पाठ्यक्रम: GS3/विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी/पर्यावरण
संदर्भ
- नीति आयोग ने ‘सतत विकास की योजना बनाने में राज्यों की सहायता हेतु डेटा सेंटर मूल्यांकन ढाँचा’ नामक रिपोर्ट जारी की है। इसमें क्षमता विस्तार को स्वीकृति देने से पहले अवसंरचना की तैयारी का आकलन करने की सिफारिश की गई है।
- यह रिपोर्ट भारत के डेटा सेंटर उद्योग के तीव्र विस्तार के बीच जारी की गई है।
सिफारिशें
- विद्युत तैयारी मानचित्र : परियोजनाओं को स्वीकृति देने से पहले विकासकर्ताओं, विद्युत वितरण कंपनियों (DISCOMs) और राज्य पारेषण उपयोगिताओं को संयुक्त रूप से विद्युत तैयारी एवं चरणबद्ध क्षमता-वृद्धि योजना तैयार करनी चाहिए।
- इस योजना में विद्युत की कुल आवश्यकता, स्वीकृत क्षमता, वर्षवार विद्युत की उपलब्धता, अवसंरचना के उन्नयन तथा इनके कार्यान्वयन के लिए उत्तरदायी एजेंसियों का विवरण दिया जाएगा।
- 20 मेगावाट से अधिक की आवश्यकता: 20 मेगावाट (MW) से अधिक विद्युत की आवश्यकता वाले डेटा सेंटरों के लिए यह अनिवार्य स्वचालित माँग-प्रतिक्रिया तैयारी तथा राज्य भार प्रेषण केंद्रों के साथ एकीकरण का प्रस्ताव करता है।
- ‘पाँच-स्तंभ रूपरेखा’ में पर्यावरणीय सुरक्षा उपायों, जलवायु जोखिमों और शासन को भी शामिल किया गया है।
- इसमें एक केंद्रीय लेखा-परीक्षण तंत्र का प्रस्ताव है, जिसमें इलेक्ट्रॉनिकी एवं सूचना प्रौद्योगिकी मंत्रालय नोडल मंत्रालय होगा।
- यह रूपरेखा राज्यों को माँग बढ़ने से पहले ही अवसंरचना की योजना बनाने, संसाधनों की सीमाओं की समय रहते पहचान करने तथा प्रोत्साहनों को मापनीय परिणामों से जोड़ने के लिए प्रोत्साहित करती है।
- प्रस्तुति में यह स्पष्ट नहीं किया गया है कि इस रूपरेखा को औपचारिक रूप से अपनाया गया है या नहीं, अथवा इसकी सिफारिशें राज्यों के लिए बाध्यकारी होंगी या नहीं।
भारत में डेटा सेंटर
- ऊर्जा, पर्यावरण एवं जल परिषद (CEEW) के अनुसार, जनवरी 2026 तक भारत में 271 डेटा सेंटर थे।
- अगस्त 2026 में भारत के डेटा सेंटरों की स्थापित क्षमता लगभग 1.57 गीगावाट (GW) थी।
- अनुमान है कि वर्ष 2030 तक यह क्षमता बढ़कर 6.5 GW हो जाएगी, जो केवल चार वर्षों में चार गुना विस्तार को दर्शाती है।
- इन केंद्रों की विद्युत की माँग वर्ष 2024 के लगभग 13 टेरावाट-घंटे (TWh) से बढ़कर वर्ष 2030 तक लगभग 57 TWh होने की आशा है।
- केंद्रीय विद्युत मंत्रालय का अनुमान है कि केवल कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI) के कारण ही वर्ष 2031–32 तक विद्युत की माँग में 26.3 गीगावाट की वृद्धि होगी।
- अधिकांश डेटा सेंटर मुंबई, हैदराबाद, बेंगलुरु और राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र जैसे वर्तमान प्रौद्योगिकी केंद्रों में केंद्रित हैं। ये वही स्थान हैं जहाँ पहले से ही जल संसाधनों और विद्युत ग्रिड पर दबाव सबसे अधिक है।
डेटा सेंटरों के विस्तार से संबंधित चिंताएँ
- जल की खपत: 100 MW क्षमता वाला डेटा सेंटर प्रतिदिन लगभग 20 लाख लीटर जल की खपत करता है। यह लगभग 6,500 परिवारों की दैनिक जल खपत के बराबर है।
- वर्ष 2024–25 में भारत के डेटा सेंटरों द्वारा अनुमानित 150 अरब लीटर जल की खपत की गई। अनुमान है कि वर्ष 2030 तक यह आँकड़ा दोगुने से अधिक होकर प्रतिवर्ष 358 अरब लीटर हो जाएगा।
- जल-संकटग्रस्त क्षेत्र: जल की खपत का यह मुद्दा इसलिए महत्त्वपूर्ण है, क्योंकि डेटा सेंटर भारत के सर्वाधिक जल-संकटग्रस्त क्षेत्रों में केंद्रित हो रहे हैं।
- राजस्थान अपने वार्षिक भूजल पुनर्भरण का 147.11% भूजल निकालता है, जो देश में दूसरी सबसे ऊँची दर है।
- महाराष्ट्र में भूजल आकलन की कई इकाइयों को अर्द्ध-संकटग्रस्त श्रेणी में रखा गया है।
- मानसून के दौरान अपर्याप्त पुनर्भरण के कारण वर्ष 2024 की गर्मियों में हैदराबाद की सतही जल आपूर्ति में 20% की गिरावट आई, जिसके चलते जल बोर्ड को जल की आपूर्ति सीमित करनी पड़ी।
- भारत का विद्युत ग्रिड पहले से ही रिकॉर्ड माँग के कारण दबाव में है। वर्ष 2026 की प्रथम तिमाही में ही भारत ने 300 गीगावाट-घंटे नवीकरणीय ऊर्जा का उपयोग सीमित कर दिया, क्योंकि ग्रिड इतनी विद्युत का वहन नहीं कर सका।
- विगत पाँच वर्षों में भारत अपने वार्षिक पारेषण लक्ष्यों का केवल लगभग 80% ही पूरा कर पाया है।
- नवीकरणीय ऊर्जा संबंधी चुनौतियाँ: सौर ऊर्जा परियोजनाओं का निर्माण विद्युत को पहुँचाने वाली पारेषण लाइनों की तुलना में अधिक तीव्रता से हो रहा है। यह महत्त्वपूर्ण है, क्योंकि डेटा सेंटरों को विश्वसनीय और निर्बाध विद्युत की आवश्यकता होती है।
- यदि नवीकरणीय ऊर्जा इन केंद्रों तक नहीं पहुँच पाती है, तो उनकी विद्युत की आवश्यकता कोयले से पूरी की जाएगी। इससे कार्बन उत्सर्जन का भार बढ़ेगा, जिसे भारत कम करने का प्रयास कर रहा है।
- सतही तापमान में वृद्धि: एक अध्ययन में पाया गया कि डेटा सेंटर 10 किलोमीटर के दायरे में भूमि की सतह के तापमान में औसतन 2°C की वृद्धि करते हैं, जबकि कुछ चरम मामलों में यह वृद्धि 9.1°C तक पहुँच जाती है।
- अध्ययन के अनुसार, विश्वभर में लगभग 34 करोड़ लोग इन प्रभावित क्षेत्रों में रहते हैं।
- शासन संबंधी अंतराल : विभिन्न राज्यों की डेटा सेंटर नीतियों में विद्युत शुल्क से छूट, पारेषण शुल्क में रियायत, स्टाम्प शुल्क में राहत और त्वरित स्वीकृति जैसे उदार प्रोत्साहन दिए जाते हैं।
- किसी भी प्रमुख राज्य नीति में परियोजना शुरू होने से पहले विद्युत ग्रिड पर प्रभाव का आकलन अनिवार्य नहीं किया गया है।
आगे की राह
- सरकारों को चरणबद्ध तरीके से विद्युत और जल उपयोग के मानक लागू करने चाहिए, जिनके लिए अनुपालन योग्य तथा प्रवर्तनीय मानदंड निर्धारित हों।
- राष्ट्रीय AI एनर्जी स्टार रेटिंग: इससे खरीदारों और नियामकों को यह तुलना करने में सहायता मिलेगी कि कोई सुविधा या मॉडल वास्तव में कितना ऊर्जा-कुशल है।
- राष्ट्रीय सततता रूपरेखा: इसके अंतर्गत नवीकरणीय ऊर्जा के स्रोतों, जल खपत के प्रकटीकरण, विद्युत ग्रिड पर प्रभाव के आकलन तथा तापीय भार के मूल्यांकन के लिए न्यूनतम मानक निर्धारित किए जाएँगे।
- यह निवेशकों के लिए अपेक्षाओं का एक साझा समूह और उपभोक्ताओं के लिए सुरक्षा उपायों का एक समान आधार तैयार करेगी।
- यह इस तथ्य को भी मान्यता देगी कि पर्यावरणीय सीमाएँ आर्थिक सीमाएँ भी हैं और उनकी अनदेखी करने से भविष्य में केवल अधिक लागत उत्पन्न होगी।
निष्कर्ष
- विश्वभर में AI को तीव्रता से अपनाए जाने से ऊर्जा क्षेत्र और पर्यावरण, दोनों में व्यापक परिवर्तन होने की संभावना है।
- AI-संचालित डेटा सेंटरों के कारण विद्युत और जल की माँग में कई गुना वृद्धि होने का अनुमान है, जिससे CO₂ उत्सर्जन में वृद्धि, संसाधनों पर दबाव और इलेक्ट्रॉनिक अपशिष्ट (ई-अपशिष्ट) को लेकर चिंताएँ बढ़ रही हैं।
- AI ऊर्जा दक्षता बढ़ाने, नवीकरणीय ऊर्जा के एकीकरण और जलवायु परिवर्तन के अनुकूलन को सक्षम बनाकर प्रभावी समाधान भी प्रदान करता है।
- आगे की चुनौती यह सुनिश्चित करने की है कि AI के ऊर्जा-गहन विस्तार को स्वच्छ एवं सतत स्रोतों से ऊर्जा मिले और साथ ही इसकी क्षमता का उपयोग अधिक हरित तथा जलवायु एवं अन्य संकटों के प्रति अधिक सक्षम भविष्य के निर्माण में किया जाए।
Source: TH
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