पाठ्यक्रम: GS2/अंतरराष्ट्रीय संबंध
संदर्भ
- हिंद-प्रशांत क्षेत्र में भारत की बढ़ती भूमिका, जी-20 में उसका उभरता प्रभाव तथा बदलती भू-राजनीतिक परिस्थितियों ने दक्षिण एशिया तक सीमित सामरिक दृष्टिकोण से आगे बढ़कर वैश्विक एवं हित-आधारित रणनीतिक सहभागिता की आवश्यकता पर नए सिरे से विमर्श को गति दी है।
भारत का सामरिक दृष्टिकोण
- परंपरागत रूप से भारत का सामरिक दृष्टिकोण भौगोलिक सीमाओं पर आधारित रहा है, जिसमें क्षेत्रीय सुरक्षा, हिमालय, नियंत्रण रेखा, वास्तविक नियंत्रण रेखा, हिंद महासागर तथा निकटवर्ती पड़ोस को प्रमुखता दी गई।
- इसका उद्देश्य राष्ट्रीय संप्रभुता की रक्षा तथा क्षेत्रीय स्थिरता बनाए रखना था।
- किंतु वर्तमान में भारत एक प्रमुख आर्थिक, प्रौद्योगिकीय एवं समुद्री शक्ति के रूप में उभरा है।
- परिणामस्वरूप, राष्ट्रीय सुरक्षा अब केवल स्थलीय सीमाओं तक सीमित नहीं रह गई है, बल्कि समुद्री संपर्कों, प्रौद्योगिकी, ऊर्जा सुरक्षा, आपूर्ति शृंखलाओं, साइबर क्षेत्र तथा रणनीतिक साझेदारियों से भी गहराई से जुड़ गई है।
- इसलिए भारत की सामरिक सोच अब भौगोलिक सीमाओं से आगे बढ़कर हित-आधारित संरचना की ओर अग्रसर है, जहाँ संपर्क, प्रौद्योगिकी, समुद्री प्रभाव, आपूर्ति शृंखलाएँ तथा रणनीतिक साझेदारियाँ क्षेत्रीय सीमाओं जितनी ही महत्त्वपूर्ण हो गई हैं।
पूर्व अनुभव: भौगोलिक निकटता पर आधारित दृष्टिकोण
- भारत की सामरिक प्राथमिकताएँ लंबे समय तक अपने निकटवर्ती पड़ोस से निर्धारित होती रहीं, जिसके प्रमुख कारण थे—
- पाकिस्तान से निरंतर सुरक्षा चुनौतियाँ (सीमा-पार आतंकवाद)।
- चीन के साथ सीमा विवाद एवं सैन्य गतिरोध।
- पड़ोस प्रथम नीति के माध्यम से दक्षिण एशिया में शांति एवं स्थिरता को बढ़ावा देना।
- हिंद महासागर की सुरक्षा, समुद्री संचार मार्गों तथा समुद्री व्यापार की सुरक्षा सुनिश्चित करना।
- क्षेत्रीय अखंडता एवं सीमा प्रबंधन पर केंद्रित स्थलीय रक्षा व्यवस्था।
- यह दृष्टिकोण बीसवीं शताब्दी की सामरिक परिस्थितियों के अनुरूप प्रभावी था, किंतु वर्तमान भू-राजनीतिक चुनौतियों के संदर्भ में इसकी सीमाएँ स्पष्ट होने लगी हैं।

भारत के सामरिक दृष्टिकोण के पुनर्परिकल्पन की आवश्यकता
- हिंद-प्रशांत क्षेत्र का बढ़ता महत्त्व: भारत के आर्थिक एवं सामरिक हित अब संपूर्ण हिंद-प्रशांत क्षेत्र तक विस्तृत हो चुके हैं।
- समुद्री व्यापार, नौसैनिक उपस्थिति तथा रणनीतिक साझेदारियाँ इस क्षेत्र की सुरक्षा को प्रभावित कर रही हैं।
- ऊर्जा एवं आपूर्ति शृंखला सुरक्षा: भारत के कुल कच्चे तेल आयात का 80% से अधिक भाग खाड़ी क्षेत्र से प्राप्त होता है।
- महत्त्वपूर्ण खनिजों, अर्धचालकों की आपूर्ति शृंखलाओं तथा उभरती प्रौद्योगिकियों की सुरक्षा के लिए दक्षिण एशिया से परे विविध वैश्विक साझेदारियों की आवश्यकता है।
- चीन की बढ़ती सामरिक उपस्थिति: चीन ने समुद्री अवसंरचना, मोतियों की माला रणनीति, डिजिटल प्रौद्योगिकियों, बेल्ट एंड रोड पहल, व्यापार एवं निवेश के माध्यम से एशिया और अफ्रीका में अपनी सामरिक उपस्थिति का विस्तार किया है।
- अतः भारत की रणनीतिक प्रतिक्रिया केवल हिमालयी सीमाओं तक सीमित नहीं रह सकती।
- उभरती गैर-पारंपरिक सुरक्षा चुनौतियाँ: साइबर सुरक्षा, कृत्रिम बुद्धिमत्ता, अंतरिक्ष सुरक्षा, जलवायु परिवर्तन तथा सुदृढ़ आपूर्ति शृंखलाओं जैसी चुनौतियों ने भौगोलिक सीमाओं के महत्त्व को अपेक्षाकृत कम कर दिया है।
- अब दूरस्थ क्षेत्रों में घटित घटनाएँ भी भारत के राष्ट्रीय हितों को प्रत्यक्ष रूप से प्रभावित करती हैं।
- सभ्यतागत कूटनीति के रूप में सामरिक पूँजी: बौद्ध धर्म, नालंदा, हिंद महासागर व्यापार नेटवर्क तथा सांस्कृतिक आदान-प्रदान पर आधारित भारत की ऐतिहासिक विरासत दक्षिण-पूर्व एशिया, मध्य एशिया, खाड़ी क्षेत्र एवं अफ्रीका के साथ साझेदारी को सुदृढ़ करती है।
- यह भारत की सौम्य शक्ति तथा विश्वसनीय सहभागिता को भी सशक्त बनाती है।
भारत द्वारा उठाए गए संबंधित प्रयास
- भारत ने व्यापक सामरिक दृष्टिकोण की दिशा में अपनी विदेश नीति को पुनर्संतुलित करने हेतु अनेक पहलें की हैं—
- एक्ट ईस्ट नीति के माध्यम से दक्षिण-पूर्व एशियाई राष्ट्रों के संगठन एवं हिंद-प्रशांत क्षेत्र के साथ सहभागिता का विस्तार।
- पड़ोस प्रथम नीति के माध्यम से क्षेत्रीय संपर्क एवं स्थिरता को बढ़ावा।
- क्षेत्र में सभी के लिए सुरक्षा एवं विकास के माध्यम से हिंद महासागर क्षेत्र में समुद्री सहयोग को सुदृढ़ करना।
- हिंद-प्रशांत महासागर पहल के माध्यम से स्वतंत्र, मुक्त एवं समावेशी हिंद-प्रशांत क्षेत्र को प्रोत्साहन।
- चतुष्पक्षीय सुरक्षा संवाद में सहभागिता के माध्यम से समुद्री सुरक्षा, सुदृढ़ आपूर्ति शृंखलाओं एवं उभरती प्रौद्योगिकियों में सहयोग।
- भारत–इज़राइल–संयुक्त अरब अमीरात–संयुक्त राज्य अमेरिका समूह तथा भारत–मध्य पूर्व–यूरोप आर्थिक गलियारा के माध्यम से संपर्क, व्यापार एवं सामरिक एकीकरण को बढ़ावा।
- अंतरराष्ट्रीय सौर गठबंधन एवं वैश्विक दक्षिण से संबंधित पहलों के माध्यम से उत्तरदायी विकास भागीदार के रूप में भारत की भूमिका को सुदृढ़ करना।
- क्षमता निर्माण, डिजिटल सार्वजनिक अवसंरचना, मानवीय सहायता तथा आधारभूत संरचना सहयोग के माध्यम से अफ्रीका, खाड़ी क्षेत्र एवं मध्य एशिया के साथ संबंधों का विस्तार।
आगे की राह : भारत के सामरिक दृष्टिकोण का सुदृढ़ीकरण
- कूटनीति, रक्षा, वाणिज्य, प्रौद्योगिकी एवं आर्थिक सुरक्षा को समाहित करने वाली समग्र शासन-आधारित सामरिक रणनीति अपनाई जाए।
- हिंद-प्रशांत क्षेत्र में समुद्री क्षमता एवं नौसैनिक उपस्थिति को और अधिक सुदृढ़ किया जाए।
- निकटवर्ती प्रतिद्वंद्वी देशों पर अत्यधिक सामरिक निर्भरता कम करते हुए भारत के वैश्विक रणनीतिक संबंधों का विस्तार किया जाए।
- ऊर्जा स्रोतों एवं महत्त्वपूर्ण खनिजों की आपूर्ति शृंखलाओं में विविधता लाकर सामरिक लचीलापन बढ़ाया जाए।
- भारत की सभ्यतागत विरासत एवं लोकतांत्रिक मूल्यों को सौम्य शक्ति के प्रभावी साधन के रूप में उपयोग किया जाए।
- भारत–मध्य पूर्व–यूरोप आर्थिक गलियारा, चाबहार बंदरगाह, बहु-क्षेत्रीय तकनीकी एवं आर्थिक सहयोग हेतु बंगाल की खाड़ी पहल तथा दक्षिण-पूर्व एशियाई राष्ट्रों के संगठन के नेतृत्व वाली परियोजनाओं के माध्यम से संपर्क को सुदृढ़ किया जाए।
- भारत के दीर्घकालिक सामरिक हितों की रक्षा के लिए नई प्रौद्योगिकियों, साइबर सुरक्षा एवं अंतरिक्ष क्षमताओं पर विशेष बल दिया जाए।
| दैनिक मुख्य परीक्षा अभ्यास प्रश्न प्रश्न: भारत की सुरक्षा को भौगोलिक कारक वर्तमान में भी प्रभावित करते हैं, किंतु वे अब उसके सामरिक दृष्टिकोण का एकमात्र आधार नहीं रह सकते। भारत के विस्तृत होते वैश्विक हितों के संदर्भ में इस कथन का समालोचनात्मक परीक्षण कीजिए। |
स्रोत: IE