संक्षिप्त समाचार 04-09-2026

एल नीनो (El Niño)

पाठ्यक्रम: GS1/भूगोल

संदर्भ

  • विश्व मौसम विज्ञान संगठन (WMO) ने चेतावनी दी है कि आगामी वाले महीनों में एल नीनो असाधारण स्तर तक तीव्र हो सकता है और वर्ष 2027 के आरंभ तक बना रह सकता है। इससे विश्वभर में अत्यधिक गर्मी, सूखे तथा बाढ़ जैसी चरम मौसमी घटनाओं का जोखिम बढ़ सकता है।

परिचय 

एल नीनो

स्रोत: Al Jazeera

भारतीय विधिज्ञ परिषद (BCI)

पाठ्यक्रम: GS2/न्यायपालिका

संदर्भ


  • उच्चतम न्यायालय ने कहा कि भारतीय विधिज्ञ परिषद (BCI) के पास अधिवक्ताओं के रूप में नामांकन से पहले विधि छात्रों के आचरण को विनियमित करने की कोई वैधानिक शक्ति नहीं है।

पृष्ठभूमि

  • यह विवाद हैदराबाद स्थित NALSAR यूनिवर्सिटी ऑफ लॉ में उस समय उत्पन्न हुआ, जब छात्रों ने विश्वविद्यालय के दीक्षांत समारोह में भारत के मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत को मुख्य अतिथि के रूप में आमंत्रित किए जाने के प्रस्ताव पर आपत्ति व्यक्त की यह आपत्ति न्यायालय में उनकी मौखिक टिप्पणियों के बाद सामने आई थी, जिनमें उन्होंने युवाओं की तुलना “परजीवी” और “कॉकरोच” से की थी।
  • इसके प्रत्युत्तर में, BCI ने राज्य विधिज्ञ परिषदों को निर्देश जारी कर NALSAR के वर्ष 2026 के स्नातकों का अधिवक्ताओं के रूप में नामांकन रोकने को कहा। बाद में इन निर्देशों को वापस ले लिया गया।

भारतीय विधिज्ञ परिषद (BCI)

  • परिचय :
    • BCI एक वैधानिक निकाय है, जिसकी स्थापना अधिवक्ता अधिनियम, 1961 की धारा 4 के अंतर्गत की गई है। यह भारत में विधि व्यवसाय तथा विधि शिक्षा को विनियमित करता है।
    • इसके सदस्य भारत के विभिन्न विधिज्ञों में से निर्वाचित होते हैं और इस प्रकार यह भारतीय अधिवक्ता समुदाय का प्रतिनिधित्व करता है।
  • संरचना :
    • इसमें प्रत्येक राज्य विधिज्ञ परिषद से निर्वाचित सदस्य शामिल होते हैं। इसके अतिरिक्त भारत के महान्यायवादी तथा भारत के सॉलिसिटर जनरल पदेन सदस्य होते हैं।
    • परिषद अपने सदस्यों में से दो वर्ष की अवधि के लिए स्वयं अपने अध्यक्ष एवं उपाध्यक्ष का निर्वाचन करती है।
  • कार्य :
    • अधिवक्ताओं के लिए व्यावसायिक आचरण एवं शिष्टाचार के मानक निर्धारित करना।
    • विधि शिक्षा के मानक निर्धारित करना।
    • विधि की डिग्री प्रदान करने वाले विश्वविद्यालयों को मान्यता प्रदान करना।
    • अधिवक्ताओं के अधिकारों, विशेषाधिकारों एवं हितों की रक्षा करना।
    • विधि सुधार को बढ़ावा देना एवं उसका समर्थन करना।
    • राज्य विधिज्ञ परिषद द्वारा संदर्भित किसी भी मामले पर विचार करना तथा उसका निस्तारण करना।
    • निर्धन व्यक्तियों के लिए विधिक सहायता का आयोजन एवं प्रावधान करना।
    • भारत से बाहर प्राप्त विधि संबंधी विदेशी योग्यताओं को अधिवक्ता के रूप में प्रवेश हेतु मान्यता प्रदान करना।

स्रोत: AIR

नैन्सी ग्रेस रोमन अंतरिक्ष दूरबीन

पाठ्यक्रम: GS3/विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी

समाचार में


  • NASA ने SpaceX के रॉकेट के माध्यम से नैन्सी ग्रेस रोमन अंतरिक्ष दूरबीन का प्रक्षेपण किया। इसका नाम “हबल की जननी” कही जाने वाली नैन्सी ग्रेस रोमन के नाम पर रखा गया है, जिन्होंने अंतरिक्ष-आधारित खगोल विज्ञान के विकास में अग्रणी भूमिका निभाई थी।

प्रमुख तकनीकी विशेषताएँ

  • स्थिति-बिंदु : यह पृथ्वी से लगभग 12 लाख किलोमीटर दूर स्थित लैग्रेंज बिंदु-2 (L2) से संचालित होगी। यहाँ सूर्य एवं पृथ्वी के संयुक्त गुरुत्वाकर्षण के कारण अपेक्षाकृत स्थिर वातावरण तथा ब्रह्मांड का निर्बाध अवलोकन संभव होता है। जेम्स वेब अंतरिक्ष दूरबीन भी इसी क्षेत्र से कार्य करती है।
  • उपकरण :
    • वाइड फील्ड इंस्ट्रूमेंट :यह 300 मेगापिक्सेल की अवरक्त कैमरा प्रणाली है, जो आकाश के ऐसे क्षेत्र का अवलोकन कर सकती है जिसका क्षेत्रफल चंद्रमा के आभासी आकार से लगभग 1.5 गुना है। यह हबल अंतरिक्ष दूरबीन की तुलना में छवियों को लगभग 1,000 गुना अधिक तीव्रता से संसाधित कर सकती है।
    • कोरोनाग्राफ :यह चमकीले तारों से आने वाले प्रकाश को अवरुद्ध करके उनकी परिक्रमा करने वाले ग्रहों से परावर्तित होने वाले अत्यंत मंद प्रकाश का पता लगाने में सहायता करेगा। इसकी कार्यप्रणाली सूर्य के कोरोना को देखने के लिए प्रयुक्त सुरक्षात्मक उपकरणों के समान है।

महत्त्व

  • डार्क मैटर एवं डार्क एनर्जी का अध्ययन: सामान्य पदार्थ ब्रह्मांड का केवल लगभग 5% है, जबकि डार्क मैटर 27% तथा डार्क एनर्जी 68% है, जिनके बारे में अभी भी पर्याप्त जानकारी उपलब्ध नहीं है। यह दूरबीन अब तक का सबसे विस्तृत डार्क मैटर मानचित्रण करने में सहायता करेगी, विशेष रूप से तारों के प्रारंभिक निर्माण के चरणों के अध्ययन में।
  • गुरुत्वाकर्षणीय लेंसिंग का अध्ययन: दूरस्थ क्षेत्रों में गुरुत्वाकर्षण द्वारा प्रकाश के मुड़ने को मापकर यह ब्रह्मांड में आकाशगंगाओं के वितरण का त्रि-आयामी मानचित्र तैयार करने में सहायता करेगी।
  • बहिर्ग्रहों की खोज: अब तक 6,000 से अधिक बहिर्ग्रहों की पहचान की जा चुकी है। रोमन की व्यापक आकाश सर्वेक्षण क्षमता इस सूची का उल्लेखनीय रूप से विस्तार कर सकती है तथा पृथ्वी से परे जीवन की खोज को आगे बढ़ाने में योगदान दे सकती है।

स्रोत: IE

परमाणु रिएक्टर के लिए थोरियम-आधारित ईंधन

पाठ्यक्रम: GS3/विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी

समाचार में

  • परमाणु वैज्ञानिक अनिल काकोडकर ने देश के स्वदेशी दाबित भारी जल रिएक्टर (PHWR) बेड़े में, जारी तीन-चरणीय परमाणु कार्यक्रम के साथ-साथ, थोरियम-आधारित ईंधन को शामिल करने का समर्थन किया है।

थोरियम (रासायनिक प्रतीक: Th)

  • थोरियम एक प्राकृतिक रूप से पाया जाने वाला रेडियोधर्मी धातु है, जो मृदा, चट्टानों, जल, पौधों तथा जीव-जंतुओं में अल्प मात्रा में पाया जाता है।
    • सामान्य परिस्थितियों में यह ठोस अवस्था में होता है। थोरियम के प्राकृतिक तथा मानव-निर्मित दोनों रूप पाए जाते हैं और ये सभी रेडियोधर्मी होते हैं।
  • सामान्यतः प्राकृतिक रूप से पाया जाने वाला थोरियम Th-232, Th-230 अथवा Th-228 के रूप में विद्यमान होता है।

भारत का तीन-चरणीय परमाणु ऊर्जा कार्यक्रम

  • भारत में यूरेनियम के भंडार सीमित हैं, किंतु विश्व के सबसे बड़े थोरियम भंडारों में से एक भारत में उपलब्ध है।
  • इसी कारण, परमाणु ऊर्जा विभाग ने उपलब्ध संसाधनों के अधिकतम उपयोग के लिए बंद परमाणु ईंधन चक्र पर आधारित तीन-चरणीय परमाणु ऊर्जा कार्यक्रम तैयार किया है।
  • इसका उद्देश्य विखंडनीय पदार्थ की घरेलू उपलब्धता में क्रमिक वृद्धि करना तथा दीर्घावधि में ऊर्जा आत्मनिर्भरता सुनिश्चित करना है।
    • चरण 1: दाबित भारी जल रिएक्टर (PHWR): PHWR विद्युत उत्पादन के लिए ईंधन के रूप में प्राकृतिक यूरेनियम का उपयोग करते हैं। इन रिएक्टरों से प्राप्त प्रयुक्त ईंधन से प्लूटोनियम प्राप्त होता है, जो आगामी चरण के लिए प्रमुख इनपुट है।
    • चरण 2: फास्ट ब्रीडर रिएक्टर (FBR): इस चरण में ईंधन के रूप में चरण 1 से प्राप्त प्लूटोनियम का उपयोग किया जाता है।
      • यह ईंधन फास्ट ब्रीडर रिएक्टरों को संचालित करता है, जो जितना ईंधन खपत करते हैं, उससे अधिक ईंधन का उत्पादन करते हैं। कल्पक्कम PFBR भारत के इस चरण में प्रवेश का प्रतिनिधित्व करता है। इन रिएक्टरों का उपयोग थोरियम से U-233 उत्पन्न करने के लिए किया जाएगा, जिससे तीसरे चरण का मार्ग प्रशस्त होगा।
    • चरण 3: थोरियम-ईंधन आधारित रिएक्टर: इस चरण में भारत के विशाल थोरियम भंडार का व्यापक उपयोग किया जाएगा तथा चरण 2 में उत्पन्न यूरेनियम-233 (U-233) को ईंधन के रूप में प्रयोग किया जाएगा।
      • थोरियम को ऊर्जा का लगभग असीमित स्रोत माना जाता है और यह चरण भारत की दीर्घकालिक ऊर्जा सुरक्षा सुनिश्चित करने की दिशा में अत्यंत महत्वपूर्ण है।
भारत का तीन-चरणीय परमाणु ऊर्जा कार्यक्रम

स्रोत: IE

पिचावरम मैंग्रोव

पाठ्यक्रम: GS3/पर्यावरण

संदर्भ


  • हाल ही में किए गए एक अध्ययन में पिचावरम मैंग्रोव पारितंत्र का कुल आर्थिक मूल्य (TEV) ₹2,485.38 करोड़ अनुमानित किया गया है।

मैंग्रोव क्या हैं?

  • मैंग्रोव लवण-सहिष्णु पौधों का एक समुदाय है, जो उष्णकटिबंधीय एवं उपोष्णकटिबंधीय ज्वारीय अंतःक्षेत्रीय क्षेत्रों में पाया जाता है।
    • ये पारितंत्र अधिक वर्षा वाले क्षेत्रों (1,000–3,000 मिमी) में पनपते हैं, जहाँ तापमान सामान्यतः 26°C से 35°C के बीच रहता है।
    • मैंग्रोव प्रजातियाँ जलभराव वाली मिट्टी, उच्च लवणता तथा बार-बार आने वाले ज्वारीय उफान जैसी परिस्थितियों में जीवित रहने के लिए अनुकूलित होती हैं।
  • भारत में मैंग्रोव: इंडिया स्टेट ऑफ फॉरेस्ट रिपोर्ट 2023 (ISFR-2023) के अनुसार, भारत में कुल मैंग्रोव आवरण 4,991.68 वर्ग किमी है, जो देश के कुल भौगोलिक क्षेत्रफल का 0.15% है।
    • पश्चिम बंगाल में देश के मैंग्रोव वनों का सबसे बड़ा हिस्सा है, जो कुल मैंग्रोव आवरण का 42.45% है। इसके बाद गुजरात (23.32%) तथा अंडमान एवं निकोबार द्वीपसमूह (12.19%) का स्थान है।

मैंग्रोव का पारिस्थितिक एवं आर्थिक महत्त्व

  • जलवायु विनियमन: मैंग्रोव महत्वपूर्ण ब्लू कार्बन सिंक के रूप में कार्य करते हैं। वे बड़ी मात्रा में कार्बन डाइऑक्साइड का अवशोषण एवं भंडारण करके जलवायु परिवर्तन के प्रभावों को कम करने में सहायता करते हैं।
    • मैंग्रोव वनस्पति औसतन 79.449 टन कार्बन प्रति हेक्टेयर संचित करती है। यह लगभग 291.33 टन CO₂ प्रति हेक्टेयर के बराबर है।
  • आजीविका सृजन: मैंग्रोव वैश्विक उष्णकटिबंधीय वनों के आवरण के 1% से भी कम क्षेत्र में पाए जाते हैं, किंतु तट से 100 किमी के अंदर रहने वाले अनुमानित 2.4 अरब लोगों को महत्वपूर्ण पारिस्थितिकी तंत्र वस्तुएँ एवं सेवाएँ प्रदान करते हैं।
  • तटीय संरक्षण: मैंग्रोव तूफानों, तटीय अपरदन तथा बाढ़ से सुरक्षा प्रदान करते हैं; भोजन एवं इमारती लकड़ी के स्रोत के रूप में कार्य करते हैं; जल की गुणवत्ता में सुधार करते हैं तथा कार्बन का अवशोषण एवं भंडारण करते हैं।
  • जैव विविधता हॉटस्पॉट: मैंग्रोव वन 1,533 से अधिक विभिन्न प्रजातियों के लिए प्राकृतिक आवास उपलब्ध कराते हैं। इनमें अनेक व्यावसायिक रूप से महत्वपूर्ण मछलियों के लिए प्रजनन एवं पोषण क्षेत्र भी शामिल हैं। इसके अतिरिक्त, ये प्रवाल भित्तियों तथा समुद्री घास के मैदानों जैसे आसन्न पारितंत्रों के स्वास्थ्य के लिए भी लाभकारी हैं।

पिचावरम मैंग्रोव वन

  • 1,478.64 हेक्टेयर क्षेत्र में फैला पिचावरम मैंग्रोव वन भारत के सबसे बड़े एवं सर्वोत्तम संरक्षित मैंग्रोव पारितंत्रों में से एक है। यह तमिलनाडु के कुड्डालोर जिले में वेल्लार एवं कोलेरून नदियों के मुहानों के बीच स्थित है।

स्रोत: TH, PIB, UNEP

 

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