पाठ्यक्रम: जीएस-3/ अर्थव्यवस्था/ कृषि
सन्दर्भ
- खाद्य हानि एवं अपशिष्ट के प्रति जागरूकता का अंतरराष्ट्रीय दिवस प्रत्येक वर्ष 29 सितंबर को मनाया जाता है, जिसका उद्देश्य खाद्य हानि और अपशिष्ट को कम करने के लिए जागरूकता तथा सामूहिक कार्रवाई को बढ़ावा देना है।
खाद्य हानि और खाद्य अपशिष्ट
- खाद्य हानि से तात्पर्य उत्पादन, कटाई के बाद प्रबंधन, भंडारण, प्रसंस्करण और परिवहन के दौरान खाद्य पदार्थों की मात्रा या गुणवत्ता में होने वाली कमी से है, इससे पहले कि वह खुदरा स्तर तक पहुँचे।
- खाद्य अपशिष्ट से तात्पर्य खुदरा, खाद्य-सेवा और घरेलू स्तर पर फेंके गए खाद्य पदार्थों से है, जिसमें ऐसा भोजन भी शामिल है जो अभी भी उपभोग के लिए उपयुक्त होता है।
भारत में खाद्य अपव्यय की स्थिति
- यूएनईपी खाद्य अपशिष्ट सूचकांक रिपोर्ट 2024 के अनुसार, वर्ष 2022 में भारत में अनुमानित खाद्य अपव्यय 55 किग्रा/व्यक्ति/वर्ष था, जो 79 किग्रा/व्यक्ति/वर्ष के वैश्विक औसत से कम है।
- चिंता: भारत वैश्विक भुखमरी सूचकांक 2025 में 123 देशों में 102वें स्थान पर है।
- भारत की लगभग 12% आबादी कुपोषित है, जो लगभग 17–17.5 करोड़ लोगों के बराबर है।
- वैश्विक स्तर पर प्रत्येक वर्ष 1.05 अरब टन खाद्य पदार्थ बर्बाद होता है। खाद्य अपशिष्ट का लगभग 60% घरेलू स्तर पर होता है, इसके बाद खाद्य सेवाएँ (28%) और खुदरा क्षेत्र (12%) आते हैं।
खाद्य हानि और अपशिष्ट का प्रभाव
- पोषण सुरक्षा: खाद्य हानि से उपभोग के लिए उपलब्ध भोजन की मात्रा कम हो जाती है और अनावश्यक अपशिष्ट खाद्य असुरक्षा को बढ़ाता है तथा पोषण को बढ़ावा देने के प्रयासों में बाधा डालता है।
- आर्थिक हानि: कटाई के बाद होने वाली हानि किसानों की आय को प्रभावित करती है, आपूर्ति श्रृंखला के खर्चों को बढ़ाती है और कृषि उत्पादन में किए गए निवेश पर मिलने वाले प्रतिफल को कम करती है।
- पर्यावरणीय क्षरण: खाद्य हानि और अपशिष्ट का अर्थ इसके उत्पादन में उपयोग की गई भूमि, जल, ऊर्जा, उर्वरकों और अन्य संसाधनों की भी हानि है।
- जलवायु परिवर्तन: लैंडफिल में जैविक अपशिष्ट के अपघटन से मीथेन उत्पन्न होती है, जो एक शक्तिशाली ग्रीनहाउस गैस है और वैश्विक तापमान वृद्धि में योगदान करती है।
खाद्य हानि से निपटने में चुनौतियाँ
- अपर्याप्त बुनियादी ढाँचा: शीत श्रृंखला, भंडारण, परिवहन और प्रसंस्करण में कमियाँ कटाई के बाद होने वाली हानि को बढ़ाती हैं।
- आँकड़ों की कमी: खुदरा, खाद्य-सेवा और घरेलू स्तर पर होने वाले अपशिष्ट से संबंधित सीमित आँकड़े प्रभावी नीति-निर्माण में बाधा डालते हैं।
- सीमित वित्तपोषण: उच्च लागत और अपर्याप्त ऋण आधुनिक हानि-न्यूनकरण प्रौद्योगिकियों को अपनाने को सीमित करते हैं।
- खंडित दृष्टिकोण: अनेक क्षेत्रों और संस्थानों की भागीदारी के कारण हस्तक्षेपों में समन्वय का अभाव रहता है।
- खराब अपशिष्ट पृथक्करण: मिश्रित अपशिष्ट खाद बनाने, बायोगैस उत्पादन और संसाधन पुनर्प्राप्ति की संभावनाओं को कम करता है।
खाद्य अपशिष्ट को कम करने के लिए सरकारी पहल
- खाद्य सुरक्षा और वितरण: सार्वजनिक वितरण प्रणाली कमजोर वर्गों को रियायती खाद्यान्नों का वितरण सुनिश्चित करती है।
- प्रधानमंत्री गरीब कल्याण अन्न योजना: इस योजना ने संकट और आर्थिक कठिनाई के समय खाद्य पदार्थों तक पहुँच का विस्तार किया है।
- कृषि अवसंरचना कोष (AIF): यह गोदामों, साइलो और शीत भंडारण सहित कटाई के बाद प्रबंधन से संबंधित परियोजनाओं के लिए मध्यम से दीर्घकालिक ऋण वित्तपोषण प्रदान करता है।
- प्रधानमंत्री किसान संपदा योजना: इसका उद्देश्य खाद्य प्रसंस्करण और संरक्षण के लिए आधुनिक बुनियादी ढाँचा तैयार करना है।
- मेगा फूड पार्क: ऐसे समूह जो उच्च-प्रौद्योगिकी आपूर्ति श्रृंखलाओं के माध्यम से कृषि उत्पादन को बाजारों से जोड़ते हैं।
- एकीकृत शीत श्रृंखला: खराब होने वाले खाद्य पदार्थों की क्षति को कम करने के लिए प्रशीतित परिवहन और शीत भंडारण जैसी संरक्षण सुविधाएँ उपलब्ध कराना।
- ऑपरेशन ग्रीन्स: टमाटर, प्याज और आलू (TOP) जैसी फसलों की आपूर्ति को स्थिर करने और अपशिष्ट को कम करने पर केंद्रित।
- बाजार सुधार: ई-नाम कृषि बाजारों में बेहतर मूल्य निर्धारण की सुविधा प्रदान करता है और अक्षमताओं को कम करता है।
- खाद्य हानि का मापन: भारत ने कटाई के बाद होने वाली हानि का आकलन करने के लिए तीन राष्ट्रीय स्तर पर प्रतिनिधि अध्ययन किए हैं, जिनमें क्रमशः 2005–07, 2012–14 और 2020–22 के दौरान 45, 45 और 54 वस्तुओं को शामिल किया गया।
- ये आकलन खाद्य प्रसंस्करण उद्योग मंत्रालय (MoFPI) द्वारा किए गए हैं और खेतों से लेकर खुदरा स्तर तक पूरी कृषि आपूर्ति श्रृंखला में होने वाली हानियों के प्रमाण उपलब्ध कराते हैं।
- खाद्य एवं कृषि संगठन (FAO) और भारतीय लघु उद्योग विकास बैंक (SIDBI) खाद्य-हानि वाले प्रमुख क्षेत्रों को जलवायु-लचीली प्रौद्योगिकियों से जोड़ने तथा लघु और मध्यम उद्यमों के लिए वित्तपोषण की सुविधा प्रदान करने के लिए कार्य कर रहे हैं।
वैश्विक सर्वोत्तम प्रथाएँ
आगे की राह
- भारत में खाद्य अपव्यय खाद्य के उत्पादन, वितरण और उपयोग में मौजूद प्रणालीगत अक्षमताओं का संकेत है, जबकि भूख की समस्या अभी भी बनी हुई है।
- इस समस्या का समाधान खाद्य सुरक्षा, संसाधन दक्षता और सततता में सुधार के लिए आवश्यक है।
- यह सतत विकास लक्ष्य 2 (शून्य भूख) और सतत विकास लक्ष्य 12 (जिम्मेदार उपभोग और उत्पादन) को प्राप्त करने के लिए भी महत्वपूर्ण है, जिससे खाद्य अपव्यय में कमी एक प्रमुख विकासात्मक प्राथमिकता बन जाती है।
स्रोत: TH
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