पाठ्यक्रम: जीएस-1/समाज; जीएस-2/शासन; सामाजिक न्याय
सन्दर्भ
- एक दशक से अधिक समय बीत जाने के बाद भी बिहार के जमुई और दिल्ली के आस्था कुंज से सामने आई घटनाएँ कई मौलिक प्रश्न उठाती हैं, अर्थात् महिलाओं की सुरक्षा के प्रति समान स्तर की भावना में बढ़े हुए व्यय, कानून और बुनियादी ढाँचे का अपेक्षित रूपांतरण क्यों नहीं हो पाया है।
भारत में महिलाएँ और उनकी असुरक्षा
- महिलाएँ भारत की लगभग आधी आबादी हैं, लेकिन पढ़ाई करने, काम करने, यात्रा करने और सार्वजनिक स्थानों का उपयोग करने की उनकी स्वतंत्रता अक्सर सुरक्षा संबंधी चिंताओं से प्रभावित होती है।
- यह विशेष रूप से शहरों में दिखाई देता है, जहाँ कम रोशनी वाली सड़कें, असुरक्षित सार्वजनिक परिवहन, सुनसान स्थान और अपर्याप्त अंतिम छोर तक संपर्क व्यवस्था महिलाओं की आवाजाही को सीमित कर सकती हैं।
- NCRB की अपराध भारत 2024 रिपोर्ट के अनुसार:
- भारत में 2024 में महिलाओं के विरुद्ध अपराध के 4,41,534 मामले दर्ज किए गए।
- राष्ट्रीय अपराध दर: प्रति लाख महिला आबादी पर 64.6 मामले; 2023 में दर्ज 4,48,211 मामलों की तुलना में 1.5% की कमी।
- महिलाओं के विरुद्ध अपराध की प्रमुख श्रेणियाँ: पति या रिश्तेदारों द्वारा क्रूरता; महिलाओं का अपहरण और व्यपहरण; POCSO अधिनियम के तहत अपराध (बालिकाओं के विरुद्ध); महिला की गरिमा भंग करने के इरादे से हमला; बलात्कार; और दहेज हत्या।
- NFHS-5 (2019–21) घरेलू और लैंगिक हिंसा की निरंतरता को दर्शाता है।
- इसलिए, महिलाओं की सुरक्षा केवल कानून-व्यवस्था से जुड़ी चिंता नहीं है; यह लैंगिक समानता, आर्थिक भागीदारी और समावेशी विकास से भी निकटता से जुड़ी हुई है।
भारत में महिलाओं की सुरक्षा की आवश्यकता
- संवैधानिक समानता: अनुच्छेद 14, 15 और 21 समानता, भेदभाव-निषेध तथा जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता की सुरक्षा की गारंटी देते हैं।
- महिलाओं की कार्यबल भागीदारी: असुरक्षित आवागमन रोजगार और आर्थिक अवसरों तक पहुँच को सीमित कर सकता है।
- शहरी विकास: समावेशी शहरों के लिए सुरक्षित सड़कें और परिवहन आवश्यक हैं।
- महिला-नेतृत्व वाला विकास: सार्वजनिक और आर्थिक जीवन में महिलाओं की अधिक भागीदारी के लिए ऐसे सार्वजनिक स्थान आवश्यक हैं, जहाँ वे स्वतंत्र रूप से आवागमन कर सकें।
महिलाओं की सुरक्षा से संबंधित मुद्दे
- कार्यान्वयन और जवाबदेही में कमी: 2012 की घटना के बाद स्थापित निर्भया कोष का उद्देश्य महिलाओं की सुरक्षा के लिए पहलों को समर्थन देना था।
- वर्ष 2015 से 2025 के बीच, ₹7,712.85 करोड़ आवंटित किए गए, जिनमें से ₹5,846.08 करोड़ का उपयोग किया गया। इससे पुलिस थानों में महिला सहायता डेस्क और फास्ट ट्रैक विशेष न्यायालयों जैसी पहलों को समर्थन मिला।
- लेकिन केवल व्यय से यह निर्धारित नहीं किया जा सकता कि महिलाएँ वास्तव में स्वयं को अधिक सुरक्षित महसूस करती हैं या नहीं। किसी अंधेरी सड़क, खराब तरीके से बनाए गए बस स्टॉप या असुरक्षित रास्ते की पहचान करने वाला सुरक्षा ऑडिट केवल शुरुआत है।
- बुनियादी ढाँचे और नीति में असंगति: कई राज्य महिलाओं को मुफ्त बस यात्रा की सुविधा प्रदान करते हैं, जिससे वहनीयता और गतिशीलता में सुधार होता है। लेकिन केवल वहनीयता सुरक्षा सुनिश्चित नहीं करती, यदि बसों के लिए प्रतीक्षा समय अनिश्चित हो, अत्यधिक भीड़ हो या पैदल चलने के रास्ते असुरक्षित हों।
- लैंगिकता और शहरी गतिशीलता पर किए गए शोध से पता चलता है कि सुरक्षा संबंधी चिंताएँ महिलाओं के परिवहन संबंधी विकल्पों और सार्वजनिक स्थानों के उपयोग को प्रभावित करती हैं।
- सार्वजनिक स्थानों पर महिलाओं की सीमित उपस्थिति: जनता से सीधे जुड़े कार्यों में महिलाओं का कम प्रतिनिधित्व इस धारणा को मजबूत कर सकता है कि सार्वजनिक स्थान मुख्य रूप से पुरुषों के क्षेत्र हैं।
- इसलिए, छोटे नियामक बदलाव महिलाओं की सार्वजनिक उपस्थिति और रोजगार को बढ़ा सकते हैं।
- उदाहरण के लिए, 2022 में दिल्ली में बस चालकों के लिए न्यूनतम ऊँचाई की आवश्यकता 159 सेमी से घटाकर 153 सेमी कर दी गई, जिसके बाद अगले वर्ष तक 34 महिला बस चालकों की नियुक्ति की गई।
- पुलिस व्यवस्था में लैंगिक अंतर: भारत के पुलिस बल में महिलाओं की हिस्सेदारी केवल लगभग 10% है, जबकि व्यापक नीतिगत उद्देश्य उनके प्रतिनिधित्व को 33% तक बढ़ाना है।
- अधिक प्रतिनिधित्व से पुलिस संस्थानों तक पहुँच में सुधार हो सकता है, विशेष रूप से लैंगिक अपराधों की शिकायत करने वाली पीड़िताओं के लिए, साथ ही पुलिस व्यवस्था में विविधता को मजबूत किया जा सकता है।
महिलाओं की सुरक्षा से संबंधित प्रयास और पहल
- भारत ने एक व्यापक संस्थागत ढाँचा विकसित किया है:
- महिलाओं की सुरक्षा से संबंधित परियोजनाओं के लिए निर्भया कोष।
- कार्यस्थल पर महिलाओं का यौन उत्पीड़न अधिनियम, 2013, जो रोकथाम और शिकायत-निवारण के लिए वैधानिक ढाँचा प्रदान करता है।
- पुलिस थानों में महिला सहायता डेस्क।
- निर्दिष्ट यौन अपराधों के लिए फास्ट ट्रैक विशेष न्यायालय।
- हिंसा से प्रभावित महिलाओं को एकीकृत सहायता प्रदान करने वाले वन स्टॉप सेंटर।
- आपातकालीन सहायता के लिए आपातकालीन प्रतिक्रिया सहायता प्रणाली (112)।
- प्रौद्योगिकी, बुनियादी ढाँचे और पुलिस व्यवस्था पर केंद्रित सुरक्षित शहर परियोजनाएँ।
- लैंगिक-संवेदनशील शहरी नियोजन और सार्वजनिक स्थानों से संबंधित पहल, जिनमें वैश्विक स्तर पर संयुक्त राष्ट्र महिला द्वारा सुरक्षित शहर और सुरक्षित सार्वजनिक स्थान दृष्टिकोण के माध्यम से बढ़ावा दी जाने वाली पहलें भी शामिल हैं।
- इसलिए, चुनौती अब तेजी से प्रभावी कार्यान्वयन, समन्वय और मापनीय परिणामों की बनती जा रही है।
वैश्विक समानांतर: सुरक्षित सार्वजनिक स्थान
- संयुक्त राष्ट्र महिला का दृष्टिकोण इस बात पर जोर देता है कि महिलाओं की सुरक्षा के लिए केवल पुलिस व्यवस्था पर्याप्त नहीं है।
- शहरी डिजाइन, परिवहन, प्रकाश व्यवस्था, सामुदायिक भागीदारी, संस्थागत जवाबदेही और व्यवहार में बदलाव को मिलकर कार्य करना चाहिए।
- यह भारत के लिए एक महत्वपूर्ण सीख प्रस्तुत करता है: सुरक्षा को शहरों की योजना और संरचना में ही शामिल किया जाना चाहिए, न कि हिंसा होने के बाद केवल प्रतिक्रिया के रूप में देखा जाना चाहिए।
आगे की राह: उपायों को मजबूत करना
- ऑडिट से जवाबदेही की ओर: प्रत्येक सुरक्षा ऑडिट से एक समयबद्ध कार्ययोजना, सार्वजनिक रूप से उपलब्ध प्रगति डैशबोर्ड और सुधार के लिए जिम्मेदार निर्दिष्ट एजेंसी का निर्धारण होना चाहिए।
- परिणाम-आधारित निर्भया कोष: कोष के उपयोग का आकलन केवल व्यय के आधार पर नहीं, बल्कि प्रतिक्रिया समय, दूर की गई बुनियादी ढाँचे की कमियों, दोषसिद्धि से संबंधित परिणामों, कार्यरत सहायता डेस्क और पीड़िताओं की संतुष्टि जैसे संकेतकों के माध्यम से किया जाना चाहिए।
- लैंगिक-संवेदनशील शहरी नियोजन: शहरों को प्रकाश व्यवस्था का ऑडिट, सुरक्षित पैदल मार्ग, विश्वसनीय सार्वजनिक परिवहन, अंतिम छोर तक संपर्क और महिलाओं के साथ सहभागी नियोजन को अपनाना चाहिए।
- महिलाओं की कार्यबल भागीदारी बढ़ाना: अनावश्यक शारीरिक या नियामक बाधाओं को हटाया जाना चाहिए और परिवहन, पुलिस व्यवस्था, स्वच्छता, पार्कों तथा अन्य जन-संपर्क वाली सेवाओं में महिलाओं के लिए लक्ष्य निर्धारित किए जाने चाहिए।
- पुलिस व्यवस्था और न्याय को मजबूत करना: बेहतर जाँच क्षमता, पीड़ित सहायता तंत्र, फोरेंसिक बुनियादी ढाँचे और समयबद्ध सुनवाई के साथ महिला पुलिस कर्मियों की भर्ती में तेजी लाई जानी चाहिए।
निष्कर्ष
- महिलाओं की सुरक्षा केवल कानून-व्यवस्था का मुद्दा नहीं है; यह शासन, शहरी नियोजन, गतिशीलता, रोजगार, न्याय और संवैधानिक समानता का प्रश्न है।
- वर्ष 2012 के बाद का दौर दर्शाता है कि भारत ने महत्वपूर्ण कानूनों, कोषों और संस्थानों का निर्माण किया है।
- अगली चुनौती यह सुनिश्चित करना है कि ये सुरक्षित सड़कों, उत्तरदायी संस्थानों और सार्वजनिक स्थानों तक समान पहुँच में परिवर्तित हों।
- ‘महिला-नेतृत्व वाला विकास’ का सिद्धांत तभी सार्थक हो सकता है जब महिलाएँ केवल सुरक्षा नीतियों की लाभार्थी न हों, बल्कि उनके निर्माण, कार्यान्वयन और निगरानी में सक्रिय भागीदार भी हों।
| दैनिक मुख्य परीक्षा अभ्यास प्रश्न [प्रश्न] एक मजबूत कानूनी और संस्थागत ढाँचे के बावजूद, भारत में महिलाओं की सुरक्षा नीति की मंशा और जमीनी स्तर पर उसके कार्यान्वयन के बीच महत्वपूर्ण अंतर से प्रभावित होती रहती है। चर्चा कीजिए। |
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