सूचना का अधिकार अधिनियम, 2005 के क्रियान्वयन में विद्यमान कमियाँ 

पाठ्यक्रम: GS2/शासन

संदर्भ

  • सूचना का अधिकार अधिनियम, 2005 को लागू हुए 21 वर्ष पूरे हो चुके हैं। इस अवसर पर पारदर्शिता संबंधी लेखा-परीक्षणों और सूचना तक सार्वजनिक पहुँच में सुधार के बावजूद स्वैच्छिक सूचना प्रकटीकरण में बनी हुई कमियों पर ध्यान केंद्रित हुआ है।

सूचना का अधिकार अधिनियम, 2005 के बारे में

  • सूचना का अधिकार अधिनियम, 2005 का निर्माण शासन में पारदर्शिता, जवाबदेही और नागरिकों की सूचित भागीदारी को बढ़ावा देने के उद्देश्य से किया गया था।
  • यह अधिनियम भारतीय नागरिकों को सार्वजनिक प्राधिकारियों के पास उपलब्ध सूचना प्राप्त करने का अधिकार देता है, हालाँकि इस पर अधिनियम में निर्धारित कुछ अपवाद लागू होते हैं।
  • उच्चतम न्यायालय द्वारा मान्यता दिए जाने के अनुसार, यह अधिनियम संविधान के अनुच्छेद 19(1)(क) के अंतर्गत वाक् एवं अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के अभिन्न अंग के रूप में सूचना के अधिकार को व्यावहारिक रूप प्रदान करता है।

प्रमुख प्रावधान

  • धारा 3: अधिनियम के प्रावधानों के अधीन भारतीय नागरिकों को सूचना प्राप्त करने का अधिकार प्रदान करती है।
  • धारा 4: सार्वजनिक प्राधिकारियों को अभिलेखों का उचित रखरखाव करने तथा निर्धारित सूचनाओं का स्वप्रेरणा से प्रकटीकरण करने का दायित्व सौंपती है।
  • धारा 6: सूचना प्राप्त करने के लिए आवेदन प्रस्तुत करने की प्रक्रिया निर्धारित करती है।
  • धारा 7: सामान्यतः 30 दिनों के अंदर सूचना उपलब्ध कराना अनिवार्य करती है। यदि माँगी गई सूचना किसी व्यक्ति के जीवन या स्वतंत्रता से संबंधित हो, तो इसे 48 घंटे के भीतर उपलब्ध कराना आवश्यक है।
  • धारा 8: सूचना के प्रकटीकरण से संबंधित अपवादों का उल्लेख करती है। इनमें राष्ट्रीय सुरक्षा और व्यक्तिगत गोपनीयता को प्रभावित करने वाली कुछ सूचनाएँ शामिल हैं।
  • धारा 12 एवं 15: क्रमशः केंद्रीय सूचना आयोग और राज्य सूचना आयोगों के गठन का प्रावधान करती हैं।
  • धारा 19: सूचना प्राप्त करने से संबंधित निर्णयों के विरुद्ध अपील की व्यवस्था करती है।
  • धारा 20: निर्धारित परिस्थितियों में लोक सूचना अधिकारियों द्वारा अधिनियम का अनुपालन न करने पर दंड का प्रावधान करती है।

धारा 4: स्वैच्छिक पारदर्शिता का आधार

  • सूचना का अधिकार व्यवस्था में धारा 4 का केंद्रीय महत्त्व है, क्योंकि इसके अंतर्गत सार्वजनिक प्राधिकारियों को महत्त्वपूर्ण सूचनाएँ अपनी पहल पर सार्वजनिक करनी होती हैं। इससे नागरिकों को प्रत्येक सूचना के लिए अलग-अलग आवेदन प्रस्तुत करने की आवश्यकता कम होती है।
  • किन सूचनाओं का प्रकटीकरण आवश्यक है: धारा 4(1)(ख) के अंतर्गत सूचना की 17 श्रेणियाँ निर्धारित की गई हैं, जिनमें निम्नलिखित शामिल हैं:
    • सार्वजनिक प्राधिकारियों का संगठन, कार्य एवं दायित्व।
    • अधिकारियों और कर्मचारियों की शक्तियाँ तथा उत्तरदायित्व।
    • निर्णय लेने की प्रक्रियाएँ और लागू नियम।
    • प्रशासन में प्रयुक्त विनियम, नियमावलियाँ, अनुदेश एवं अभिलेख।
    • अधिकारियों एवं कर्मचारियों की निर्देशिकाएँ तथा उनके पारिश्रमिक का विवरण।
    • बजट आवंटन, व्यय और सहायता-अनुदान कार्यक्रमों का विवरण।
    • रियायतों, अनुज्ञापत्रों तथा उनके लाभार्थियों से संबंधित सूचनाएँ।
    • इलेक्ट्रॉनिक माध्यम से उपलब्ध सूचनाओं का विवरण।
    • नागरिकों को सूचना प्राप्त करने के लिए उपलब्ध सुविधाएँ।
    • लोक सूचना अधिकारियों के नाम एवं संपर्क विवरण।
    • अधिनियम के अनुसार, सार्वजनिक प्राधिकारियों को महत्त्वपूर्ण नीतियाँ बनाते समय संबंधित तथ्यों को प्रकाशित करना चाहिए तथा व्यक्तियों को प्रभावित करने वाले प्रशासनिक या अर्ध-न्यायिक निर्णयों के कारण भी बताने चाहिए।
    • इसके अतिरिक्त, कार्मिक एवं प्रशिक्षण विभाग ने आठ व्यापक श्रेणियों के अंतर्गत अधिक व्यापक सूचना प्रकटीकरण की सिफारिश करते हुए दिशा-निर्देश जारी किए हैं। इनमें सरकारी खरीद, सार्वजनिक-निजी भागीदारी तथा विभागों को प्राप्त सूचना के अधिकार संबंधी आवेदनों का विवरण शामिल है।

संबंधित चिंताएँ एवं समस्याएँ

  • धारा 4 का कमजोर क्रियान्वयन: अनेक विभाग अनिवार्य सूचनाओं को नियमित रूप से प्रकाशित करने में विफल रहते हैं।
    • विभागीय वेबसाइटों पर पुरानी, अधूरी या अप्राप्य सूचनाएँ उपलब्ध होती हैं।
    • पारदर्शिता संबंधी लेखा-परीक्षण नियमित रूप से नहीं किए जाते अथवा उनके निष्कर्ष प्रकाशित नहीं किए जाते।
    • नागरिकों को सामान्य प्रशासनिक जानकारी प्राप्त करने के लिए भी आवेदन प्रस्तुत करना पड़ता है।
  • अपीलों एवं शिकायतों का लंबित रहना: मामलों के निपटारे में विलंब से सूचना का महत्त्व समाप्त हो सकता है। यह समस्या विशेष रूप से सरकारी भर्ती, कल्याणकारी लाभों तथा जारी प्रशासनिक निर्णयों से संबंधित मामलों में गंभीर होती है।
    • मामलों के निपटारे में देरी से अधिनियम का उल्लंघन करने वाले अधिकारियों पर लगाए जाने वाले दंड का निवारक प्रभाव कमजोर पड़ता है।
  • रिक्त पद एवं संस्थागत कमजोरियाँ: सूचना आयोगों में नियुक्तियों में विलंब तथा संस्थागत क्षमता का अपर्याप्त होना।
    • कर्मचारियों और तकनीकी अवसंरचना की कमी।
    • सूचना आयोगों की उस प्राधिकारियों से स्वतंत्रता को लेकर चिंताएँ, जिनके निर्णयों की वे समीक्षा करते हैं।
  • सूचना के अधिकार कार्यकर्ताओं एवं सूचना चाहने वाले नागरिकों के समक्ष खतरे: संवेदनशील सार्वजनिक सूचनाएँ प्राप्त करने का प्रयास करने वाले व्यक्तियों को सीमित संरक्षण प्राप्त है।
    • प्रतिशोध की आशंका के कारण नागरिक प्रभावशाली व्यक्तियों या संस्थाओं से संबंधित प्रश्न उठाने से हिचकिचाते हैं।
  • सूचना का अधिकार संशोधन अधिनियम, 2019 से संबंधित चिंताएँ: संशोधित व्यवस्था के अंतर्गत केंद्र सरकार को नियमों के माध्यम से केंद्रीय मुख्य सूचना आयुक्त, सूचना आयुक्तों और राज्य स्तर के सूचना आयुक्तों के कार्यकाल, वेतन, भत्तों तथा अन्य सेवा शर्तों को निर्धारित करने का अधिकार प्राप्त है।
    • इन शर्तों पर कार्यपालिका का अधिक नियंत्रण सूचना आयोगों की स्वतंत्रता के प्रति जनधारणा को प्रभावित कर सकता है।
  • डिजिटल विभाजन एवं पहुँच संबंधी बाधाएँ: कुछ ग्रामीण एवं दूरस्थ क्षेत्रों में इंटरनेट संपर्क की सीमित उपलब्धता।
    • समाज के कुछ वर्गों में डिजिटल साक्षरता का निम्न स्तर।
    • विभागीय वेबसाइटों तथा ऑनलाइन आवेदन प्रणालियों का उपयोग करने में कठिनाई।
    • ऐसी प्रारूपों में सूचनाओं का प्रकाशन, जिन्हें खोजना या समझना कठिन हो।
    • दिव्यांग व्यक्तियों और भाषायी अल्पसंख्यकों के लिए पहुँच संबंधी बाधाएँ।
  • अभिलेख प्रबंधन की कमजोरियाँ: अभिलेखों का गुम होना, अधूरा होना या उनका उचित अनुक्रमण न होना।
    • सरकारी दस्तावेजों के डिजिटलीकरण में विलंब।
    • अभिलेखों को सुरक्षित रखने की असंगत प्रक्रियाएँ।
    • सूचनाओं का रखरखाव करने वाले विभिन्न विभागों के बीच सीमित समन्वय।
  • अपर्याप्त निवारक प्रभाव एवं जवाबदेही: दंडात्मक कार्यवाही शुरू करने या उसे पूरा करने में विलंब।
    • वैधानिक दंड के असंगत प्रवर्तन की समस्या।
    • स्वैच्छिक सूचना प्रकटीकरण में लगातार विफल रहने वाले विभागों के प्रति जवाबदेही का अभाव।
    • पारदर्शिता संबंधी लेखा-परीक्षणों में पहचानी गई कमियों पर पर्याप्त अनुवर्ती कार्यवाही न होना।
  • गोपनीयता बनाम पारदर्शिता: सूचना प्रकटीकरण के प्रति अत्यधिक प्रतिबंधात्मक दृष्टिकोण वैध सार्वजनिक निगरानी को सीमित कर सकता है।
    • दूसरी ओर, बिना किसी भेद के सभी सूचनाएँ सार्वजनिक करना व्यक्तिगत गोपनीयता का उल्लंघन कर सकता है।
  • सीमित जागरूकता एवं प्रशासनिक प्रतिरोध: ऐसी सूचनाएँ साझा करने के प्रति प्रशासनिक प्रतिरोध, जिनसे प्रशासनिक कमियाँ उजागर हो सकती हैं।
    • विभागों और उनके नामित सूचना अधिकारियों के बीच समन्वय का अभाव।
  • दुरुपयोग एवं निरर्थक आवेदनों से संबंधित चिंताएँ: कुछ सूचना आवेदन बार-बार प्रस्तुत किए जा सकते हैं, अत्यधिक व्यापक हो सकते हैं अथवा जनहित के बजाय व्यक्तिगत विवादों से प्रेरित हो सकते हैं।
    • हालाँकि, दुरुपयोग की संभावना को अधिनियम के मूल उद्देश्य को कमजोर करने का आधार नहीं बनाया जाना चाहिए।
    • किसी सार्वजनिक प्राधिकारी को असुविधाजनक लगने वाला आवेदन आवश्यक रूप से निरर्थक नहीं होता।

धारा 4 क्यों महत्त्वपूर्ण है?

  • जवाबदेही को सुदृढ़ करना: व्यय, नीतियों और प्रशासनिक निर्णयों से संबंधित सूचनाओं तक सार्वजनिक पहुँच से सरकारी विभागों के कामकाज की समीक्षा करना आसान हो जाता है।
  • भ्रष्टाचार पर अंकुश लगाना: अधिक पारदर्शिता से मनमाने निर्णयों, पक्षपात तथा सार्वजनिक धन के दुरुपयोग की संभावनाएँ कम होती हैं।
  • नागरिकों को सशक्त बनाना: विश्वसनीय सूचनाओं तक पहुँच नागरिकों को सरकारी योजनाओं को समझने, अपने अधिकारों एवं पात्र लाभों का दावा करने तथा लोकतांत्रिक प्रक्रियाओं में सार्थक भागीदारी करने में सक्षम बनाती है।
  • प्रशासनिक दक्षता: जब सामान्य सूचनाएँ पहले से उपलब्ध होती हैं, तब नागरिकों को बुनियादी जानकारी के लिए अलग-अलग आवेदन प्रस्तुत नहीं करने पड़ते। इससे सार्वजनिक प्राधिकारियों और सूचना आयोगों पर कार्यभार कम हो सकता है।
  • न्यायिक मान्यता: उच्चतम न्यायालय ने लोकतांत्रिक शासन में जानने के अधिकार के महत्त्व को स्वीकार किया है।
    • उत्तर प्रदेश राज्य बनाम राज नारायण (1975): इस मामले में न्यायालय ने यह स्वीकार किया कि जनता को सार्वजनिक मामलों के संचालन के तरीके को जानने का वैध हित प्राप्त है, हालाँकि इस अधिकार पर अनुमत प्रतिबंध लागू हो सकते हैं।
    • सूचना के अधिकार की संवैधानिक नींव अनुच्छेद 19(1)(क) के अंतर्गत वाक् एवं अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता तथा संविधान में निहित व्यापक लोकतांत्रिक मूल्यों से निकटता से जुड़ी हुई है।

स्वैच्छिक सूचना प्रकटीकरण कमजोर क्यों बना हुआ है?

  • कमजोर प्रवर्तन: नियमों का अनुपालन न करने पर समयबद्ध सुधारात्मक कार्यवाही नहीं हो पाती।
  • अभिलेख प्रबंधन की कमजोरियाँ: अधूरे या पुराने अभिलेख नियमित सूचना प्रकटीकरण को कठिन बनाते हैं।
  • सीमित जागरूकता: अधिकारियों को सूचना प्रकटीकरण से संबंधित अपने दायित्वों की पर्याप्त समझ नहीं हो सकती।
  • अपर्याप्त निगरानी: लेखा-परीक्षण के निष्कर्ष हमेशा मापनीय सुधारों में परिवर्तित नहीं होते।
  • प्रशासनिक प्रतिरोध: गोपनीयता की संस्कृति खुलेपन को हतोत्साहित कर सकती है।
  • असंगत डिजिटल प्रक्रियाएँ: वेबसाइटों की संरचना और सूचना के प्रारूपों में अंतर के कारण सूचनाओं को खोजना तथा उनकी तुलना करना कठिन हो जाता है।
  • डिजिटल विभाजन: केवल ऑनलाइन सूचनाएँ प्रकाशित करना सीमित इंटरनेट पहुँच या डिजिटल साक्षरता वाले नागरिकों की आवश्यकताओं को पूरा करने के लिए पर्याप्त नहीं है।

आगे की राह

  • अनुपालन को सुदृढ़ करना: सभी सार्वजनिक प्राधिकारियों द्वारा धारा 4 के अंतर्गत समयबद्ध सूचना प्रकटीकरण तथा नियमित पारदर्शिता लेखा-परीक्षण सुनिश्चित किए जाने चाहिए।
  • जवाबदेही निर्धारित करना: विभागीय वेबसाइटों को अद्यतन रखने और लेखा-परीक्षणों में पहचानी गई कमियों को दूर करने के लिए उत्तरदायित्व निर्धारित किया जाना चाहिए।
  • प्रकटीकरण का मानकीकरण: सरकारी वेबसाइटों पर एकसमान प्रारूप, खोज योग्य आँकड़ा-संग्रह तथा सुलभ सूचना-पटल विकसित किए जाने चाहिए।
  • अभिलेख प्रबंधन में सुधार: अपवादस्वरूप गोपनीय और संवेदनशील सूचनाओं की सुरक्षा करते हुए अभिलेखों का डिजिटलीकरण तथा नियमित अद्यतन सुनिश्चित किया जाना चाहिए।
  • नागरिक जागरूकता को बढ़ावा देना: सूचना के अधिकार के प्रति जागरूकता बढ़ाने के लिए स्थानीय निकायों, शैक्षणिक संस्थानों और नागरिक समाज संगठनों का उपयोग किया जाना चाहिए।
  • समावेशी पहुँच सुनिश्चित करना: ऑनलाइन प्रकटीकरण के साथ सुलभ ऑफलाइन माध्यम भी उपलब्ध कराए जाने चाहिए, ताकि डिजिटल सुविधाओं से वंचित नागरिक पीछे न रह जाएँ।
  • लंबित मामलों में कमी लाना: सामान्यतः माँगी जाने वाली सूचनाएँ पहले से उपलब्ध कराई जानी चाहिए, ताकि सूचना आयोग उन विवादों पर ध्यान केंद्रित कर सकें जिनमें वास्तविक निर्णय की आवश्यकता है।

निष्कर्ष

  • सूचना का अधिकार अधिनियम ने नागरिकों को सार्वजनिक प्राधिकारियों से प्रश्न पूछने और जवाबदेही की माँग करने का साधन प्रदान करके भारतीय लोकतंत्र को सुदृढ़ किया है।
  • हालाँकि, इसकी प्रभावशीलता केवल सूचना माँगने के अधिकार पर ही नहीं, बल्कि सरकार की स्वप्रेरणा से सूचना सार्वजनिक करने की तत्परता पर भी निर्भर करती है।
  • सूचना के अधिकार के सुधारों के आगामी चरण में केवल प्रक्रियात्मक अनुपालन तक सीमित रहने के बजाय खुलेपन की ऐसी संस्कृति विकसित करने पर बल दिया जाना चाहिए, जिसमें सटीक, प्रासंगिक और नियमित रूप से अद्यतन सार्वजनिक सूचनाएँ सामान्य व्यवस्था का हिस्सा हों।
  • धारा 4 का प्रभावी क्रियान्वयन जनविश्वास को सुदृढ़ करने, शासन की गुणवत्ता में सुधार करने तथा सूचना आयोगों पर पड़ने वाले अनावश्यक कार्यभार को कम करने में सहायक हो सकता है।
दैनिक मुख्य परीक्षा अभ्यास प्रश्न
[प्रश्न]: पारदर्शिता एवं जवाबदेही को बढ़ावा देने वाला ऐतिहासिक कानून होने के बावजूद, सूचना का अधिकार अधिनियम, 2005 के क्रियान्वयन में अनेक संस्थागत एवं प्रशासनिक चुनौतियाँ बनी हुई हैं। समालोचनात्मक परीक्षण कीजिए। 

स्रोत: TH

 

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