पाठ्यक्रम: GS3/रक्षा
समाचार में
- रक्षा मंत्री ने नई दिल्ली में रक्षा कूटनीति पर आधारित ‘रक्षा’ दस्तावेज जारी किया।
रक्षा कूटनीति
- यह शांतिकाल में विदेश नीति एवं राष्ट्रीय सुरक्षा के उद्देश्यों को प्राप्त करने के लिए सैन्य परिसंपत्तियों, संसाधनों तथा संस्थानों का गैर-बलपूर्वक उपयोग है।
- इसके अंतर्गत संयुक्त सैन्य अभ्यास, बंदरगाह यात्राएँ, खुफिया जानकारी साझा करना, क्षमता निर्माण कार्यक्रम तथा मानवीय राहत जैसे सैन्य-से-सैन्य सहयोग के माध्यम से पारस्परिक विश्वास का निर्माण, संघर्ष की संभावना में कमी तथा सौम्य शक्ति के माध्यम से प्रभाव का प्रदर्शन किया जाता है।
मुख्य उद्देश्य
- विश्वास निर्माण: सीमा संबंधी तनावों से निपटने तथा अनजाने में तनाव बढ़ने की स्थिति से बचने के लिए खुले संचार माध्यमों, हॉटलाइन प्रणालियों तथा विश्वास-निर्माण उपायों (CBMs) की स्थापना करना।
- समुद्री एवं क्षेत्रीय स्थिरता: समुद्री डकैती, समुद्री आतंकवाद तथा अवैध मत्स्यन से विश्व की समुद्री संचार एवं आवागमन लाइनों (SLOCs) की सुरक्षा के लिए संयुक्त गश्त तथा खुफिया जानकारी साझा करने के माध्यम से सहयोग करना।
- साझेदार देशों का क्षमता निर्माण: मित्रवत विदेशी देशों की राष्ट्रीय रक्षा अवसंरचना को सुदृढ़ करने के लिए सैन्य प्रशिक्षण हेतु अवसर, जल सर्वेक्षण, तकनीकी कौशल तथा रक्षा उपकरणों के निर्यात की सुविधा प्रदान करना।
- रणनीतिक सामंजस्य: किसी बाध्यकारी रक्षा संधि के बिना शक्ति-संतुलन सुनिश्चित करने के लिए प्रमुख रणनीतिक साझेदारों एवं गठबंधनों के साथ अंतर-संचालनीयता को बढ़ाना।
प्रमुख चुनौतियाँ
- नौकरशाही समन्वय: कभी-कभी विदेश मंत्रालय (MEA) और रक्षा मंत्रालय (MoD) के बीच समन्वय के अभाव के कारण रक्षा समझौतों को क्रियान्वित करने में देरी हुई है।
- भूराजनीतिक संतुलन: किसी एक देश के साथ रक्षा संबंधों को सुदृढ़ करने से कभी-कभी दूसरे देश के साथ संबंधों में दूरी उत्पन्न होने का जोखिम रहता है।
- क्षमता एवं प्रशिक्षण संबंधी बाधाएँ: ग्लोबल साउथ के साझेदार देशों द्वारा युद्ध प्रशिक्षण संस्थानों एवं सैन्य अकादमियों में प्रशिक्षण अवसरों की माँग सामान्यतः उपलब्ध भौतिक क्षमता तथा समर्पित संस्थागत संसाधनों से अधिक है।
- सहायता पारिस्थितिकी तंत्र: रक्षा निर्यात के लिए दीर्घकालिक रखरखाव, मरम्मत एवं ओवरहॉल (MRO) तथा बिक्री-पश्चात सहायता की महत्वपूर्ण आवश्यकताएँ होती हैं। इन क्षमताओं को स्थापित विदेशी आपूर्तिकर्ताओं के समकक्ष लाने की आवश्यकता निरंतर बढ़ रही है।
नवीनतम विकास एवं प्रगति
- ‘रक्षा’ रणनीतिक रूपरेखा: यह आगमी 10 वर्षों के लिए वैश्विक रक्षा साझेदारियों के संदर्भ में भारत की रणनीतिक दिशा एवं दृष्टिकोण को रेखांकित करती है।
- यह भारत के रणनीतिक जुड़ाव में एक परिवर्तन को दर्शाती है, जिसमें राष्ट्रीय सुरक्षा उद्देश्यों को सक्रिय वैश्विक सहयोग के साथ जोड़ा गया है तथा दीर्घकालिक स्थिरता एवं पारस्परिक विकास को बढ़ावा दिया गया है।
- प्रमुख स्तंभ:
- रणनीतिक गठबंधन: द्विपक्षीय एवं बहुपक्षीय सुरक्षा सहयोग को सुदृढ़ करना।
- क्षमता निर्माण: मित्रवत देशों के साथ संयुक्त सैन्य अभ्यासों, प्रशिक्षण कार्यक्रमों तथा सर्वोत्तम कार्य-पद्धतियों के आदान-प्रदान को सुदृढ़ करना।
- स्वदेशी रक्षा निर्यात: भारत में निर्मित रक्षा प्लेटफॉर्मों के माध्यम से भारत को रक्षा विनिर्माण के एक सक्षम वैश्विक केंद्र के रूप में स्थापित करना।
- समुद्री सुरक्षा: हिंद महासागर क्षेत्र में शुद्ध सुरक्षा प्रदाता एवं प्रथम प्रत्युत्तरकर्ता के रूप में भारत की भूमिका को सुदृढ़ करना।
- महासागर (MAHASAGAR): भारत की ‘पड़ोसी प्रथम’ नीति तथा ‘दृष्टिकोण महासागर (MAHASAGAR)’ — क्षेत्रों में सुरक्षा एवं विकास के लिए पारस्परिक और समग्र प्रगति— के अनुरूप, भारत ने हिंद महासागर क्षेत्र (IOR) में प्रमुख साझेदारों एवं समान विचारधारा वाले देशों के साथ सुदृढ़ द्विपक्षीय एवं बहुपक्षीय साझेदारियाँ विकसित की हैं।
- दृष्टिकोण महासागर में विकास के लिए व्यापार, सतत विकास हेतु क्षमता निर्माण तथा साझा भविष्य के लिए पारस्परिक सुरक्षा की अवधारणाएँ सम्मिलित हैं।
निष्कर्ष
- रक्षा कूटनीति अब राज्य-कौशल के क्षेत्र में कोई गौण तत्व नहीं रह गई है, बल्कि यह सुरक्षा, औद्योगिक क्षमताओं तथा विदेश संबंधों के संगम पर स्थित एक महत्वपूर्ण साधन बन गई है।
- ‘रक्षा’ जैसी रणनीतिक नीतिगत रूपरेखाओं तथा स्वदेशी रक्षा निर्यात के विस्तार के माध्यम से भारत हिंद-प्रशांत क्षेत्र में एक स्थिर आधार एवं विश्वसनीय सुरक्षा आपूर्तिकर्ता के रूप में अपनी भूमिका को परिभाषित करने में योगदान दे रहा है।
- इन रणनीतिक आकांक्षाओं को दीर्घकालिक एवं स्थायी राजनयिक साझेदारियों में परिवर्तित करने के लिए संस्थागत क्षमता का निर्माण तथा अंतर-मंत्रालयी समन्वय के माध्यम से प्रभावी क्रियान्वयन महत्वपूर्ण बना रहेगा।
स्रोत: PIB
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संक्षिप्त समाचार 04-09-2026