पाठ्यक्रम: GS2 /शासन
संदर्भ
- भारत के नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक (CAG) ने छत्तीसगढ़ में प्रधानमंत्री खनिज क्षेत्र कल्याण योजना (PMKKKY) के क्रियान्वयन तथा जिला खनिज प्रतिष्ठान न्यास (DMFT) निधियों के उपयोग में गंभीर अनियमितताओं को उजागर किया है।
प्रधानमंत्री खनिज क्षेत्र कल्याण योजना (PMKKKY)
- प्रारंभ: वर्ष 2015 में खनन मंत्रालय द्वारा प्रारंभ की गई।
- उद्देश्य: खनन से प्राप्त राजस्व का उपयोग खनन-प्रभावित क्षेत्रों एवं वहाँ के लोगों के सामाजिक-आर्थिक विकास तथा कल्याण के लिए सुनिश्चित करना।
- वित्तपोषण व्यवस्था: योजना का क्रियान्वयन जिला खनिज प्रतिष्ठान न्यास (DMFT) के माध्यम से किया जाता है।
- खान एवं खनिज (विकास एवं विनियमन) अधिनियम, 1957 के अंतर्गत खनन पट्टा धारकों द्वारा अनिवार्य अंशदान DMFT को प्रदान किया जाता है।
- प्रमुख फोकस क्षेत्र: पेयजल आपूर्ति।
- स्वास्थ्य सेवाएँ।
- शिक्षा।
- कौशल विकास।
- महिला एवं बाल कल्याण।
- पर्यावरणीय पुनर्स्थापन।
- सतत आजीविका सृजन।
- खनन-प्रभावित क्षेत्रों में आधारभूत अवसंरचना का विकास।
CAG लेखापरीक्षा के प्रमुख निष्कर्ष
- PMKKKY के मूल उद्देश्य का क्षरण: PMKKKY के अंतर्गत DMFT निधियों का उपयोग केवल उन व्यक्तियों एवं गाँवों के लिए किया जाना था, जो प्रत्यक्ष अथवा अप्रत्यक्ष रूप से खनन गतिविधियों से प्रभावित हैं।
- किंतु छत्तीसगढ़ DMFT नियम, 2015 में “प्रभावित व्यक्ति” की परिभाषा का विस्तार कर इसे मूल उद्देश्य से अधिक व्यापक बना दिया गया।
- इसके परिणामस्वरूप बिना स्पष्ट पात्रता मानदंड के खनन जिलों के सभी निवासियों को योजना का लाभ प्रदान किया गया।
- बड़ी संख्या में खनन-प्रभावित गाँव योजना से वंचित: प्रत्यक्ष रूप से प्रभावित 1,734 गाँवों में से लगभग 44% (754 गाँव) योजना के दायरे से बाहर रहे।
- गैर-प्राथमिकता वाले कार्यों पर व्यय: DMFT निधियों का उपयोग PMKKKY की प्राथमिकताओं से पृथक कार्यों में किया गया।
- इनमें सौंदर्यीकरण परियोजनाएँ, सरकारी कार्यालयों का नवीनीकरण आदि शामिल थे।
- वैज्ञानिक योजना का अभाव: लेखापरीक्षा में पाया गया कि DMFT निधियों के व्यय से पूर्व—
- कोई मास्टर प्लान तैयार नहीं किया गया।
- कोई दृष्टि दस्तावेज नहीं बनाया गया।
- कोई वार्षिक विकास योजना तैयार नहीं की गई।
- खनन-प्रभावित क्षेत्रों की पहचान में विलंब: प्रभावित गाँवों की पहचान करने में 5 माह से लेकर 5 वर्ष तक का विलंब पाया गया।
भारत के नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक (CAG)
- CAG भारत का सर्वोच्च लेखापरीक्षण प्राधिकरण है, जो सरकारी लेखों का परीक्षण कर सार्वजनिक वित्तीय प्रबंधन में पारदर्शिता, उत्तरदायित्व तथा वित्तीय अनुशासन सुनिश्चित करता है।
- भारतीय संविधान के अनुच्छेद 148 से 151 तक CAG की नियुक्ति, शक्तियों, कर्तव्यों तथा प्रतिवेदन संबंधी प्रावधान किए गए हैं।
- नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक (कर्तव्य, शक्तियाँ एवं सेवा की शर्तें) अधिनियम, 1971 के माध्यम से CAG की सेवा शर्तें, शक्तियाँ तथा दायित्व निर्धारित किए गए हैं।
CAG के प्रमुख कर्तव्य एवं दायित्व
- भारत, राज्यों तथा विधानमंडल वाले केंद्रशासित प्रदेशों की संचित निधि से होने वाले व्यय का लेखापरीक्षण करना।
- भारत एवं राज्यों की आकस्मिक निधि तथा लोक लेखा से संबंधित व्ययों का लेखापरीक्षण करना।
- राष्ट्रपति की स्वीकृति से ऋण, अवक्षय निधि , जमा, अग्रिम, संदेहास्पद लेखे तथा प्रेषण संबंधी लेन-देन का लेखापरीक्षण करना।
- राष्ट्रपति अथवा राज्यपाल के अनुरोध पर किसी प्राधिकरण अथवा स्थानीय निकाय के लेखों का लेखापरीक्षण करना।
राष्ट्रपति को प्रस्तुत किए जाने वाले CAG के लेखापरीक्षा प्रतिवेदन
- भारतीय संविधान के अनुच्छेद 151 के अंतर्गत CAG भारत के राष्ट्रपति को निम्नलिखित तीन लेखापरीक्षा प्रतिवेदन प्रस्तुत करता है—
- विनियोजन लेखा प्रतिवेदन: यह प्रतिवेदन दर्शाता है कि संसद द्वारा स्वीकृत धनराशि विभिन्न व्यय मदों एवं अनुदानों में किस प्रकार आवंटित की गई।
- साथ ही यह भी सुनिश्चित करता है कि धनराशि का उपयोग निर्धारित उद्देश्य के अनुरूप हुआ या नहीं।
- वित्तीय लेखा प्रतिवेदन: इसमें देश की वार्षिक प्राप्तियों एवं व्ययों का विवरण प्रस्तुत किया जाता है।
- लोक उपक्रमों पर लेखापरीक्षा प्रतिवेदन: इसमें विभिन्न सार्वजनिक क्षेत्र उपक्रमों (PSUs) की वित्तीय स्थिति एवं व्यय का परीक्षण किया जाता है।
- विनियोजन लेखा प्रतिवेदन: यह प्रतिवेदन दर्शाता है कि संसद द्वारा स्वीकृत धनराशि विभिन्न व्यय मदों एवं अनुदानों में किस प्रकार आवंटित की गई।
आगे की प्रक्रिया
- राष्ट्रपति इन प्रतिवेदनों को संसद के दोनों सदनों के समक्ष प्रस्तुत करते हैं।
- इसके पश्चात लोक लेखा समिति (PAC) इन प्रतिवेदनों की समीक्षा करती है तथा अपनी अनुशंसाओं सहित प्रतिवेदन संसद को प्रस्तुत करती है।
स्रोत: IE