पाठ्यक्रम: GS2/शासन
संदर्भ
- केंद्रीय सतर्कता आयोग (CVC) ने केंद्रीय अन्वेषण ब्यूरो (CBI) द्वारा जाँच किए गए भ्रष्टाचार के मामलों के निस्तारण में हो रही देरी को रेखांकित किया है। 31 दिसंबर 2025 तक भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम, 1988 के अंतर्गत 7,229 मामले विचारण हेतु लंबित थे।
भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम (PCA), 1988 के बारे में
- भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम, 1988 भारत में सार्वजनिक सेवकों द्वारा भ्रष्टाचार, रिश्वतखोरी तथा पद के दुरुपयोग से निपटने के लिए बनाया गया प्रमुख विधायी ढाँचा है।
- इस अधिनियम में भ्रष्टाचार निवारण (संशोधन) अधिनियम, 2018 द्वारा महत्वपूर्ण संशोधन किए गए, जिसके माध्यम से रिश्वतखोरी तथा वाणिज्यिक संगठनों से संबंधित प्रावधानों को और सुदृढ़ किया गया।
भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम की प्रमुख धाराएँ
- धारा 2: अधिनियम में “अनुचित लाभ” को व्यापक रूप से ऐसे किसी भी परितोषण के रूप में परिभाषित किया गया है, जो विधिसम्मत पारिश्रमिक के अतिरिक्त हो। यह शब्द केवल मौद्रिक या आर्थिक लाभ तक सीमित नहीं है।
- धारा 3 एवं धारा 4: अधिनियम केंद्र एवं राज्य सरकारों को अधिनियम के अंतर्गत दंडनीय अपराधों के विचारण के लिए विशेष न्यायाधीशों की नियुक्ति करने का अधिकार प्रदान करता है।
- धारा 7A: ऐसे व्यक्ति को दंडित किया जाता है, जो भ्रष्ट या अवैध साधनों अथवा व्यक्तिगत प्रभाव के प्रयोग के माध्यम से किसी लोक सेवक को प्रभावित करने के लिए अनुचित लाभ स्वीकार करता है या प्राप्त करता है।
- धारा 9: यदि किसी वाणिज्यिक संगठन से संबद्ध व्यक्ति किसी व्यवसाय को प्राप्त करने या बनाए रखने अथवा व्यावसायिक लाभ प्राप्त करने के उद्देश्य से अनुचित लाभ देता है या देने का वादा करता है, तो ऐसी स्थिति में वाणिज्यिक संगठन की दायित्वशीलता का प्रावधान किया गया है।
- धारा 10: निर्धारित परिस्थितियों में ऐसे व्यक्तियों की दायित्वशीलता का प्रावधान है, जो संबंधित वाणिज्यिक संगठन के व्यवसाय के संचालन के प्रभारी तथा उसके लिए उत्तरदायी थे।
- धारा 13: यह धारा लोक सेवक द्वारा किए गए आपराधिक कदाचार को परिभाषित करती है, जिसमें लोक सेवक को सौंपी गई संपत्ति का बेईमानी या कपटपूर्ण रूप से गबन करना शामिल है।
- इसमें ऐसी स्थिति भी शामिल है, जिसमें कोई लोक सेवक अपने पद पर रहते हुए जानबूझकर अवैध रूप से स्वयं को समृद्ध करता है।
- धारा 18A: यह धारा अधिनियम के अंतर्गत भ्रष्टाचार से संबंधित मामलों में संपत्ति की कुर्की एवं जब्ती से संबंधित प्रावधानों को लागू करती है। इसके माध्यम से ऐसी संपत्ति के विरुद्ध कार्रवाई की जा सकती है, जिसके बारे में माना जाता है कि उसे भ्रष्ट आचरण के माध्यम से अर्जित किया गया है।
भारत में भ्रष्टाचार के कारण
- प्रशासनिक जटिलता: अत्यधिक विवेकाधीन शक्तियाँ, जटिल प्रक्रियाएँ तथा अनुमोदन के अनेक स्तर लोक अधिकारियों के लिए अवैध परितोषण की माँग करने के अवसर उत्पन्न करते हैं।
- पारदर्शिता का अभाव: सार्वजनिक खरीद, लाइसेंस प्रदान करने, भूमि प्रशासन तथा सार्वजनिक संसाधनों के आवंटन में सीमित पारदर्शिता के कारण भ्रष्ट आचरण का पता लगाना कठिन हो जाता है।
- जाँच में देरी: लंबी जाँच एवं विचारण से दंड की निश्चितता और तात्कालिकता कम हो जाती है, जिससे भ्रष्टाचार-रोधी कानूनों का निवारक प्रभाव कमजोर पड़ता है।
- राजनीतिक हस्तक्षेप: जाँच, नियुक्तियों तथा स्थानांतरण में अनुचित प्रभाव उन संस्थाओं की स्वतंत्रता एवं प्रभावशीलता को कमजोर करता है, जो जवाबदेही सुनिश्चित करने के लिए उत्तरदायी हैं।
- सामाजिक स्वीकृति: नियमित सार्वजनिक सेवाएँ प्राप्त करने के लिए छोटी रिश्वत को सामान्य मान लेने से ऐसा वातावरण बनता है, जिसमें भ्रष्टाचार को प्रशासनिक देरी दूर करने के एक अनौपचारिक साधन के रूप में देखा जाने लगता है।
- व्हिसलब्लोअर संरक्षण का अभाव: पेशेवर प्रतिशोध, उत्पीड़न अथवा धमकियों के भय के कारण व्यक्ति भ्रष्टाचार की शिकायत करने से हिचकिचाते हैं।
भ्रष्टाचार से निपटने के लिए भारत द्वारा उठाए गए कदम
- भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम में संशोधन: वर्ष 2018 में भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम में संशोधन कर रिश्वत देने को अपराध घोषित किया गया तथा रिश्वतखोरी में संलिप्त वाणिज्यिक संगठनों के लिए दायित्व का प्रावधान किया गया।
- भ्रष्टाचार-रोधी संस्थाओं का सुदृढ़ीकरण:
- केंद्रीय सतर्कता आयोग (CVC) सर्वोच्च सतर्कता संस्था के रूप में कार्य करता है तथा दंडात्मक, निवारक और सहभागी सतर्कता को सम्मिलित करने वाली रणनीति अपनाता है।
- लोकपाल को सार्वजनिक सेवकों द्वारा भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम के अंतर्गत कथित अपराधों से संबंधित शिकायतें प्राप्त करने और उन पर कार्रवाई करने के लिए कार्यशील बनाया गया है।
- केंद्रीय अन्वेषण ब्यूरो (CBI) गंभीर भ्रष्टाचार एवं आर्थिक अपराधों की जाँच में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है।
- सरकारी सेवाओं का डिजिटलीकरण: डिजिटल मंच पारदर्शिता बढ़ाते हैं, ऑडिट ट्रेल उपलब्ध कराते हैं तथा विवेकाधीन निर्णय लेने के अवसरों को कम करते हैं।
- प्रत्यक्ष लाभ अंतरण (DBT) प्रणाली का उपयोग कल्याणकारी लाभों को सीधे लाभार्थियों तक पहुँचाने के लिए किया गया है, जिससे बिचौलियों की भूमिका तथा धन के रिसाव और भ्रष्टाचार की संभावनाएँ कम हुई हैं।
- पारदर्शी सार्वजनिक खरीद: ई-निविदा प्रणाली तथा सरकारी ई-मार्केटप्लेस (GeM) के उपयोग से सार्वजनिक खरीद में पारदर्शिता एवं मानकीकरण में वृद्धि हुई है।
आगे की राह
- समयबद्ध जाँच: भ्रष्टाचार के मामलों की जाँच एवं विचारण स्पष्ट रूप से निर्धारित समय-सीमा के अंदर किया जाना चाहिए। इसके साथ ही भ्रष्टाचार एवं आर्थिक अपराधों से संबंधित मामलों की सुनवाई के लिए पर्याप्त संख्या में कार्मिकों से युक्त विशेष न्यायालय होने चाहिए।
- जाँच की स्वतंत्रता: जाँच एवं सतर्कता संस्थाओं को पेशेवर और निष्पक्ष जाँच करने के लिए पर्याप्त कार्यात्मक स्वायत्तता प्रदान की जानी चाहिए।
- व्हिसलब्लोअर संरक्षण: सद्भावना से भ्रष्टाचार की सूचना देने वाले व्यक्तियों को प्रभावी कानूनी एवं संस्थागत संरक्षण प्रदान किया जाना चाहिए।
- प्रौद्योगिकी-आधारित सतर्कता: डेटा विश्लेषण, कृत्रिम बुद्धिमत्ता, डिजिटल ऑडिट ट्रेल तथा वित्तीय फोरेंसिक के व्यापक उपयोग से असामान्य लेन-देन एवं उच्च-जोखिम वाले क्षेत्रों की पहचान करने में सहायता मिल सकती है।
- नैतिक शासन: भ्रष्टाचार-रोधी उपायों में सत्यनिष्ठा, लोक सेवा के मूल्यों, जवाबदेही तथा नैतिक नेतृत्व पर भी विशेष बल दिया जाना चाहिए।
स्रोत: TH
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