प्रहार: राष्ट्रीय आतंकवाद-रोधी नीति

पाठ्यक्रम: जीएस-3/ आंतरिक सुरक्षा 

चर्चा में क्यों?

  • केंद्रीय गृह मंत्री ने नई दिल्ली में ‘प्रहार – CT नीति और रणनीति’ पर आयोजित सम्मेलन का उद्घाटन किया।

प्रहार

  • गृह मंत्रालय ने 23 फरवरी, 2026 को ‘प्रहार’ को भारत की पहली व्यापक राष्ट्रीय आतंकवाद-रोधी नीति एवं रणनीति के रूप में प्रस्तुत किया।
  • यह भारत के आतंकवाद-रोधी दृष्टिकोण को एक व्यापक खतरे के परिदृश्य के अंतर्गत रखती है, जिसमें सीमा-पार आतंकवाद, वैश्विक उग्रवादी नेटवर्क जैसे अल-कायदा और आईएसआईएस, तथा ड्रोन, एन्क्रिप्टेड संचार, साइबर हमले, क्रिप्टो-माध्यम से वित्तपोषण और सीबीआरएनईडी खतरों जैसी आधुनिक तकनीकी जोखिम शामिल हैं।
  • इसमें सात स्तंभों वाली रणनीति प्रस्तावित की गई है, जिसमें खुफिया-आधारित रोकथाम, तीव्र समन्वित प्रतिक्रिया, क्षमता निर्माण, मानवाधिकारों का अनुपालन, कट्टरपंथ से मुक्ति, अंतरराष्ट्रीय सहयोग तथा सामाजिक पुनर्प्राप्ति एवं लचीलापन शामिल हैं।
  • यह मुख्यतः राष्ट्रीय जाँच एजेंसी (NIA), राष्ट्रीय सुरक्षा गार्ड (NSG), गैरकानूनी गतिविधियाँ (रोकथाम) अधिनियम (UAPA) और केंद्रीय सशस्त्र पुलिस बलों (CAPFs) जैसी मौजूदा संस्थाओं और कानूनों को एकल राष्ट्रीय ढाँचे में समेकित करती है, न कि नई संरचनाओं का निर्माण करती है।

महत्व

  • पहली व्यापक राष्ट्रीय नीति: विभिन्न एजेंसियों के बीच आतंकवाद-रोधी कार्रवाई के लिए एक एकीकृत ढाँचा स्थापित करती है।
  • बहु-क्षेत्रीय सुरक्षा: भूमि, वायु, जल और साइबर क्षेत्र के माध्यम से उत्पन्न खतरों को शामिल करती है तथा बिजली, रेलवे, विमानन, बंदरगाह, रक्षा, अंतरिक्ष और परमाणु ऊर्जा जैसे महत्वपूर्ण क्षेत्रों की सुरक्षा करती है।
  • शून्य-सहिष्णुता का सिद्धांत: भारत के इस रुख को मजबूत करती है कि आतंकवाद को किसी धर्म, जातीयता या राष्ट्रीयता से नहीं जोड़ा जा सकता।
  • क्षमता निर्माण: खुफिया एजेंसियों, पुलिस और अर्धसैनिक बलों के बीच समन्वय को बेहतर बनाती है।
  • वैश्विक समन्वय: अंतरराष्ट्रीय आतंकवाद-रोधी सहयोग को आकार देने में भारत की भूमिका को मजबूत करती है।

भारत के आतंकवाद-रोधी ढाँचे की उभरती चुनौतियाँ और चिंताएँ 

  • सीमा-पार आतंकवाद: पड़ोसी क्षेत्रों में राज्य-समर्थित समूहों द्वारा लगातार घुसपैठ और समर्थन।
  • साइबर-सक्षम खतरे: राष्ट्र-राज्य और आपराधिक हैकर भारत के डिजिटल बुनियादी ढाँचे को निशाना बना रहे हैं।
  • डार्क वेब मंच: हथियारों, विस्फोटकों और चोरी किए गए आँकड़ों की गुमनाम खरीद की अनुमति देते हैं, जिससे खुफिया निगरानी और अधिक जटिल हो जाती है।
  • ड्रोन युद्ध: हथियारों और विस्फोटकों की तस्करी के लिए ड्रोन का बढ़ता उपयोग, विशेष रूप से पंजाब और जम्मू-कश्मीर में।
  • संगठित अपराध-आतंकवाद गठजोड़: आतंकवादी संगठन रसद और भर्ती के लिए आपराधिक नेटवर्क के साथ सहयोग कर रहे हैं।
  • कट्टरपंथ: अल-कायदा और आईएसआईएस जैसे समूहों का ऑनलाइन प्रचार और उनके स्लीपर सेल हिंसा भड़काने का प्रयास कर रहे हैं।
  • सुरक्षा एजेंसियों के अनुसार, कट्टरपंथ फैलाने वाले अभियानों में चरमपंथी समूहों द्वारा कृत्रिम बुद्धिमत्ता से तैयार प्रचार सामग्री और स्वचालित बॉट नेटवर्क का बढ़ता उपयोग किया जा रहा है।
  • विशेषीकृत आतंकवाद-रोधी प्रशिक्षण क्षमता की कमी: अनेक पुलिस बलों के पास अभी भी साइबर खुफिया, ड्रोन का पता लगाने और डिजिटल निगरानी प्रौद्योगिकियों में उन्नत प्रशिक्षण का अभाव है।

आगे की राह

  • खुफिया तंत्र का एकीकरण मजबूत करना: केंद्रीय और राज्य एजेंसियों के बीच वास्तविक समय में आँकड़ों के आदान-प्रदान का विस्तार करना।
  • साइबर सुरक्षा में उन्नयन: कृत्रिम बुद्धिमत्ता आधारित निगरानी प्रणालियों और स्वदेशी साइबर सुरक्षा समाधानों में निवेश करना।
  • ड्रोन-रोधी उपाय: ड्रोन-रोधी प्रौद्योगिकियों की तैनाती और अधिक कठोर सीमा निगरानी करना।
  • सामुदायिक लचीलापन: नागरिक समाज और स्थानीय शासन को शामिल करते हुए कट्टरपंथ के विरुद्ध जागरूकता अभियान चलाना।
  • अंतरराष्ट्रीय सहयोग: आतंकवाद के वित्तपोषण, हथियारों की तस्करी और उग्रवादी प्रचार का मुकाबला करने के लिए संयुक्त राष्ट्र तथा वैश्विक साझेदारों के साथ सहयोग को गहरा करना।
  • कानूनी सुधार: न्यायिक निगरानी सुनिश्चित करते हुए उभरती प्रौद्योगिकियों से संबंधित खतरों से निपटने के लिए आतंकवाद-रोधी कानूनों को अद्यतन करना।
  • पीड़ित सहायता प्रणाली: आतंकवाद से प्रभावित पीड़ितों के लिए पुनर्वास और मुआवजा संबंधी व्यवस्थाओं को संस्थागत रूप देना।

निष्कर्ष

  • प्रहार भारत का पहला संस्थागत आतंकवाद-रोधी सिद्धांत है, जो रोकथाम, आनुपातिक प्रतिक्रिया और लचीलेपन को एक साथ जोड़ता है।
  • प्रहार की प्रभावशीलता स्पष्ट राज्य-वार दिशा-निर्देशों, पुलिस और आतंकवाद-रोधी दस्तों की क्षमता निर्माण तथा खुफिया जानकारी साझा करने, कानून-व्यवस्था और सामुदायिक सहभागिता के लिए एजेंसियों के बीच मजबूत समन्वय के माध्यम से जमीनी स्तर पर इसके कार्यान्वयन पर निर्भर करेगी।
  • इसके लिए निगरानी तंत्र की भी आवश्यकता है, ताकि सुरक्षा नियोजन में सामाजिक-आर्थिक और “सम्पूर्ण समाज” आधारित उपायों के एकीकरण को सुनिश्चित किया जा सके।

स्रोत:IE

 

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