पाठ्यक्रम: GS2/स्वास्थ्य, GS3/ पर्यावरण प्रदूषण
संदर्भ
- भारत में किए गए कई अध्ययनों में भूजल, सतही जल, सीवेज और समुद्री जल में प्रति- एवं पॉलीफ्लोरोएल्किल पदार्थों (PFAS) की उपस्थिति का पता चला है। इससे पेयजल की सुरक्षा और पर्यावरणीय प्रदूषण को लेकर चिंताएँ बढ़ गई हैं।
फॉरएवर केमिकल क्या हैं?
- फॉरएवर केमिकल , जिन्हें वैज्ञानिक रूप से प्रति- एवं पॉलीफ्लोरोएल्किल पदार्थ (PFAS) कहा जाता है, कृत्रिम रसायनों का एक बड़ा समूह है, जिनमें अनेक कार्बन-फ्लोरीन बंध होते हैं।
- विभिन्न PFAS ऊष्मा, जल, तेल और प्राकृतिक अपघटन के प्रति अत्यधिक प्रतिरोधी होते हैं, जिसके कारण वे लंबे समय तक पर्यावरण में बने रह सकते हैं।
- उपयोग: इनका उपयोग नॉन-स्टिक बर्तन, जलरोधी वस्त्र, दाग-प्रतिरोधी परतों, खाद्य पैकेजिंग, अग्निशमन फोम और विभिन्न औद्योगिक उत्पादों में किया जाता है।
- चिंताएँ: कुछ PFAS मानव शरीर और वन्यजीवों में संचित हो सकते हैं। इनमें से कुछ के संपर्क में आने को कैंसर सहित प्रतिकूल स्वास्थ्य प्रभावों से जोड़ा गया है।
- PFAS भूजल, सतही जल और मृदा को दूषित कर सकते हैं, जबकि जल उपचार की पारंपरिक विधियाँ इन्हें प्रभावी ढंग से हटाने में सक्षम नहीं हो सकती हैं।
जल से PFAS हटाने की चुनौतियाँ
- अपघटन के प्रति प्रतिरोध: कई PFAS में वर्तमान सुदृढ़ कार्बन-फ्लोरीन बंधों के कारण पारंपरिक जैविक और रासायनिक उपचार विधियों से उनका विघटन करना कठिन होता है।
- नियामकीय कमियाँ: वर्तमान IS 10500:2012 मानक के अंतर्गत भारत में PFAS के लिए पेयजल में कोई विशिष्ट सीमा निर्धारित नहीं है।
- पूर्वगामी यौगिकों का रूपांतरण: कुछ पूर्वगामी यौगिक जल उपचार के दौरान अधिक स्थायी PFAS में परिवर्तित हो सकते हैं, जिससे संदूषण का आकलन करना कठिन हो जाता है।
- उपचार संबंधी चुनौतियाँ: सक्रिय कार्बन द्वारा अधिशोषण , विशेष आयन-विनिमय और रिवर्स ऑस्मोसिस जैसी विधियाँ कई PFAS को हटा सकती हैं। हालाँकि, इनकी लागत, परिचालन संबंधी आवश्यकताएँ और दूषित अपशिष्ट का प्रबंधन चिंता के विषय बने हुए हैं।
- स्रोत की पहचान: PFAS औद्योगिक अपशिष्ट जल, सीवेज, लैंडफिल से निकलने वाले रिसाव तथा उपभोक्ता उत्पादों के माध्यम से जल में पहुँच सकते हैं। इससे संदूषण के सटीक स्रोत की पहचान करना कठिन हो जाता है।
जल संदूषण के अन्य कारण
- भारत के जलभृतों में आर्सेनिक, फ्लोराइड, नाइट्रेट, यूरेनियम, लवणता और भारी धातुओं से एक साथ संदूषण देखा जाता है।
- पंजाब, हरियाणा, राजस्थान और दिल्ली जैसे उत्तर भारतीय राज्यों में मानसून-पूर्व और मानसून-पश्चात लिए गए नमूनों में यूरेनियम का चिंताजनक स्तर पाया गया है।
- मध्य भारत में कृषि गतिविधियों की तीव्रता से संबंधित फ्लोराइड और नाइट्रेट की बढ़ती सांद्रता की समस्या है, जबकि पूर्वी राज्यों में आर्सेनिक से प्रभावित क्षेत्र अब भी चुनौती बने हुए हैं।
संकट के पीछे प्रमुख कारक
- कृषि प्रदूषण: नाइट्रोजनयुक्त उर्वरकों के अत्यधिक उपयोग से नाइट्रेट का निक्षालन होता है।
- उत्तर भारत में धान-गेहूँ की एकल फसल प्रणाली: धान-गेहूँ की एकल फसल प्रणाली भूजल के क्षय को तीव्र करती है, जिससे गहरी भूस्तरीय परतों से भारी धातुओं के जल में पहुँचने की संभावना बढ़ जाती है।
- भूजनित संदूषण : फ्लोराइड और आर्सेनिक का संदूषण आंशिक रूप से प्राकृतिक भूवैज्ञानिक संरचनाओं से उत्पन्न होता है, लेकिन अधिक गहराई तक बोरवेल खोदने से इनके संपर्क में आने का जोखिम बढ़ सकता है।
- मानवजनित कारक : औद्योगिक अपशिष्ट, अनुपचारित सीवेज, लैंडफिल से रिसाव और शहरी परिधीय क्षेत्रों में अपशिष्ट डंपिंग से भारी धातुएँ तथा विषैले पदार्थ जल में पहुँचते हैं।
- कमजोर भूजल शासन : भारत में अब भी यह सिद्धांत प्रचलित है कि भूमि का स्वामित्व भूजल के स्वामित्व का अधिकार प्रदान करता है, जिससे भूजल का अनियंत्रित दोहन संभव होता है।
- संस्थागत भूमिकाओं का बिखराव और सीमित निगरानी दीर्घकालिक जलभृत प्रबंधन में बाधा उत्पन्न करते हैं।
संवैधानिक प्रावधान
- अनुच्छेद 21: भारतीय संविधान का अनुच्छेद 21 जीवन के अधिकार की गारंटी देता है, जिसमें सुरक्षित पेयजल तक पहुँच भी शामिल है।
- सुभाष कुमार बनाम बिहार राज्य (1991): सर्वोच्च न्यायालय ने माना कि अनुच्छेद 21 के अंतर्गत जीवन के अधिकार में प्रदूषण-मुक्त जल और वायु का आनंद लेने का अधिकार भी शामिल है।
- आंध्र प्रदेश प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड-II बनाम प्रो. एम.वी. नायडू (1999): न्यायालय ने कहा कि सुरक्षित पेयजल तक पहुँच जीवन के लिए मौलिक है।
- अनुच्छेद 243W: यह शहरी स्थानीय निकायों को जलापूर्ति, स्वच्छता और सार्वजनिक स्वास्थ्य के प्रबंधन की शक्तियाँ प्रदान करता है।
- अनुच्छेद 47: भारतीय संविधान के राज्य के नीति-निदेशक तत्त्वों (DPSP) का हिस्सा यह अनुच्छेद राज्य को पोषण स्तर और जीवन स्तर में सुधार करने तथा सार्वजनिक स्वास्थ्य को बेहतर बनाने का निर्देश देता है।

आगे की राह
- भारतीय मानक ब्यूरो (BIS) ने उभरते प्रदूषकों और फॉरएवर केमिकल पर एक समर्पित कार्यसमूह गठित किया है, जो पेयजल में PFAS के लिए नियामकीय सीमाओं की समीक्षा करने और उन्हें लागू करने की दिशा में कार्य करेगा।
- CSIR–भारतीय विषविज्ञान अनुसंधान संस्थान पर्यावरणीय नमूनों और उपभोक्ता उत्पादों में PFAS के आधारभूत आँकड़े विकसित करने के लिए संयुक्त राष्ट्र पर्यावरण कार्यक्रम (UNEP) द्वारा वित्तपोषित राष्ट्रीय कार्यान्वयन योजना में भाग ले रहा है।
- जल जीवन मिशन राज्य और केंद्रशासित प्रदेशों की व्यवस्थाओं के माध्यम से पेयजल की गुणवत्ता की निगरानी और पर्यवेक्षण को समर्थन देता है। हालाँकि, वर्तमान में IS 10500:2012 के अंतर्गत PFAS के लिए कोई विशिष्ट सीमा निर्धारित नहीं है।
Source: TH
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