पाठ्यक्रम: GS3/अर्थव्यवस्था
संदर्भ
- हाल ही में, ‘मेक इन इंडिया’ ने अपने 12 वर्ष पूरे किए हैं। इस अवधि में भारत के विनिर्माण क्षेत्र का विस्तार इलेक्ट्रॉनिक्स, ऑटोमोबाइल, फार्मास्यूटिकल्स, इस्पात, रेलवे, रक्षा और रणनीतिक प्रौद्योगिकियों सहित विभिन्न क्षेत्रों में हुआ है।
मेक इन इंडिया के बारे में
- ‘मेक इन इंडिया’ का शुभारंभ 25 सितंबर 2014 को भारत को विनिर्माण, डिजाइन और नवाचार का वैश्विक केंद्र बनाने के उद्देश्य से किया गया था।
- इसकी व्यापक रणनीति ‘न्यूनतम सरकार, अधिकतम शासन’ के सिद्धांत के अंतर्गत निवेश को सुगम बनाने, नवाचार को प्रोत्साहित करने, बुनियादी ढाँचे में सुधार करने तथा सरकारी प्रक्रियाओं को सरल बनाने पर आधारित थी।
- समय के साथ यह पहल ‘मेक इन इंडिया 2.0’ के रूप में विकसित हुई, जिसके अंतर्गत 27 क्षेत्र—15 विनिर्माण और 12 सेवा क्षेत्र—शामिल किए गए हैं।
मेक इन इंडिया की उपलब्धियाँ
- विनिर्माण क्षेत्र में वृद्धि: वर्ष 2022-23 से 2025-26 तक स्थिर कीमतों पर विनिर्माण क्षेत्र का सकल मूल्य वर्धन (GVA) 10.88% की चक्रवृद्धि वार्षिक वृद्धि दर (CAGR) से बढ़ा।
- विनिर्माण क्षेत्र का औद्योगिक उत्पादन सूचकांक (IIP) अप्रैल-जुलाई 2026 के दौरान वर्ष 2025 की इसी अवधि की तुलना में 7% बढ़ा।
- इलेक्ट्रॉनिक्स का उत्पादन वर्ष 2014-15 के लगभग ₹1.9 लाख करोड़ से लगभग सात गुना बढ़कर वर्ष 2025-26 में ₹13.11 लाख करोड़ हो गया।
- वर्ष 2024-25 में वाहनों का उत्पादन 3.103 करोड़ इकाई रहा, जो वर्ष 2014-15 की तुलना में लगभग 33% अधिक था।
- कच्चे इस्पात का उत्पादन 8.17 करोड़ टन से बढ़कर 17 करोड़ टन हो गया।
- घरेलू रक्षा विनिर्माण ₹46,429 करोड़ से बढ़कर वर्ष 2025-26 में रिकॉर्ड ₹1.78 लाख करोड़ हो गया।
- भारत का फार्मास्यूटिकल क्षेत्र वर्तमान में मात्रा के आधार पर विश्व का तीसरा सबसे बड़ा और मूल्य के आधार पर 11वाँ सबसे बड़ा क्षेत्र है। वर्ष 2025-26 में इसकी बिक्री ₹5,08,630 करोड़ रही।

- घरेलू क्षमताओं का विस्तार: भारत ने अंतरिक्ष अनुप्रयोगों के लिए स्वदेशी VIKRAM3201 और KALPANA3201 माइक्रोप्रोसेसर विकसित किए हैं।
- सौर मॉड्यूल उत्पादन क्षमता वर्ष 2014 में 2.3 GW से बढ़कर जून 2026 में 192 GW हो गई।
- इलेक्ट्रिक वाहनों (EV) के ड्राइव सिस्टम, विमान संरचनाओं, रेलवे के कलपुर्जों तथा परमाणु घटकों के क्षेत्र में स्वदेशी क्षमताएँ विकसित हुई हैं।
- रणनीतिक रूप से आवश्यक प्रौद्योगिकी में क्षमता विकसित करने के प्रयास के अंतर्गत हैदराबाद स्थित ARCI में Nd-Fe-B दुर्लभ-पृथ्वी स्थायी चुंबकों के लिए एक पायलट संयंत्र स्थापित किया जा रहा है।
- पूंजीगत वस्तुएँ और मशीनरी: पूंजीगत वस्तुओं तथा भारी इंजीनियरिंग उपकरणों का विनिर्माण वर्ष 2019-20 के ₹2.87 लाख करोड़ से लगभग चार गुना बढ़कर वर्ष 2024-25 में ₹5.70 लाख करोड़ के करीब पहुँच गया।
- अर्थमूविंग और खनन मशीनरी में 160.3%, मशीन टूल्स में 132.2% तथा भारी विद्युत उपकरणों में 103.5% की वृद्धि हुई।
- सुधार एवं निवेश: ‘मेक इन इंडिया’ को संस्थागत सुधारों और निवेश सुगमता संबंधी पहलों का समर्थन प्राप्त हुआ है:
- वर्ष 2014-15 से 2025-26 के दौरान संचयी प्रत्यक्ष विदेशी निवेश (FDI) 843 अरब डॉलर रहा।
- राष्ट्रीय एकल खिड़की प्रणाली (NSWS) के अंतर्गत 327 से अधिक केंद्रीय और 3,452 राज्य स्तरीय अनुमोदन शामिल हैं।
- इंडिया इंडस्ट्रियल लैंड बैंक ने 4,220 औद्योगिक पार्कों का मानचित्रण किया है।
- पीएम गतिशक्ति के नेटवर्क प्लानिंग ग्रुप ने ₹18.66 लाख करोड़ की लागत वाली 396 परियोजनाओं का मूल्यांकन किया है।
- 14 क्षेत्रों में उत्पादन से जुड़ी प्रोत्साहन (PLI) योजनाओं ने ₹23.8 लाख करोड़ के उत्पादन एवं बिक्री तथा 14.6 लाख रोजगारों को समर्थन दिया है। वहीं, स्टार्टअप इंडिया के अंतर्गत 2.54 लाख से अधिक स्टार्टअप मान्यता प्राप्त कर चुके हैं।
- शुरू की गई नई पहलें: आगामी चरण रणनीतिक क्षेत्रों पर अधिक केंद्रित हो रहा है:
- सेमीकॉन 2.0: ₹1.275 लाख करोड़
- मोबाइल फोन विनिर्माण योजना: ₹62,500 करोड़
- भारत औद्योगिक विकास योजना (BHAVYA): 100 औद्योगिक पार्कों के लिए ₹33,660 करोड़
- दुर्लभ-पृथ्वी चुंबक योजना: ₹7,280 करोड़
- भारत औद्योगिक विकास योजना रसायन (BHAVYA Rasayan): तीन रासायनिक पार्कों के लिए ₹3,030 करोड़
- विशेष इस्पात के लिए PLI: CRGO स्टील, टाइटेनियम मिश्रधातु और कोटेड स्टील जैसी उन्नत श्रेणियों को शामिल किया गया है।

संबंधित मुद्दे एवं चिंताएँ
- उत्पादन में वृद्धि का स्वतः अर्थ यह नहीं है कि घरेलू मूल्यवर्धन, व्यापक स्तर पर रोजगार या वैश्विक मूल्य शृंखलाओं के साथ सुदृढ़ एकीकरण भी उसी अनुपात में बढ़ेगा।
- भारत को अभी भी MSME प्रतिस्पर्धात्मकता, कौशल की कमी, प्रौद्योगिकी अधिग्रहण, लॉजिस्टिक्स, महत्वपूर्ण इनपुट पर निर्भरता तथा वैश्विक विनिर्माण नेटवर्क के साथ असमान एकीकरण जैसी चुनौतियों का सामना करना पड़ रहा है।
- इसलिए प्रमुख चुनौती यह सुनिश्चित करना है कि विनिर्माण क्षेत्र की वृद्धि रोजगार-प्रधान, नवाचार-संचालित और निर्यात-उन्मुख बने तथा यह केवल चुनिंदा क्षेत्रों या उत्पादन के कुछ चरणों तक सीमित न रहे।
आगे की राह
- भारत को असेंबली-आधारित विनिर्माण से आगे बढ़कर अधिक सुदृढ़ मूल्यवर्धन की दिशा में आगे बढ़ने की आवश्यकता है। इसके लिए:
- MSME को वैश्विक मूल्य शृंखलाओं में एकीकृत करना।
- सार्वजनिक और निजी क्षेत्र के अनुसंधान एवं विकास (R&D) तथा उद्योग-शैक्षणिक सहयोग को बढ़ाना।
- सेमीकंडक्टर, EV, एयरोस्पेस, जैव-प्रौद्योगिकी और उन्नत विनिर्माण के लिए विशेष कौशल विकसित करना।
- महत्वपूर्ण खनिजों, दुर्लभ-पृथ्वी तत्वों और रणनीतिक घटकों के लिए विश्वसनीय घरेलू आपूर्ति शृंखलाएँ विकसित करना।
- औद्योगिक प्रोत्साहनों को उत्पादकता, निर्यात, नवाचार और प्रौद्योगिकी हस्तांतरण के साथ अधिक निकटता से जोड़ना।
- राज्यों और स्थानीय स्तरों पर लॉजिस्टिक्स, बुनियादी ढाँचे और कारोबार करने में सुगमता में सुधार करना।
निष्कर्ष
- 12 वर्षों के बाद ‘मेक इन इंडिया’ का स्वरूप बदल रहा है। अब ध्यान केवल ‘अधिक उत्पादन करने’ पर नहीं, बल्कि मूल्य शृंखला के अधिकाधिक हिस्से का भारत में ही निर्माण करने पर है।
- आगामी चरण यह निर्धारित करेगा कि विस्तारित उत्पादन क्षमता किस सीमा तक प्रौद्योगिकी नेतृत्व, उत्पादक रोजगार, सुदृढ़ आपूर्ति शृंखलाओं और वैश्विक विनिर्माण में भारत की सतत भागीदारी में परिवर्तित हो पाती है।
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संक्षिप्त समाचार 24-09-2026