रणनीतिक स्वायत्तता के लिए खतरा: महत्वपूर्ण सेवाएँ भूराजनीतिक संकटों के दौरान असुरक्षित हो सकती हैं क्योंकि विदेशी सरकारें प्रतिबंध या नियामक उपायों के माध्यम से प्रतिबंध लगा सकती हैं।
- राष्ट्रीय सुरक्षा चिंताएँ: बाहरी अवसंरचना पर निर्भरता महत्वपूर्ण प्रणालियों को साइबर जोखिमों और आपूर्ति श्रृंखला कमजोरियों के प्रति उजागर कर सकती है।
- आर्थिक कमजोरियाँ: विदेशी डिजिटल प्लेटफॉर्म पर अत्यधिक निर्भरता आर्थिक शक्ति के संकेंद्रण का कारण बन सकती है और घरेलू नवाचार एवं तकनीकी आत्मनिर्भरता को कम कर सकती है।
- सीमित नीतिगत नियंत्रण: विदेशी स्वामित्व वाली डिजिटल अवसंरचना अपने मूल देश के कानूनों के अधीन होती है और राष्ट्रीय नियामकों को आपातकालीन परिस्थितियों में पूर्ण पर्यवेक्षण करने में कठिनाई हो सकती है।
डिजिटल संप्रभुता प्राप्त करने में चुनौतियाँ
- उच्च अवसंरचना लागत: घरेलू क्लाउड, AI और सेमीकंडक्टर क्षमताओं का निर्माण भारी निवेश की माँग करता है।
- प्रौद्योगिकी अंतराल: उन्नत प्रौद्योगिकियों में उच्च प्रवेश बाधाएँ और सीमित स्वदेशी विशेषज्ञता शामिल है।
- संरक्षणवाद का जोखिम: अत्यधिक प्रतिबंध प्रतिस्पर्धात्मकता और उन्नत प्रौद्योगिकियों तक पहुँच को कम कर सकते हैं।
- वैश्विक आपूर्ति श्रृंखला पर निर्भरता: डिजिटल प्रौद्योगिकियाँ जटिल अंतरराष्ट्रीय आपूर्ति श्रृंखलाओं पर निर्भर करती हैं जिन्हें पूरी तरह स्थानीयकृत करना कठिन है।
आगे की राह
- सार्वभौमिक क्लाउड अवसंरचना का विकास: भारत को मेघराज जैसी स्वदेशी क्लाउड पहलों का विस्तार करना चाहिए और घरेलू क्लाउड प्रदाताओं को महत्वपूर्ण क्षेत्रों का समर्थन करने के लिए प्रोत्साहित करना चाहिए।
- डेटा शासन का सशक्तिकरण : संवेदनशील और महत्वपूर्ण डेटा भारत के न्यायक्षेत्र के भीतर संग्रहीत और संसाधित किया जाना चाहिए।
- स्वदेशी AI पारिस्थितिकी तंत्र को प्रोत्साहन : AI अनुसंधान, कंप्यूटिंग अवसंरचना और भारतीय आवश्यकताओं के अनुरूप भाषा मॉडलों में निवेश बढ़ाया जाना चाहिए।
- अंतरराष्ट्रीय सहयोग को बेहतर करना: भारत को अफ्रीका, दक्षिण-पूर्व एशिया और लैटिन अमेरिका के देशों के साथ DPI साझेदारियों का लाभ उठाना चाहिए।
स्रोत: IE
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