क्या भारत में मतदान एक मौलिक अधिकार होना चाहिए?

पाठ्यक्रम: जीएस-2/राजव्यवस्था एवं शासन

सन्दर्भ

  • हाल ही में यह मांग उठने के साथ एक पुरानी संवैधानिक बहस फिर से चर्चा में आ गई है कि मतदान के अधिकार को मौलिक अधिकार के रूप में मान्यता दी जानी चाहिए।

भारत में मतदान का अधिकार

  • भारतीय संविधान का अनुच्छेद 326 यह प्रावधान करता है कि 18 वर्ष या उससे अधिक आयु का प्रत्येक भारतीय नागरिक, सार्वभौमिक वयस्क मताधिकार (Adult Suffrage) के आधार पर लोकसभा तथा प्रत्येक राज्य की विधानसभा के चुनावों के लिए मतदाता के रूप में पंजीकरण कराने का अधिकार रखता है।
  • प्रारंभ में अनुच्छेद 326 के अंतर्गत मतदान की न्यूनतम आयु 21 वर्ष थी। 61वें संविधान (संशोधन) अधिनियम, 1988 द्वारा इसे घटाकर 18 वर्ष कर दिया गया।

भारत में मतदान के अधिकार की वर्तमान स्थिति:

  • एन. पी. पोनुस्वामी बनाम निर्वाचन अधिकारी (1952) मामले में उच्चतम न्यायालय की संविधान पीठ ने निर्णय दिया कि मतदान का अधिकार एक वैधानिक (Statutory) अधिकार है।
  • कुलदीप नायर बनाम भारत संघ (2006) मामले में उच्चतम न्यायालय ने कहा कि ‘निर्वाचित करने का अधिकार’ जन प्रतिनिधित्व अधिनियम, 1951 की धारा 62 के अंतर्गत एक वैधानिक अधिकार है, न कि मौलिक अथवा संवैधानिक अधिकार।
  • ज्योति बसु मामला (1982) में न्यायालय ने पुनः स्पष्ट किया कि मतदान का अधिकार न तो मौलिक अधिकार है, न ही सामान्य विधि (Common Law) का अधिकार, बल्कि एक वैधानिक अधिकार है।

मतदान अधिकार का क्रमिक संवैधानिकीकरण

उच्चतम न्यायालय ने विभिन्न निर्णयों के माध्यम से मतदान के विभिन्न पक्षों को क्रमशः संवैधानिक संरक्षण प्रदान किया है।

  • जानने का अधिकार (2002): भारत संघ बनाम एसोसिएशन फॉर डेमोक्रेटिक रिफॉर्म्स मामले में न्यायालय ने माना कि मतदाताओं को अनुच्छेद 19(1)(क) के अंतर्गत प्रत्याशियों की आपराधिक पृष्ठभूमि, शैक्षिक योग्यता तथा वित्तीय परिसंपत्तियों की जानकारी प्राप्त करने का मौलिक अधिकार है।
  • न्यायालय ने कहा कि सूचित मतदाता लोकतंत्र में सार्थक भागीदारी के लिए आवश्यक है।
  • सूचित निर्णय लेने की स्वतंत्रता (2003): पीपुल्स यूनियन फॉर सिविल लिबर्टीज बनाम भारत संघ मामले में न्यायालय ने निम्नलिखित अंतर स्पष्ट किया— मतदान का अधिकार, जो अब भी वैधानिक अधिकार है। मतदान की स्वतंत्रता, जिसमें सूचित निर्णय लेने का अधिकार शामिल है और जिसे अनुच्छेद 19(1)(क) के अंतर्गत संरक्षण प्राप्त है।

मतदान को संवैधानिक संरक्षण क्यों मिलना चाहिए?

  • मूल ढाँचा सिद्धांत : केशवानंद भारती बनाम केरल राज्य मामले में उच्चतम न्यायालय ने निर्णय दिया कि लोकतंत्र संविधान की मूल संरचना का हिस्सा है।
  • चूँकि नागरिकों की चुनावों में भागीदारी के बिना लोकतंत्र कार्य नहीं कर सकता, इसलिए मतदान जनसत्ता (Popular Sovereignty) के व्यावहारिक प्रयोग का माध्यम है।
  • अनुच्छेद 326 संवैधानिक मान्यता प्रदान करता है: संविधान अनुच्छेद 326 के माध्यम से सार्वभौमिक वयस्क मताधिकार की गारंटी देता है, जबकि संसद केवल निर्वाचन संबंधी प्रक्रियात्मक पहलुओं को निर्वाचन कानूनों के माध्यम से विनियमित करती है।
  • अतः चुनावों में भाग लेने का नागरिक का अधिकार साधारण कानून से नहीं, बल्कि संविधान से उत्पन्न होता है।

मतदान को मौलिक अधिकार के रूप में मान्यता देने संबंधी चिंताएँ

  • विधायी लचीलेपन में कमी: संसद की योग्यता, अयोग्यता तथा निर्वाचन प्रक्रियाओं से संबंधित प्रावधान बनाने की क्षमता पर अधिक संवैधानिक प्रतिबंध तथा न्यायिक समीक्षा का प्रभाव पड़ेगा।
  • न्यायिक हस्तक्षेप में वृद्धि: मतदाता पंजीकरण, मतदाता सूची तथा मतदान प्रक्रिया जैसे नियमित निर्वाचन संबंधी विषय भी संवैधानिक मुकदमों का विषय बन सकते हैं।
  • पर्याप्त संवैधानिक संरक्षण पहले से उपलब्ध: अनुच्छेद 326 के अंतर्गत सार्वभौमिक वयस्क मताधिकार तथा लोकतंत्र एवं स्वतंत्र एवं निष्पक्ष चुनावों की रक्षा करने वाला मूल संरचना सिद्धांत, मतदान के अधिकार को पहले से पर्याप्त संवैधानिक संरक्षण प्रदान करता है।

निष्कर्ष

  • उच्चतम न्यायालय ने मतदाताओं के जानने के अधिकार, स्वतंत्र चुनावी विकल्प चुनने की स्वतंत्रता, मतपत्र की गोपनीयता तथा नोटा (NOTA) के माध्यम से प्रत्याशियों को अस्वीकार करने के अधिकार को संरक्षण देकर निर्वाचन प्रक्रिया का क्रमिक संवैधानिकीकरण किया है।
  • चूँकि लोकतंत्र तथा स्वतंत्र एवं निष्पक्ष चुनाव संविधान की मूल संरचना का हिस्सा हैं, इसलिए प्रत्येक पात्र नागरिक के मतदान के मूल अधिकार को स्पष्ट संवैधानिक संरक्षण प्रदान करने का एक सशक्त संवैधानिक आधार मौजूद है, जबकि चुनावों के प्रक्रियात्मक पहलुओं के विनियमन का अधिकार संसद के पास बना रह सकता है।

स्रोत: TH

 

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