समावेशी नीली अर्थव्यवस्था (Blue Economy) के लिए तटीय विरासत का पुनरुद्धार 

पाठ्यक्रम: GS3/अर्थव्यवस्था

संदर्भ

  • भारत में समुद्री अवसंरचना, मत्स्य पालन, महासागरीय प्रौद्योगिकी और तटीय विकास के विस्तार के साथ नीली अर्थव्यवस्था को नीतिगत स्तर पर बढ़ता महत्व मिल रहा है। इसका उद्देश्य समावेशी और सतत विकास को बढ़ावा देना है।

नीली अर्थव्यवस्था के बारे में

  • नीली अर्थव्यवस्था से तात्पर्य आर्थिक विकास, आजीविका और पारिस्थितिक संरक्षण के लिए महासागरीय एवं तटीय संसाधनों के सतत उपयोग से है।
  • इसके अंतर्गत मत्स्य पालन एवं जलीय कृषि, नौवहन एवं बंदरगाह, तटीय पर्यटन, अपतटीय नवीकरणीय ऊर्जा, समुद्री जैव-प्रौद्योगिकी तथा गहरे समुद्र में खनिज जैसे उभरते क्षेत्र शामिल हैं।
  • भारत के लिए महासागर आर्थिक अवसर के साथ-साथ लाखों लोगों की आजीविका का आधार भी है।
    • राष्ट्रीय जल सर्वेक्षण कार्यालय के अनुसार, भारत की तटरेखा 11,098.81 किमी लंबी है। देश में 13 प्रमुख बंदरगाह और एक विस्तृत अनन्य आर्थिक क्षेत्र (EEZ) है। देश की लगभग 35% आबादी तटरेखा से 100 किमी के दायरे में रहती है।

नीली अर्थव्यवस्था का महत्व

  • आर्थिक विकास: नौवहन, बंदरगाह, मत्स्य पालन, पर्यटन और उभरते महासागरीय उद्योगों को बढ़ावा देती है।
  • रोजगार एवं आजीविका: मछुआरों और तटीय समुदायों की आजीविका को बनाए रखने के साथ-साथ नए कुशल रोजगार के अवसर सृजित करती है।
  • खाद्य एवं पोषण सुरक्षा: मत्स्य पालन और जलीय कृषि किफायती पशु प्रोटीन तथा आजीविका के महत्वपूर्ण स्रोत हैं।
  • ऊर्जा सुरक्षा: अपतटीय पवन ऊर्जा, ज्वारीय ऊर्जा और महासागर आधारित प्रौद्योगिकियाँ ऊर्जा स्रोतों में विविधता ला सकती हैं।
  • जलवायु अनुकूलन क्षमता: मैंग्रोव, समुद्री घास और लवणीय दलदल महत्वपूर्ण ब्लू-कार्बन सिंक के रूप में कार्य करते हैं तथा तटीय क्षेत्रों को सुरक्षा प्रदान करते हैं।
  • रणनीतिक महत्व: समुद्री अवसंरचना हिंद महासागर क्षेत्र (IOR) और वैश्विक आपूर्ति शृंखलाओं में भारत की भूमिका को सुदृढ़ करती है।
  • सांस्कृतिक महत्व: पारंपरिक मत्स्य पालन पद्धतियाँ, नाव निर्माण और समुद्री विरासत स्थानीय ज्ञान एवं सांस्कृतिक पहचान को संरक्षित करते हैं।

भारत के हालिया कदम एवं सहयोग

  • भारत ने निम्नलिखित माध्यमों से बहुआयामी दृष्टिकोण अपनाया है:
    • सागरमाला कार्यक्रम: बंदरगाह-आधारित विकास, तटीय संपर्क और लॉजिस्टिक्स दक्षता को बढ़ावा देने के लिए।
    • डीप ओशन मिशन: गहरे समुद्र में अन्वेषण, महासागरीय विज्ञान, जैव विविधता तथा संसाधनों के आकलन के लिए।
    • प्रधानमंत्री मत्स्य संपदा योजना (PMMSY): मत्स्य क्षेत्र का आधुनिकीकरण, अवसंरचना को सुदृढ़ करने तथा मछुआरों की आजीविका में सुधार के लिए।
    • नीली क्रांति एवं सतत जलीय कृषि पहल: पारिस्थितिक दबाव को कम करते हुए उत्पादकता बढ़ाने के लिए।
    • इंडो-पैसिफिक ओशन इनिशिएटिव (IPOI): समुद्री पारिस्थितिकी, संसाधन और आपदा जोखिम न्यूनीकरण को सहयोग के महत्वपूर्ण क्षेत्रों के रूप में बढ़ावा देने के लिए।
    • IORA एवं अन्य हिंद महासागर साझेदारियाँ: सतत मत्स्य पालन, समुद्री अनुसंधान और महासागरीय शासन के क्षेत्र में सहयोग के लिए।

नीली अर्थव्यवस्था से संबंधित वैश्विक प्रयास

  • संयुक्त राष्ट्र का सतत विकास लक्ष्य-14 (SDG 14) महासागरों के संरक्षण और उनके सतत उपयोग को बढ़ावा देता है। संयुक्त राष्ट्र महासागर विज्ञान दशक (2021–2030) का उद्देश्य सतत महासागर प्रबंधन के लिए वैज्ञानिक ज्ञान को बेहतर बनाना है।
    • BBNJ समझौता राष्ट्रीय अधिकार क्षेत्र से बाहर के समुद्री क्षेत्रों में समुद्री जैव विविधता के संरक्षण को सुदृढ़ करता है।
  • विश्व बैंक का PROBLUE कार्यक्रम तथा OECD द्वारा सतत महासागरीय अर्थव्यवस्थाओं से संबंधित कार्य भी निवेश, शासन और समावेशी विकास पर बल देते हैं।

संबंधित मुद्दे एवं चिंताएँ

  • तीव्रता से होने वाला ब्लू डेवलोपमेंट ‘ब्लू ग्रैबिंग’ का रूप ले सकता है, यदि बंदरगाह, पर्यटन और अपतटीय परियोजनाओं के कारण छोटे स्तर के मछुआरे विस्थापित हों या तटीय संसाधनों तक उनकी पारंपरिक पहुँच सीमित हो जाए।
  • अन्य प्रमुख चिंताएँ हैं:
    • अत्यधिक मत्स्य दोहन और मछली भंडार में कमी।
    • प्लास्टिक एवं रासायनिक प्रदूषण।
    • तटीय क्षरण, चक्रवात और समुद्र-स्तर में वृद्धि।
    • मैंग्रोव और प्रवाल भित्तियों के क्षरण सहित आवासों का विनाश।
    • पर्यटन और बंदरगाहों से होने वाले राजस्व का असमान वितरण।
    • समुद्री कामगारों के लिए खराब कार्य परिस्थितियाँ और उनके परित्यक्त होने का जोखिम।
    • लैंगिक असमानता: महिलाएँ मत्स्य क्षेत्र के फसलोत्तर कार्यों में बड़ी भूमिका निभाती हैं, लेकिन समुद्री क्षेत्र से संबंधित निर्णय-निर्माण में उनका प्रतिनिधित्व कम है।
    • औपचारिक शासन व्यवस्था में पारंपरिक पारिस्थितिक ज्ञान का सीमित समावेशन।

केस स्टडी: भारत एवं विश्व

  • कुंबलांगी, केरल: मछली पकड़ने की परंपराओं, नारियल रेशा निर्माण और चीनी मछली पकड़ने वाले जालों के आसपास विकसित सामुदायिक पर्यटन यह दर्शाता है कि स्थानीय संस्कृति अतिरिक्त आजीविका के अवसर सृजित कर सकती है।
  • चिलिका झील, ओडिशा: मत्स्य प्रबंधन में सामुदायिक भागीदारी और आजीविका के विविधीकरण से पारिस्थितिक संरक्षण तथा मछुआरों के हितों के बीच संतुलन के महत्व का पता चलता है।
  • सेशेल्स: समुद्री संरक्षण को पर्यटन के साथ जोड़कर यह दर्शाया गया है कि पर्यटकों से प्राप्त राजस्व का उपयोग पारिस्थितिकी तंत्र के संरक्षण के लिए किया जा सकता है।
  • जांज़ीबार: पारंपरिक धौ नाव निर्माण यह दर्शाता है कि समुद्री विरासत सांस्कृतिक पर्यटन और कारीगरों की आजीविका का स्रोत बन सकती है।

आगे की राह: सतत नीली अर्थव्यवस्था

  • भारत को ‘ब्लू ग्रोथ’ से ‘ब्लू रीजेनेरेशन’  के मॉडल की ओर बढ़ना चाहिए।
  • मत्स्य पालन, पर्यटन और बंदरगाहों की योजना में तटीय समुदायों को केवल लाभार्थी न मानकर कानूनी रूप से निर्धारित प्रतिनिधित्व के माध्यम से सह-स्वामी बनाया जाना चाहिए।
  • तटीय परियोजनाओं में स्थानीय रोजगार और राजस्व-साझेदारी को अनिवार्य किया जाना चाहिए।
  • पारंपरिक पारिस्थितिक ज्ञान को आधुनिक समुद्री विज्ञान के साथ एकीकृत किया जाना चाहिए।
  • मछली पकड़ने वाले जिलों में महासागर साक्षरता, व्यावसायिक प्रशिक्षण और पुनःकौशल विकास का विस्तार किया जाना चाहिए।
  • महिलाओं के नेतृत्व वाले मत्स्य उद्यमों, पारिस्थितिकी पर्यटन और समुद्री मूल्य शृंखलाओं को बढ़ावा दिया जाना चाहिए।
  • समुद्री स्थानिक नियोजन, सतत मत्स्य पालन और पारिस्थितिकी तंत्र के पुनरुद्धार को सुदृढ़ किया जाना चाहिए।
  • नाव निर्माण, संग्रहालयों, उत्सवों और ऐतिहासिक बंदरगाहों जैसी समुद्री विरासत को आर्थिक परिसंपत्ति के रूप में मान्यता दी जानी चाहिए।

निष्कर्ष

  • भारत की नीली अर्थव्यवस्था समावेशी विकास, पारिस्थितिक सुरक्षा और समुद्री शक्ति का इंजन तभी बन सकती है, जब तटीय समुदायों को इसके स्वरूप और दिशा तय करने में सार्थक भागीदारी मिले।
  • उद्देश्य केवल महासागर से अधिक आर्थिक मूल्य प्राप्त करना नहीं होना चाहिए, बल्कि यह सुनिश्चित करना होना चाहिए कि महासागरीय अर्थव्यवस्था उन लोगों और पारिस्थितिकी तंत्रों को सुदृढ़ करे, जिन्होंने पीढ़ियों से इसे बनाए रखा है।
दैनिक मुख्य परीक्षा अभ्यास प्रश्न
[प्रश्न] स्थानीय अर्थव्यवस्थाओं को सुदृढ़ करने, पारंपरिक पारिस्थितिक ज्ञान के संरक्षण तथा महासागरीय शासन में सामुदायिक भागीदारी को बढ़ावा देने में तटीय विरासत के महत्व की चर्चा कीजिए। 

स्रोत: ORF Online

 

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