पाठ्यक्रम: जीएस-3/ कृषि; जल संसाधन
सन्दर्भ
- हाल ही में दक्षिण-पश्चिम मानसून की वापसी के साथ भारत में जलाशयों में जल भंडारण दशकीय औसत से नीचे बना हुआ है, जिससे सिंचाई, पेयजल और जलविद्युत को लेकर चिंताएँ बढ़ रही हैं।
प्रमुख बिंदु
- केंद्रीय जल आयोग (CWC) की 24 सितंबर 2026 की वास्तविक समय जलाशय भंडारण रिपोर्ट के अनुसार, 178 प्रमुख जलाशयों में कुल क्षमता का लगभग 70% जल संग्रहित है।
- यह 10-वर्षीय औसत 76.62% से कम है और 2025 की इसी अवधि में दर्ज 79% भंडारण से भी कम है।
- भारत में संचयी वर्षा सामान्य से 12% कम रही।
- मानसून भारत की वार्षिक वर्षा का 70% से अधिक हिस्सा प्रदान करता है, जिससे जलाशयों, भूजल और सतही जल प्रणालियों के पुनर्भरण में इसकी महत्वपूर्ण भूमिका होती है।
- यह स्थिति महाराष्ट्र और कर्नाटक के कुछ हिस्सों में सूखा घोषित किए जाने के साथ सामने आई है।

क्षेत्रीय जलाशय स्थिति
- दक्षिण भारत (सबसे अधिक चिंताजनक): आंध्र प्रदेश, तेलंगाना, कर्नाटक, केरल और तमिलनाडु वाले दक्षिणी क्षेत्र में जलाशयों में सबसे कम भंडारण दर्ज किया गया है।
- वर्तमान भंडारण: 27.926 अरब घन मीटर (क्षमता का 50%)
- पिछला वर्ष: 87.25%
- वर्षा: 28 सितंबर तक सामान्य से 23% कम
- इस तेज गिरावट का सिंचाई, पेयजल उपलब्धता और जलविद्युत उत्पादन पर प्रभाव पड़ सकता है।
- पूर्वी और पूर्वोत्तर भारत: असम, बिहार, झारखंड, मेघालय, मिजोरम, नागालैंड, ओडिशा, त्रिपुरा और पश्चिम बंगाल के 31 जलाशयों में:
- भंडारण: 16.157 अरब घन मीटर (क्षमता का 73%)
- मौसमी वर्षा की कमी: ओडिशा और पश्चिम बंगाल के कुछ हिस्सों को छोड़कर, अधिकांश क्षेत्र में लगभग 25%।
- उत्तरी भारत: हिमाचल प्रदेश, पंजाब और राजस्थान के 11 जलाशयों में उल्लेखनीय गिरावट देखी गई है:
- 2026: 62% (12.431 अरब घन मीटर)
- 2025: 92.3%
- पश्चिमी और मध्य भारत:गुजरात, महाराष्ट्र और गोवा: 32.664 अरब घन मीटर या 84.61%, जबकि 2025 में यह 95.79% था।
- छत्तीसगढ़, मध्य प्रदेश, उत्तर प्रदेश और उत्तराखंड: 41.568 अरब घन मीटर या 85.55%, जबकि 2025 में यह 91.89% था।
मानसून की कमी और अल नीनो
- दक्षिण-पश्चिम मानसून भारत की वार्षिक वर्षा में 70% से अधिक का योगदान देता है और जलाशयों, भूजल तथा अन्य सतही जल निकायों का पुनर्भरण करता है।
- हालांकि, संचयी वर्षा सामान्य से 12% कम रही।
- जून में 35.4% की कमी दर्ज की गई, अगस्त में 16.3% की कमी रही, जबकि जुलाई में वर्षा सामान्य से लगभग 1% अधिक रही और 1–28 सितंबर के दौरान 5% की कमी दर्ज की गई।
- अल नीनो, जो मध्य और पूर्वी उष्णकटिबंधीय प्रशांत महासागर के समय-समय पर होने वाले गर्म होने की घटना है, वर्षा की बढ़ी हुई अनिश्चितता और लंबे शुष्क दौर से जुड़ा रहा है।
- हालांकि, ENSO भारतीय मानसून के प्रदर्शन को निर्धारित करने वाला एकमात्र कारक नहीं है; क्षेत्रीय वायुमंडलीय और समुद्री कारक भी वर्षा को प्रभावित करते हैं।
भारत के लिए प्रभाव
- कृषि: सिंचाई की उपलब्धता में कमी और भूजल पर अधिक निर्भरता।
- पेयजल: शुष्क मौसम के दौरान शहरी और ग्रामीण जल आपूर्ति पर दबाव।
- जलविद्युत: जलाशयों का निम्न जल स्तर बिजली उत्पादन को सीमित कर सकता है।
- खाद्य सुरक्षा: जल की कमी फसल उत्पादन और कृषि आय को प्रभावित कर सकती है।
- अंतर-राज्यीय जल संबंध: जल की कमी साझा नदियों के जल को लेकर विवादों को बढ़ा सकती है।
- सूखे की संवेदनशीलता: मानसून का खराब प्रदर्शन वार्षिक वर्षा की कमी मध्यम होने पर भी जलवैज्ञानिक और कृषि सूखे की स्थिति में बदल सकता है।
आगे की राह
- भारत को वर्षा पर निर्भर संकट प्रबंधन से आगे बढ़कर एकीकृत जल संसाधन प्रबंधन की ओर बढ़ने की आवश्यकता है। प्राथमिकताओं में शामिल होना चाहिए:
- नदी बेसिन स्तर पर जल बजट और जलाशयों के बीच समन्वय।
- वर्षा जल संचयन और जलभृत पुनर्भरण का विस्तार।
- सूक्ष्म सिंचाई और जल-कुशल फसल प्रतिरूपों को बढ़ावा देना।
- वास्तविक समय के जलाशय और भूजल आँकड़ों का अधिक उपयोग।
- सूखा-प्रतिरोधी कृषि और जलवायु आधारित फसल नियोजन।
- पारंपरिक जल निकायों और आर्द्रभूमियों का पुनर्जीवन।
- प्रारंभिक चेतावनी और अग्रिम सूखा-प्रबंधन प्रणालियों को मजबूत करना।
केंद्रीय जल आयोग (CWC)
- यह जल संसाधन, नदी विकास एवं गंगा संरक्षण विभाग, जल शक्ति मंत्रालय, भारत सरकार के अंतर्गत एक प्रमुख तकनीकी संगठन है।
प्रमुख तथ्य
- स्थापना: 1945 में प्रारंभ में केंद्रीय जलमार्ग, सिंचाई और नौवहन आयोग के रूप में स्थापित किया गया; 1951 में इसका नाम बदलकर केंद्रीय जल आयोग कर दिया गया।
- मुख्यालय: नई दिल्ली।
- अध्यक्ष: इसका नेतृत्व एक अध्यक्ष द्वारा किया जाता है, जो भारत सरकार में पदेन सचिव स्तर के अधिकारी भी होते हैं।
- मुख्य दायित्व: यह जल संसाधनों के विकास और प्रबंधन के संबंध में केंद्र सरकार तथा राज्य सरकारों को तकनीकी सहायता और परामर्श प्रदान करता है।
- कार्य के प्रमुख क्षेत्र:
- सतही जल संसाधनों का आकलन।
- नदी बेसिनों का नियोजन और विकास।
- बाँधों और जलाशयों का डिजाइन एवं सुरक्षा।
- बाढ़ पूर्वानुमान और जलवैज्ञानिक निगरानी।
- जलाशयों में जल भंडारण की निगरानी।
- सिंचाई और जलविद्युत से संबंधित जल संसाधन परियोजनाएँ।
- अंतर-राज्यीय नदी और जल संसाधन संबंधी मुद्दों से जुड़े अध्ययन।
- जलवैज्ञानिक आँकड़ों का संग्रह और प्रसार।
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