पाठ्यक्रम: GS2/न्यायपालिका; ई-शासन
संदर्भ
- हाल ही में सर्वोच्च न्यायालय (SC) ने “न्यायालयों में कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI) के उपयोग संबंधी विनियम, 2026” का प्रारूप जारी किया है। इसका उद्देश्य न्यायपालिका में AI के उपयोग हेतु एक प्रभावी शासन ढांचा विकसित करना है।
परिचय
- ये प्रारूप विनियम सर्वोच्च न्यायालय में भारत के मुख्य न्यायाधीश (CJI) द्वारा अधिसूचित की जाने वाली तिथि से प्रभावी होंगे।
- उच्च न्यायालयों तथा उनके अधीनस्थ न्यायालयों एवं अधिकरणों के लिए ये विनियम संबंधित उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश द्वारा अधिसूचित तिथि से लागू होंगे।
- विभिन्न प्रावधानों को अलग-अलग तिथियों पर लागू किया जा सकेगा, जिससे न्यायालय अपनी आवश्यकताओं एवं परिस्थितियों के अनुसार AI को चरणबद्ध तरीके से अपनाने में सक्षम होंगे।
विनियमों की प्रमुख विशेषताएँ
- प्रशासनिक कार्यों जैसे—
- वाद प्रबंधन ,
- वाद सूची तैयार करना,
- सुनवाई का समय-निर्धारण ,
- न्यायालयीय कार्यवाही का प्रतिलेखन , तथा
- निर्णयों का अनुवाद के लिए AI के उपयोग की अनुमति प्रदान की गई है।
- न्यायिक प्रक्रियाओं में AI का उपयोग “जोखिम मूल्यांकन “ हेतु नहीं किया जा सकेगा। इसमें शामिल हैं—
- अभियुक्त के फरार होने की संभावना का आकलन,
- पुनः अपराध करने की संभावना का पूर्वानुमान,
- जमानत पात्रता का मूल्यांकन, तथा
- पक्षकारों अथवा गवाहों की विश्वसनीयता का निर्धारण।
- AI प्रणालियों द्वारा व्यक्तिगत डेटा के प्रसंस्करण को डिजिटल व्यक्तिगत डेटा संरक्षण अधिनियम, 2023 के प्रावधानों के अनुसार नियंत्रित किया जाएगा।
- न्यायपालिका में AI के उपयोग की निगरानी हेतु सर्वोच्च न्यायालय में एक पूर्णकालिक “शीर्ष निकाय “ के गठन का प्रस्ताव किया गया है।
- कृत्रिम बुद्धिमत्ता अनुसंधान एवं उत्कृष्टता केंद्र (CoRE-AI) AI उपकरणों का मूल्यांकन करेगा तथा नवीनतम तकनीकी विकास पर निगरानी रखकर शीर्ष निकाय को सहयोग प्रदान करेगा।
- पक्षकारों को सूचना देना : यदि कोई न्यायालय वाद प्रबंधन, दस्तावेज़ विश्लेषण अथवा न्यायिक प्रशासन के किसी महत्वपूर्ण पहलू में AI का उपयोग करता है, तो उसे संबंधित पक्षकारों को समयबद्ध एवं सुलभ तरीके से इसकी सूचना देना अनिवार्य होगा।
- साइबर सुरक्षा लेखा-परीक्षण : AI प्रणाली के लागू होने के पश्चात उसका तकनीकी, विधिक एवं नैतिक परीक्षण किया जाएगा। साथ ही समान अवधि में पृथक साइबर सुरक्षा लेखा-परीक्षण भी किया जाएगा।
- यह परीक्षण न्यायालय द्वारा आंतरिक रूप से किया जाएगा क्योंकि स्रोत कोड एवं प्रशिक्षण डेटा को किसी तृतीय पक्ष के साथ साझा नहीं किया जा सकेगा।
- प्रत्येक न्यायालय को स्वीकृत AI प्रणालियों तथा उनके लेखा-परीक्षण के परिणामों का विवरण रखने हेतु AI रजिस्टर बनाए रखना होगा।
- प्रत्येक उच्च न्यायालय को AI प्रणाली के विफल होने की स्थिति में न्यायिक कार्यों को मैन्युअल रूप से जारी रखने हेतु आपातकालीन वैकल्पिक व्यवस्था तैयार करनी होगी।
- यह परीक्षण न्यायालय द्वारा आंतरिक रूप से किया जाएगा क्योंकि स्रोत कोड एवं प्रशिक्षण डेटा को किसी तृतीय पक्ष के साथ साझा नहीं किया जा सकेगा।
- शिकायत निवारण: यदि AI के निषिद्ध उपयोग के कारण किसी पक्षकार को हानि होती है, तो वह संबंधित न्यायालय में यथाशीघ्र आवेदन प्रस्तुत कर सकता है।
- न्यायालय संबंधित पक्ष को सुनवाई का अवसर प्रदान करेगा तथा परिस्थितियों के अनुसार उपयुक्त आदेश पारित करेगा।
- न्यायालय संबंधित पक्ष को सुनवाई का अवसर प्रदान करेगा तथा परिस्थितियों के अनुसार उपयुक्त आदेश पारित करेगा।
भारत की न्यायिक व्यवस्था में AI का उपयोग
- सर्वोच्च न्यायालय, उच्च न्यायालयों तथा राष्ट्रीय सूचना विज्ञान केंद्र (NIC) द्वारा विकसित AI उपकरण वर्तमान में निम्नलिखित कार्यों में सहायता प्रदान कर रहे हैं—
- मौखिक बहसों का प्रतिलेखन
- निर्णयों का अनुवाद
- ई-फाइलिंग में त्रुटियों की पहचान
- विधिक अनुसंधान
- मेटाडाटा निष्कर्षण
- विगत एक दशक में भारतीय न्यायालयों ने सामान्य कंप्यूटरीकरण से आगे बढ़कर—
- राष्ट्रीय डिजिटल प्लेटफॉर्म,
- वास्तविक समय डेटा प्रणाली,
- आभासी न्यायालय , तथा
- बहुभाषी निर्णय उपलब्धता जैसी व्यवस्थाओं को अपनाया है।
- ई-कोर्ट्स परियोजना के अंतर्गत विकसित सॉफ्टवेयर अनुप्रयोगों में AI तथा इसकी उप-प्रौद्योगिकियों जैसे—
- मशीन लर्निंग
- ऑप्टिकल कैरेक्टर रिकग्निशन
- प्राकृतिक भाषा संसाधन का व्यापक उपयोग किया जा रहा है।
भारत की न्यायपालिका में AI के उपयोग का महत्त्व
- वादों के लंबित रहने की समस्या : भारत की न्यायिक व्यवस्था में लंबित मामलों की संख्या अत्यधिक है, जिससे समयबद्ध न्याय प्रदान करने की क्षमता प्रभावित होती है। AI वाद प्रबंधन को अधिक प्रभावी बनाकर लंबित मामलों में कमी ला सकता है तथा न्यायिक प्रक्रियाओं को गति प्रदान कर सकता है।
- कारागारों में भीड़भाड़: भारतीय कारागार लंबे समय से अपनी क्षमता से अधिक कैदियों को रखने के कारण गंभीर भीड़भाड़ की समस्या का सामना कर रहे हैं। AI शिकायत पंजीकरण, जांच की निगरानी, आवश्यक कार्रवाई का संकेत देने तथा जांच की गुणवत्ता का मूल्यांकन करने में सहायता कर सकता है।
- अनुवाद एवं सुलभता : भारत में 22 अनुसूचित भाषाएँ एवं सैकड़ों बोलियाँ प्रचलित हैं। AI आधारित अनुवाद प्रणाली न्यायिक दस्तावेजों एवं निर्णयों को भाषाई बाधाओं से मुक्त बनाकर सभी नागरिकों के लिए अधिक सुलभ बना सकती है।
- सुवास (SUVAAS) परियोजना के माध्यम से हजारों न्यायिक निर्णयों का क्षेत्रीय भाषाओं में अनुवाद किया जा चुका है।
- सटीकता में वृद्धि: AI महत्वपूर्ण साक्ष्यों की उपेक्षा को रोकने तथा आपराधिक न्याय प्रक्रिया को अधिक सूक्ष्म, सटीक एवं विश्वसनीय बनाने में सहायक हो सकता है।
- न्याय तक पहुँच में सुधार: AI आधारित चैटबॉट एवं वर्चुअल सहायक विशेष रूप से उन वादकारियों के लिए उपयोगी हो सकते हैं जिन्हें विधिक प्रतिनिधित्व उपलब्ध नहीं है। ये न्यायिक प्रक्रियाओं को समझने, वाद की स्थिति जानने तथा याचिका दायर करने में सहायता प्रदान कर सकते हैं।
चिंताएँ/चुनौतियाँ
- पूर्वाग्रह एवं अत्यधिक निर्भरता : AI आधारित विधिक अनुसंधान में खोज संबंधी पूर्वाग्रह की संभावना रहती है, जिससे कुछ प्रासंगिक न्यायिक दृष्टांत छूट सकते हैं।
- AI पर अत्यधिक निर्भरता न्यायिक निर्णयों को केवल नियम-आधारित बना सकती है, जिससे मानवीय विवेक एवं परिस्थितिजन्य न्याय प्रभावित हो सकता है।
- डेटा संरक्षण एवं गोपनीयता : न्यायिक डेटा के संग्रहण, उपयोग एवं संरक्षण के संबंध में स्पष्ट एवं व्यापक नियामक ढाँचे का अभाव गोपनीयता संबंधी चिंताओं को उत्पन्न करता है।
- अवसंरचनात्मक कमियाँ: अनेक न्यायालय अभी भी असमान इंटरनेट कनेक्टिविटी, पुराने हार्डवेयर तथा सीमित तकनीकी विशेषज्ञता जैसी समस्याओं का सामना कर रहे हैं।
आगे की राह
- AI के उपयोग हेतु ऐसा संतुलित दृष्टिकोण अपनाया जाना चाहिए जो नागरिकों की गोपनीयता, मौलिक अधिकारों, नागरिक स्वतंत्रताओं तथा नैतिक मानकों का पूर्ण सम्मान सुनिश्चित करे तथा इसके दुरुपयोग को रोके।
- उपयुक्त सुरक्षा उपायों एवं प्रभावी नियामक व्यवस्था के साथ AI का उपयोग भारत की न्यायिक एवं आपराधिक न्याय प्रणाली को अधिक कुशल , सुलभ , पारदर्शी एवं न्यायसंगत बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है।
स्रोत: IE