पाठ्यक्रम: GS2/शासन
संदर्भ
- केंद्र सरकार ने घोषणा की है कि इंटरऑपरेबल क्रिमिनल जस्टिस सिस्टम (ICJS) के माध्यम से 1 जुलाई 2027 तक भारत में आपराधिक न्याय प्रणाली का पूर्ण डिजिटल क्रियान्वयन करने का लक्ष्य निर्धारित किया गया है।
परिचय
- इंटरऑपरेबल क्रिमिनल जस्टिस सिस्टम (ICJS) की स्थापना अपराध एवं अपराधी ट्रैकिंग नेटवर्क एवं प्रणाली (CCTNS), ई-न्यायालय , ई-कारागार , ई-फॉरेंसिक तथा ई-अभियोजन को एकीकृत करके की गई है।
- इस परियोजना के क्रियान्वयन हेतु राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो (NCRB) को नोडल एजेंसी नामित किया गया है, जबकि राष्ट्रीय सूचना विज्ञान केंद्र (NIC) इसकी प्रौद्योगिकी साझेदार संस्था के रूप में कार्य कर रहा है।
आपराधिक न्याय प्रणाली (CJS)
- आपराधिक न्याय प्रणाली में पुलिस, न्यायालय, कारागार, न्यायालयिक विज्ञान (फॉरेंसिक) तथा अभियोजन सेवाएँ सम्मिलित होती हैं। इसका उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि अपराध के कारण क्षति या हानि उठाने वाले व्यक्तियों को अपना पक्ष प्रस्तुत करने तथा न्याय प्राप्त करने का प्रभावी अवसर प्राप्त हो।
- डिजिटल आपराधिक न्याय प्रणाली: प्रस्तावित डिजिटल पारिस्थितिकी तंत्र का उद्देश्य आपराधिक कार्यवाही के प्रत्येक चरण का डिजिटलीकरण करना है, जिसमें निम्नलिखित शामिल हैं—
- प्रथम सूचना रिपोर्ट (FIR) का पंजीकरण।
- अपराध की जाँच एवं साक्ष्यों का संकलन।
- डिजिटल आरोप-पत्र का दाखिल किया जाना।
- न्यायालयिक विज्ञान (फॉरेंसिक) रिपोर्टों का प्रस्तुतिकरण।
- गवाहों की गवाही का डिजिटल माध्यम से प्रस्तुतीकरण।
- न्यायिक विचारण का संचालन।
- मामलों का अंतिम निस्तारण तथा अभिलेखीकरण ।

विकसित एवं अद्यतन की जा रही विभिन्न डिजिटल प्रणालियाँ
- अपराध एवं अपराधी ट्रैकिंग नेटवर्क एवं प्रणाली (CCTNS) परियोजना (2009): इस परियोजना का उद्देश्य सभी पुलिस थानों को एक समान अनुप्रयोग सॉफ़्टवेयर के माध्यम से परस्पर जोड़ना है, ताकि—
- अपराधों की जाँच,
- आँकड़ों का विश्लेषण,
- अनुसंधान,
- नीति-निर्माण तथा
- नागरिक सेवाओं का प्रभावी प्रावधान
- सुनिश्चित किया जा सके।
- ई-कारागार : ई-कारागार एक क्लाउड-आधारित अनुप्रयोग है, जिसे भारत के सभी राज्यों के लिए एकीकृत प्रणाली के रूप में विकसित किया गया है, जहाँ राज्य अपनी आवश्यकताओं के अनुरूप राज्य-विशिष्ट मापदंडों का विन्यास कर सकते हैं।
- यह प्रणाली कारागारों में निरुद्ध बंदियों से संबंधित महत्वपूर्ण सूचनाएँ वास्तविक समय में न्यायालयों, कारागार अधिकारियों तथा आपराधिक न्याय प्रणाली से संबंधित अन्य संस्थाओं को उपलब्ध कराती है।
- ई-फॉरेंसिक : ई-फॉरेंसिक, ICJS परियोजना के अंतर्गत विकसित एक ऑनलाइन प्रकरण पंजीकरण एवं ट्रैकिंग प्रणाली है, जो फॉरेंसिक विशेषज्ञों को पुलिस के लिए त्वरित, सटीक एवं विश्वसनीय न्यायालयिक विज्ञान रिपोर्ट उपलब्ध कराने में सहायता करती है।
- ई-अभियोजन : ई-अभियोजन प्रणाली का मुख्य उद्देश्य लोक अभियोजकों द्वारा अपनाई जाने वाली संपूर्ण प्रक्रिया का डिजिटलीकरण करना है, जिससे न्यायिक प्रक्रिया में पारदर्शिता आए तथा मामलों का शीघ्र एवं प्रभावी निस्तारण सुनिश्चित हो सके।
- राष्ट्रीय स्वचालित अंगुलिचिह्न पहचान प्रणाली (NAFIS): यह अपराधियों के अंगुलिचिह्नों का एक केंद्रीकृत डिजिटल भंडार है, जिसका उपयोग देशभर के राज्यों, केंद्रशासित प्रदेशों तथा केंद्रीय विधि प्रवर्तन एजेंसियों द्वारा किया जा सकता है।
- आपराधिक प्रक्रिया (पहचान) प्रणाली: सरकार ने आपराधिक प्रक्रिया (पहचान) अधिनियम, 2022 अधिनियमित किया है, जिसके अंतर्गत पुलिस एवं कारागार अधिकारियों को अपराध संबंधी जाँच एवं पहचान के उद्देश्य से संदिग्ध अथवा संबंधित व्यक्तियों के जैविक एवं अन्य माप एकत्रित करने का अधिकार प्रदान किया गया है।
- इस अधिनियम के देशव्यापी क्रियान्वयन हेतु राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो (NCRB) को सभी राज्यों एवं केंद्रशासित प्रदेशों के लिए नोडल एजेंसी नामित किया गया है।
चिंताएँ
- डेटा गोपनीयता एवं साइबर सुरक्षा संबंधी जोखिम: आपराधिक न्याय प्रणाली के विभिन्न डेटाबेसों के एकीकरण से डेटा उल्लंघन , साइबर हमलों तथा संवेदनशील व्यक्तिगत सूचनाओं के दुरुपयोग का जोखिम बढ़ जाता है।
- डिजिटल विभाजन एवं न्याय तक असमान पहुँच: ग्रामीण एवं दूरस्थ क्षेत्रों में कमजोर डिजिटल अवसंरचना तथा डिजिटल साक्षरता का निम्न स्तर समाज के कमजोर वर्गों को न्याय प्राप्त करने की प्रक्रिया से वंचित कर सकता है।
- निष्पक्ष विचारण एवं विधिक प्रक्रिया के समक्ष चुनौतियाँ: तकनीकी त्रुटियाँ, इंटरनेट कनेक्टिविटी संबंधी समस्याएँ तथा आभासी न्यायिक कार्यवाहियों पर अत्यधिक निर्भरता प्रभावी विधिक प्रतिनिधित्व एवं न्याय तक समान पहुँच को प्रभावित कर सकती हैं।
- संस्थागत एवं अवसंरचनात्मक चुनौतियाँ: प्रणालियों के मध्य समुचित अंतःसंचालनीयता का अभाव, अपर्याप्त डिजिटल अवसंरचना तथा पुलिस, अभियोजकों एवं न्यायिक अधिकारियों का अपर्याप्त प्रशिक्षण इस प्रणाली के प्रभावी क्रियान्वयन में बाधा उत्पन्न करता है।
- विधिक एवं नियामकीय कमियाँ: भारत में कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI), डिजिटल साक्ष्य, उत्तरदायित्व तथा डेटा शासन के उपयोग को विनियमित करने हेतु समग्र विधिक ढाँचे का अभाव है, जिससे अनिश्चितता एवं संभावित दुरुपयोग की आशंका बनी रहती है।
आगे की राह
- डेटा संरक्षण एवं साइबर सुरक्षा का सुदृढ़ीकरण: आपराधिक न्याय प्रणाली के डेटाबेस के लिए सुदृढ़ डेटा संरक्षण मानक, नियमित सुरक्षा ऑडिट, एन्क्रिप्शन तथा कठोर अभिगम नियंत्रण व्यवस्था लागू की जानी चाहिए।
- संस्थागत क्षमता का विकास: पुलिस, लोक अभियोजकों, न्यायालयिक विज्ञान विशेषज्ञों तथा न्यायिक अधिकारियों को डिजिटल उपकरणों, साइबर फॉरेंसिक तथा इलेक्ट्रॉनिक साक्ष्यों के उपयोग संबंधी नियमित प्रशिक्षण प्रदान किया जाना चाहिए।
- सुदृढ़ विधिक एवं नैतिक ढाँचे की स्थापना: कृत्रिम बुद्धिमत्ता, चेहरे की पहचान तथा डिजिटल साक्ष्यों के उपयोग हेतु स्पष्ट दिशानिर्देश तैयार किए जाएँ और गोपनीयता, पारदर्शिता एवं विधिक प्रक्रिया की निष्पक्षता सुनिश्चित करने के लिए स्वतंत्र निगरानी व्यवस्था स्थापित की जाए।
स्रोत: TH
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