पाठ्यक्रम: जीएस-2/ स्वास्थ्य, जीएस-3/ अर्थव्यवस्था
सन्दर्भ
- दुर्लभ रोगों के बढ़ते बोझ ने भारत के दुर्लभ-रोग औषधीय पारिस्थितिकी तंत्र को मजबूत करने और किफायती दवा निर्माण में अपनी क्षमताओं का लाभ उठाने की आवश्यकता को उजागर किया है।
दुर्लभ रोग क्या हैं?
- दुर्लभ रोग ऐसी स्थितियाँ हैं जो किसी आबादी में बहुत कम बार होती हैं।
- इनकी पहचान तीन प्रमुख संकेतकों से होती है: रोग से प्रभावित लोगों की कुल संख्या, प्रसार तथा उपचार विकल्पों की उपलब्धता/अनुपलब्धता।
- विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) के अनुसार, दुर्लभ रोग ऐसी स्थिति है जो आबादी के एक छोटे प्रतिशत को प्रभावित करती है, सामान्यतः 1,000 से 2,000 लोगों में 1 से कम।
- विश्व स्तर पर लगभग 8,000 दुर्लभ रोग हैं, जबकि भारत में 1,004 दुर्लभ आनुवंशिक विकारों की सूचना दी गई है।
- दुर्लभ रोगों के उपचार के लिए विकसित दवाओं को अनाथ दवाएँ कहा जाता है।
वैश्विक अनाथ दवा बाजार
- अमेरिकी अनाथ दवा अधिनियम, 1983 ने दुर्लभ रोगों के लिए दवाओं के विकास हेतु वित्तीय और नियामक प्रोत्साहन की शुरुआत की।
- इस अधिनियम से पहले संयुक्त राज्य अमेरिका ने केवल 38 अनाथ दवाओं को मंजूरी दी थी, जबकि 2022 तक 1,122 दवाओं को मंजूरी दी जा चुकी थी।
- इन प्रोत्साहनों के बावजूद, अनुसंधान, विकास और उपचार की उच्च लागत रोगियों की उपचार तक पहुँच को सीमित करती रहती है।
दुर्लभ-रोगों की दवाओं के विकास में चुनौतियाँ
- वाणिज्यिक प्रोत्साहन: व्यक्तिगत दुर्लभ रोगों से पीड़ित रोगियों की कम संख्या इन दवाओं के संभावित बाजार को सीमित करती है, जिससे दवा कंपनियों के लिए अनुसंधान और विकास में निवेश करने के वाणिज्यिक प्रोत्साहन कम हो जाते हैं।
- नैदानिक परीक्षण: पर्याप्त रूप से बड़े रोगी समूहों की पहचान करना कठिन होता है, क्योंकि व्यक्तिगत दुर्लभ रोग अपेक्षाकृत कम लोगों को प्रभावित करते हैं।
- नियामक बाधाएँ: जटिल नियामक प्रक्रियाएँ और अतिरिक्त नैदानिक अध्ययनों की आवश्यकता भारत में अनाथ दवाओं को बाजार में लाने में लगने वाले समय और लागत को बढ़ाती है।
भारत के दुर्लभ-रोग औषधीय क्षेत्र की संभावनाएँ
- विविध रोगी आबादी: भारत की बड़ी आबादी और अंतर्विवाह के कारण कुछ आनुवंशिक विकारों की अधिक व्यापकता रोगियों की पहचान और नैदानिक परीक्षणों के लिए अवसर प्रदान करती है।
- विनिर्माण क्षमताएँ: जेनेरिक दवाओं, जैव-समान दवाओं और सीएआर-टी कोशिका चिकित्सा सहित उन्नत उपचारों में भारत की विशेषज्ञता अनाथ दवाओं के विनिर्माण के लिए मजबूत आधार प्रदान करती है।
- कुशल पेशेवर, स्थापित बुनियादी ढाँचा और अपेक्षाकृत कम उत्पादन लागत किफायती, छोटे पैमाने के उत्पादन को समर्थन दे सकते हैं।
- अंतरराष्ट्रीय सहयोग: विदेशी दवा कंपनियों, भारतीय अनुसंधान संस्थानों और रोगी संगठनों के बीच साझेदारी दवा विकास और नैदानिक परीक्षणों को तेज कर सकती है।
भारत में दुर्लभ-रोगों की दवा के विकास को बढ़ावा देने के उपाय
- नई दवाएँ और नैदानिक परीक्षण नियम, 2019 के नियम 101 के तहत, केंद्रीय औषधि मानक नियंत्रण संगठन (CDSCO) ने छह देशों को निर्दिष्ट किया है—जिनमें अमेरिका और ब्रिटेन भी शामिल हैं। यदि इन देशों में से किसी एक देश द्वारा किसी दवा को मंजूरी दी जाती है, तो भारतीय नियामक से मंजूरी माँगने से पहले उस दवा के निर्माता के लिए भारत में नया नैदानिक परीक्षण कराना आवश्यक नहीं होता।
- औषध विभाग ने फार्मास्यूटिकल्स के लिए उत्पादन-आधारित प्रोत्साहन (PLI) योजना शुरू की है, जिसके तहत अनाथ दवाओं के घरेलू उत्पादन के लिए चयनित निर्माताओं को वित्तीय प्रोत्साहन दिया जाता है।
दुर्लभ रोगों के लिए राष्ट्रीय नीति (NPRD), 2021
- इसे 2021 में शुरू किया गया था, जिसके तहत किसी चिन्हित उत्कृष्टता केंद्र (CoE) में उपचार प्राप्त करने वाले रोगियों को 50 लाख रुपये तक की वित्तीय सहायता प्रदान की जाती है।
- भारत में दुर्लभ रोगों को उपलब्ध उपचार विकल्पों की प्रकृति और जटिलता के आधार पर तीन समूहों में वर्गीकृत किया गया है।
- समूह 1 में वे रोग शामिल हैं जिनका उपचार एक बार की उपचारात्मक प्रक्रिया द्वारा किया जा सकता है।
- समूह 2 के रोगों में दीर्घकालिक या आजीवन उपचार की आवश्यकता होती है, जो अपेक्षाकृत कम महंगे हैं और जिनके लाभ प्रमाणित हैं, लेकिन रोगियों को नियमित जाँच की आवश्यकता होती है।
- समूह 3 में वे रोग शामिल हैं जिनके लिए प्रभावी उपचार उपलब्ध हैं, लेकिन वे महंगे हैं और अक्सर आजीवन जारी रखने पड़ते हैं।
दुर्लभ रोगों के उपचार के लिए की गई पहल
- वंशानुगत विकारों के प्रबंधन के लिए विशिष्ट विधियाँ (UMMID) पहल का उद्देश्य प्रारंभिक जाँच, किफायती आणविक निदान और चिकित्सकीय परामर्श के माध्यम से नवजात शिशुओं तथा दुर्लभ आनुवंशिक विकारों से निपटना है।
- इसके तहत सरकारी अस्पतालों में निदान केंद्र (NIDAN Kendras) स्थापित किए जाते हैं, जो प्रसवपूर्व परीक्षण, आनुवंशिक परामर्श और बहुविषयक देखभाल प्रदान करते हैं।
आगे की राह
- भारत की स्थापित औषधि विनिर्माण क्षमताएँ, विविध रोगी आबादी और बढ़ता जैव-प्रौद्योगिकी क्षेत्र दुर्लभ-रोगों की दवाओं के विकास के क्षेत्र में विस्तार के अवसर प्रदान करते हैं।
- अनुसंधान सहायता, सरल नियामक व्यवस्था, सतत वित्तपोषण और रोगियों के लिए सुनिश्चित उपचार उपलब्धता को एकीकृत करने वाला समन्वित दृष्टिकोण भारत को वैश्विक स्तर पर प्रतिस्पर्धी अनाथ दवा उद्योग विकसित करने में सहायता कर सकता है, साथ ही अपनी आबादी की अपूर्ण स्वास्थ्य आवश्यकताओं को भी पूरा कर सकता है।
स्रोत: TH