पाठ्यक्रम: GS3/रक्षा & सुरक्षा
संदर्भ
- चीन द्वारा अपनी परमाणु क्षमताओं का विस्तार करने, पाकिस्तान द्वारा सामरिक परमाणु विकल्प विकसित करने तथा नई प्रौद्योगिकियों द्वारा परमाणु प्रतिरोध की स्थिरता को प्रभावित करने के बीच भारत का परमाणु सिद्धांत एक बार फिर चर्चा में है।
भारत के परमाणु सिद्धांत के बारे में
- भारत का परमाणु सिद्धांत 1990 के दशक के उत्तरार्ध की सामरिक परिस्थितियों से विकसित हुआ।
- मई 1998 में पोखरण-II परमाणु परीक्षणों और उसके बाद 1999 में हुए कारगिल संघर्ष ने यह प्रदर्शित किया कि परमाणु हथियार बड़े पैमाने पर संघर्ष के विस्तार को रोक सकते हैं, लेकिन आवश्यक रूप से पारंपरिक संघर्ष को रोक नहीं सकते।
- 1999 के प्रारूप परमाणु सिद्धांत ने व्यापक रूपरेखा प्रदान की, जिसे बाद में 2003 में मंत्रिमंडल की सुरक्षा संबंधी समिति द्वारा आधिकारिक परिचालन ढाँचा प्रदान किया गया।
- यह ढाँचा मुख्य रूप से विश्वसनीय न्यूनतम प्रतिरोध, पहले प्रयोग न करने की नीति, हमले के बाद भी प्रतिघात करने में सक्षम परमाणु बल तथा नागरिक नियंत्रण पर केंद्रित है।
- इसका उद्देश्य परमाणु हमले को रोकने के लिए पर्याप्त क्षमता बनाए रखना है, साथ ही अनिश्चितकालीन हथियारों की प्रतिस्पर्धा से बचना है।
परमाणु सिद्धांत की प्रमुख विशेषताएँ
- विश्वसनीय न्यूनतम प्रतिरोध: भारत अन्य परमाणु शक्तियों के साथ संख्यात्मक समानता स्थापित करने का प्रयास नहीं करता।
- इसका उद्देश्य परमाणु दबाव को रोकने तथा जवाबी कार्रवाई सुनिश्चित करने के लिए पर्याप्त विश्वसनीय न्यूनतम क्षमता बनाए रखना है।
- पहले प्रयोग न करने की नीति: भारत ने घोषित किया है कि वह परमाणु हथियारों का पहले प्रयोग नहीं करेगा।
- हालाँकि, 2003 के मंत्रिमंडल की सुरक्षा संबंधी समिति के वक्तव्य में यह प्रावधान किया गया था कि भारत अपने या भारतीय सशस्त्र बलों के विरुद्ध बड़े पैमाने पर जैविक या रासायनिक हमले की स्थिति में परमाणु जवाबी कार्रवाई का विकल्प सुरक्षित रखता है।
- व्यापक जवाबी कार्रवाई: 2003 की व्यवस्था में कहा गया था कि भारत या उसकी सेनाओं के विरुद्ध परमाणु हमला ऐसी व्यापक जवाबी कार्रवाई को आमंत्रित करेगा, जिसका उद्देश्य अस्वीकार्य क्षति पहुँचाना होगा।
- इसका उद्देश्य परमाणु सीमा का उल्लंघन करने के परिणामों को लेकर अनिश्चितता उत्पन्न करके प्रतिरोध को सुदृढ़ करना था।
- हमले के बाद भी प्रतिघात करने में सक्षम परमाणु क्षमता: पहले प्रयोग न करने की नीति तभी प्रभावी हो सकती है जब भारत प्रारंभिक परमाणु हमले से बचने और जवाबी कार्रवाई करने की क्षमता बनाए रख सके।
- इसलिए परमाणु क्षमता की उत्तरजीविता तथा परमाणु त्रय का विकास परमाणु सिद्धांत की विश्वसनीयता के लिए केंद्रीय महत्त्व रखते हैं।
- नागरिक नियंत्रण: भारत के परमाणु हथियार नागरिक राजनीतिक प्राधिकार के नियंत्रण में हैं, जो जिम्मेदार परमाणु प्रबंधन के प्रति देश की प्रतिबद्धता को दर्शाता है।
भारत को अपने परमाणु सिद्धांत की समीक्षा करने की आवश्यकता क्यों है?
- बदलते चीन-पाकिस्तान सामरिक संबंध: 2000 के दशक के प्रारंभ की सामरिक परिस्थितियों में महत्वपूर्ण परिवर्तन हुआ है।
- स्टॉकहोम अंतरराष्ट्रीय शांति अनुसंधान संस्थान के 2026 के आकलन के अनुसार, चीन के परमाणु हथियार भंडार में 600 से अधिक हथियार हैं, जो उसके परमाणु शस्त्रागार के तीव्र विस्तार को दर्शाता है।
- पाकिस्तान ने भी अधिक विविध परमाणु व्यवस्था विकसित की है, जिसमें कम दूरी की ऐसी प्रणालियाँ शामिल हैं, जो उसकी सामरिक परमाणु क्षमता से जुड़ी हैं।
- इन घटनाक्रमों ने भारत के लिए प्रतिरोध के वातावरण को अधिक जटिल बना दिया है, विशेषकर इसलिए क्योंकि पाकिस्तान से जुड़ा कोई संकट भारत और चीन के संबंधों पर भी व्यापक प्रभाव डाल सकता है।
- विघटनकारी प्रौद्योगिकियाँ: तकनीकी परिवर्तन भी एक प्रमुख चुनौती है। कृत्रिम बुद्धिमत्ता, साइबर क्षमताएँ, अंतरिक्ष-आधारित निगरानी, हाइपरसोनिक हथियार तथा बैलिस्टिक मिसाइल रक्षा प्रणालियाँ विभिन्न तरीकों से परमाणु स्थिरता को प्रभावित कर सकती हैं।
- ये निर्णय लेने की समय-सीमा को कम कर सकती हैं, कमान एवं नियंत्रण नेटवर्क के लिए खतरा उत्पन्न कर सकती हैं तथा परमाणु बलों की उत्तरजीविता को लेकर अनिश्चितता उत्पन्न कर सकती हैं।
- इसलिए प्रतिरोध की विश्वसनीयता केवल हथियारों की संख्या पर निर्भर नहीं करती, बल्कि उनका समर्थन करने वाली प्रणालियों की सुदृढ़ता पर भी निर्भर करती है।
- अधिक बहुध्रुवीय सामरिक वातावरण: परमाणु प्रतिस्पर्धा अब केवल द्विपक्षीय नहीं रह गई है।
- अमेरिका-चीन सामरिक प्रतिद्वंद्विता, चीन-रूस के बीच बढ़ता समन्वय तथा हिंद-प्रशांत क्षेत्र में भारत की बढ़ती साझेदारियों ने क्षेत्रीय सुरक्षा वातावरण में नई जटिलताएँ जोड़ दी हैं।
- अतः भारत की परमाणु नीति को व्यापक सामरिक परिवेश को ध्यान में रखना होगा, जबकि इसके साथ-साथ तत्काल सुरक्षा चुनौतियों पर भी ध्यान केंद्रित करना होगा।
समीक्षा एवं कार्यान्वयन का सुदृढ़ीकरण
- परमाणु सिद्धांत की समीक्षा का अर्थ आवश्यक रूप से पहले प्रयोग न करने की नीति या विश्वसनीय न्यूनतम प्रतिरोध को त्यागना नहीं है।
- प्रथम प्राथमिकता यह जाँचना होनी चाहिए कि क्या भारत की वर्तमान घोषणाओं को परिचालन क्षमताओं से पर्याप्त समर्थन प्राप्त है। इसके लिए निम्नलिखित का आकलन आवश्यक है:
- कमान, नियंत्रण एवं संचार व्यवस्था;
- पूर्व चेतावनी एवं खुफिया प्रणालियाँ;
- साइबर एवं अंतरिक्ष क्षेत्र की सुदृढ़ता;
- परमाणु परिसंपत्तियों की उत्तरजीविता;
- दूसरे प्रहार की क्षमता; तथा
- परमाणु त्रय की विश्वसनीयता।
- पाकिस्तान की सामरिक परमाणु क्षमताओं के संदर्भ में व्यापक जवाबी कार्रवाई की अवधारणा की सावधानीपूर्वक समीक्षा की आवश्यकता है।
- उद्देश्य यह होना चाहिए कि भारत की समग्र परमाणु स्थिति में अनावश्यक अस्पष्टता उत्पन्न किए बिना प्रतिरोध के संबंध में अधिक स्पष्टता सुनिश्चित की जाए।
परमाणु सिद्धांत के अनुरूप क्षमताओं का निर्माण
- भारत के परमाणु शस्त्रागार के हालिया आकलन संकेत देते हैं कि देश अपनी परमाणु क्षमता को बनाए रखने के साथ-साथ उसका आधुनिकीकरण भी जारी रखे हुए है।
- स्टॉकहोम अंतरराष्ट्रीय शांति अनुसंधान संस्थान के 2026 के अनुमान के अनुसार, भारत के कुल परमाणु हथियार भंडार में लगभग 190 हथियार हैं, जो विगत वर्ष के आकलन में प्रयुक्त अनुमान से अधिक है।
- ऐसे आँकड़ों को इस बात के प्रमाण के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए कि भारत ने विश्वसनीय न्यूनतम प्रतिरोध की नीति को त्याग दिया है।
- हथियारों की संख्या प्रतिरोध का केवल एक घटक है; उत्तरजीविता, प्रक्षेपण प्रणालियाँ, तैयारी की स्थिति, कमान एवं नियंत्रण तथा सुनिश्चित जवाबी कार्रवाई भी समान रूप से महत्त्वपूर्ण हैं।
- इसलिए भारत को सुरक्षित संचार, खुफिया एवं निगरानी, हमले के बाद भी सुरक्षित रहने में सक्षम प्रक्षेपण प्रणालियों तथा समुद्र-आधारित प्रतिरोध क्षमता को सुदृढ़ करने की आवश्यकता है।
- परमाणु त्रय का निरंतर विकास, विशेष रूप से विश्वसनीय समुद्र-आधारित दूसरे प्रहार की क्षमता, पहले प्रयोग न करने की नीति के मूल तर्क को समर्थन प्रदान करता है।
- साथ ही, क्षमता निर्माण विश्वसनीय न्यूनतम प्रतिरोध के अनुरूप होना चाहिए, न कि इसे अनिश्चितकालीन हथियारों की प्रतिस्पर्धा में बदलना चाहिए।
आगे की राह: अनावश्यक संशोधन के बिना समीक्षा
- भारत के परमाणु सिद्धांत ने दो दशकों से अधिक समय तक पर्याप्त निरंतरता और पूर्वानुमेयता प्रदान की है।
- संयम के प्रति इसकी प्रतिबद्धता ने एक जिम्मेदार परमाणु-हथियार संपन्न राष्ट्र के रूप में भारत की छवि का भी महत्त्वपूर्ण हिस्सा निर्मित किया है।
- हालाँकि, सामरिक सिद्धांतों को स्थायी रूप से अपरिवर्तित नहीं माना जा सकता। इसलिए भारत को अपने परमाणु सिद्धांत की समय-समय पर समीक्षा करनी चाहिए, विशेष रूप से तकनीकी परिवर्तनों, चीन-पाकिस्तान के सामरिक संबंधों तथा साइबर और अंतरिक्ष क्षेत्रों के बढ़ते महत्त्व के संदर्भ में।
- उद्देश्य अनावश्यक संशोधन के बजाय आवश्यक समीक्षा होना चाहिए। भारत पहले प्रयोग न करने की नीति तथा विश्वसनीय न्यूनतम प्रतिरोध के तर्क की पुनः पुष्टि करते हुए उन क्षमताओं को सुदृढ़ कर सकता है, जो इन प्रतिबद्धताओं को विश्वसनीय बनाती हैं।
निष्कर्ष
- भारत के समक्ष केंद्रीय चुनौती निरंतरता और परिवर्तन के बीच चयन करना नहीं है। चुनौती यह सुनिश्चित करना है कि बदलते सामरिक वातावरण में एक स्थापित सिद्धांत विश्वसनीय बना रहे।
- अतः परमाणु सिद्धांत की समीक्षा से इसकी क्षमताओं को सुदृढ़ करना, इसकी मूल धारणाओं को स्पष्ट करना तथा प्रतिरोध, संयम और नागरिक नियंत्रण के प्रति इसकी मूल प्रतिबद्धता को बनाए रखना सुनिश्चित किया जाना चाहिए।
| दैनिक मुख्य परीक्षा अभ्यास प्रश्न [प्रश्न] परीक्षण कीजिए कि क्या भारत को अपने परमाणु सिद्धांत में मूलभूत संशोधन की आवश्यकता है अथवा केवल समय-समय पर इसकी समीक्षा एवं इसके कार्यान्वयन को सुदृढ़ करना पर्याप्त होगा। |
स्रोत: TH
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