एल नीनो भारत की विद्युत योजना को नया स्वरूप दे सकता है

पाठ्यक्रम: जीएस-1/जलवायु विज्ञान; जीएस-3/पर्यावरण/ऊर्जा

सन्दर्भ

  • सेंटर फॉर रिसर्च ऑन एनर्जी एंड क्लीन एयर (CREA) के अनुसार, विकसित हो रही एल नीनो परिस्थितियों के कारण भारत की विद्युत प्रणाली पर विश्व के किसी भी अन्य देश की तुलना में अधिक दबाव पड़ने की संभावना है।

प्रमुख बिंदु

  • एल नीनो की परिस्थितियाँ: भारत मौसम विज्ञान विभाग (IMD) ने पुष्टि की है कि भूमध्यरेखीय प्रशांत महासागर में एल नीनो की परिस्थितियाँ विकसित हो चुकी हैं और इनके मानसून के दौरान और अधिक सशक्त होने की संभावना है।
  • IMD ने दीर्घकालिक औसत (Long Period Average-LPA) के 90% के बराबर सामान्य से कम दक्षिण-पश्चिम मानसून वर्षा का पूर्वानुमान व्यक्त किया है तथा 60% संभावना जताई है कि मानसून का मौसम वर्षा की दृष्टि से अल्पवर्षी (Deficient) रहेगा।
  • विद्युत उत्पादन अंतर में वृद्धि: CREA का अनुमान है कि पवन एवं जलविद्युत उत्पादन में कमी तथा वातानुकूलन की बढ़ती मांग के संयुक्त प्रभाव से जून 2027 तक एक वर्ष की अवधि में लगभग 18 टेरावाट-घंटे (TWh) का विद्युत उत्पादन अंतर उत्पन्न हो सकता है।
  • कोयला आधारित ताप विद्युत संयंत्र: इस उत्पादन अंतर की पूर्ति की सबसे अधिक संभावना कोयला आधारित ताप विद्युत संयंत्रों द्वारा की जाएगी, जिससे अनुमानतः 1.7 करोड़ टन (17 मिलियन टन) अतिरिक्त कार्बन डाइऑक्साइड का उत्सर्जन होगा।
  • सौर ऊर्जा स्थिर रहेगी: जलविद्युत और पवन ऊर्जा के विपरीत, एल नीनो की परिस्थितियों में सौर ऊर्जा उत्पादन के अधिकांशतः स्थिर रहने की संभावना है, जिससे भारत के ऊर्जा संक्रमण में इसकी बढ़ती भूमिका और अधिक सुदृढ़ होगी।
  • मौसम जनित संवेदनशीलता: अध्ययन के निष्कर्ष बताते हैं कि भारत की विद्युत प्रणाली अब केवल नवीकरणीय ऊर्जा उत्पादन में उतार-चढ़ाव के कारण ही नहीं, बल्कि मौसम-जनित ऊर्जा मांग के झटकों (Weather-driven Demand Shocks) के प्रति भी लगातार अधिक संवेदनशील होती जा रही है।

एलनीनो (El Nino)

  • एल नीनो का स्पेनिश भाषा में अर्थ “छोटा बालक” (Little Boy) होता है। यह एक जलवायु परिघटना है, जिसकी विशेषता मध्य एवं पूर्वी भूमध्यरेखीय प्रशांत महासागर में समुद्र की सतही तापमान का समय-समय पर बढ़ जाना है।
  • एल नीनो के दौरान व्यापारिक पवनें कमजोर पड़ जाती हैं।
  • इसके परिणामस्वरूप गर्म जल पूर्व की ओर, अर्थात् अमेरिका के पश्चिमी तट की ओर लौटने लगता है, जबकि ठंडा जल एशिया की ओर धकेला जाता है। 
  • मौसम प्रतिरूपों पर एल नीनो का प्रभाव: इसके कारण वैश्विक तापमान में वृद्धि होती है, मानसून कमजोर पड़ता है, जंगलों में आग लगने का जोखिम बढ़ जाता है तथा विशेष रूप से प्रशांत महासागर और अटलांटिक महासागर में हरिकेन, चक्रवात तथा अन्य चरम मौसमीय घटनाओं की संभावना बढ़ जाती

भारत की विद्युत उत्पादन क्षमता

  • वर्ष 2025 में कुल विद्युत उत्पादन में 1% की वृद्धि हुई, जबकि कोयला आधारित विद्युत उत्पादन में 4% की कमी आई और नवीकरणीय ऊर्जा से विद्युत उत्पादन में 22% की वृद्धि दर्ज की गई।
  • मार्च 2026 तक गैर-जीवाश्म ईंधन आधारित स्थापित विद्युत क्षमता 283.46 गीगावाट (GW) तक पहुँच गई, जिसमें 150.26 GW सौर ऊर्जा, 56.09 GW पवन ऊर्जा, 51.41 GW बड़ी जलविद्युत तथा 8.78 गीगावाट परमाणु ऊर्जा शामिल हैं।
    • वर्ष 2025-26 के दौरान 44.6 GW सौर ऊर्जा तथा 6 GW पवन ऊर्जा क्षमता जोड़ी गई।
    • इसके बावजूद, कोयला अभी भी विद्युत का सबसे बड़ा एकल स्रोत बना हुआ है, जो कुल स्थापित क्षमता का लगभग 42% है, यद्यपि वर्ष के दौरान कोयला आधारित विद्युत उत्पादन में 3.69% की कमी दर्ज की गई।
  • ग्रिड संचालकों ने पिछले वर्ष लगभग 2.1 टेरावाट-घंटे (TWh) सौर एवं पवन ऊर्जा उत्पादन को सीमित (Curtail) कर दिया, ताकि कोयला आधारित ताप विद्युत संयंत्रों का संचालन जारी रखा जा सके, क्योंकि विद्युत प्रणाली में पर्याप्त लचीलापन नहीं था।
  • यदि केवल 10 गीगावाट-घंटे (GWh) की बैटरी भंडारण क्षमता उपलब्ध होती, तो इस अतिरिक्त नवीकरणीय ऊर्जा को संग्रहीत कर शाम के अधिकतम मांग के समय उपयोग किया जा सकता था, जिससे कोयले पर निर्भरता कम होती।
  • भारत के लिए यह आवश्यक है कि वह बैटरी भंडारण तथा विद्युत ग्रिड उन्नयन की दिशा में कहीं अधिक तेज़ी से कार्य करे, ताकि स्वच्छ ऊर्जा भविष्य में बढ़ती विद्युत मांग को पूरा कर सके।

ऊर्जा भंडारण

  • ऊर्जा भंडारण से आशय उन प्रणालियों से है, जो नवीकरणीय स्रोतों से प्राप्त अतिरिक्त विद्युत को अधिक उत्पादन के समय संग्रहीत करती हैं तथा मांग बढ़ने और उत्पादन कम होने पर उसे पुनः विद्युत के रूप में उपलब्ध कराती हैं।
  • ऊर्जा भंडारण प्रणालियाँ सौर एवं पवन जैसे नवीकरणीय स्रोतों से प्राप्त विद्युत को, उपलब्ध होने पर, ऐसे रूपों में परिवर्तित करती हैं जिन्हें सुरक्षित रूप से संग्रहीत किया जा सके।
  • बाद में आवश्यकता पड़ने पर इन्हें पुनः विद्युत में परिवर्तित कर उपयोग किया जाता है।

ऊर्जा भंडारण के प्रकार

  • पम्प्ड हाइड्रो स्टोरेज (PHS): इसमें अतिरिक्त विद्युत का उपयोग करके पानी को निचले जलाशय से ऊपरी जलाशय तक पम्प किया जाता है। जब विद्युत की मांग बढ़ती है, तब इस संग्रहित जल को टर्बाइनों से नीचे प्रवाहित कर विद्युत उत्पन्न की जाती है।
  • बैटरी ऊर्जा भंडारण प्रणाली (BESS): यह तकनीक विद्युत को रासायनिक रूप में संग्रहीत करती है और आवश्यकता पड़ने पर पुनः विद्युत के रूप में उपलब्ध कराती है।
  • वर्तमान में लिथियम-आयन बैटरियाँ, विशेषकर लिथियम आयरन फॉस्फेट (LFP) बैटरियाँ, कम लागत, उच्च दक्षता तथा लंबी परिचालन आयु के कारण ग्रिड-स्तरीय ऊर्जा भंडारण की प्रमुख तकनीक हैं।
  • सांद्रित सौर-तापीय भंडारण प्रणाली (Concentrating Solar-Thermal Storage System): इस तकनीक में दर्पणों द्वारा सूर्य के प्रकाश को एक रिसीवर पर केंद्रित किया जाता है।
  • रिसीवर के गर्म होने पर पिघले हुए लवण (Molten Salt) जैसे पदार्थों को उसके भीतर प्रवाहित कर ऊष्मा का भंडारण किया जाता है।
  • संपीडित वायु ऊर्जा भंडारण प्रणाली (Compressed-Air Energy Storage): इसमें अतिरिक्त विद्युत का उपयोग करके वायु को संपीडित कर भूमिगत गुफाओं या टैंकों में संग्रहित किया जाता है।
  • फ्लाईव्हील ऊर्जा भंडारण प्रणाली (Flywheel Energy Storage): इसमें रोटर को अत्यधिक तीव्र गति से घुमाकर विद्युत को घूर्णन ऊर्जा के रूप में संग्रहित किया जाता है।
  • गुरुत्वीय ऊर्जा भंडारण प्रणाली (Gravity Energy Storage): इसमें विद्युत का उपयोग कर भारी भारों को ऊँचाई तक उठाया जाता है। आवश्यकता पड़ने पर इन भारों को नीचे उतारकर गुरुत्वीय ऊर्जा को जनरेटरों की सहायता से पुनः विद्युत में परिवर्तित किया जाता है।

भारत की ऊर्जा भंडारण क्षमता

  • वर्तमान में सरकार मुख्य रूप से दो प्रमुख प्रणालियों—पम्प्ड हाइड्रो स्टोरेज (PHS) तथा बैटरी ऊर्जा भंडारण प्रणाली (BESS)—पर ध्यान केंद्रित कर रही है।
  • वर्तमान में भारत की स्थापित BESS क्षमता लगभग 0.27 गीगावाट (GW) है।
  • PHS क्षमता लगभग 7.2 GW है। हालांकि, अगले दशक में इसे बड़े पैमाने पर बढ़ाने की योजना है।
  • केंद्रीय विद्युत प्राधिकरण (CEA) की योजना के अनुसार, 2035-36 तक भारत की कुल ऊर्जा भंडारण क्षमता 174 गीगावाट (GW)/888 गीगावाट-घंटे (GWh) तक पहुँचने का अनुमान है।
  • इसमें 80 गीगावाट (GW)/321 गीगावाट-घंटे(GWh) की बैटरी ऊर्जा भंडारण प्रणाली क्षमता तथा 94 गीगावाट /567 GWh की पम्प्ड हाइड्रो स्टोरेज क्षमता शामिल होगी।

आगे की राह

  • 2026-27 का एल नीनो केवल एक सामान्य मौसमीय घटना न मानकर भारत की विद्युत प्रणाली की क्षमता और तैयारी की एक महत्वपूर्ण परीक्षा के रूप में देखा जाना चाहिए।
  • एल नीनो अवधि की तुलना पूर्ववर्ती ला नीना (La Niña) चरण से करने वाले मॉडल से संकेत मिलता है कि जलवायु परिवर्तनशीलता भविष्य में विद्युत मांग, नवीकरणीय ऊर्जा उत्पादन तथा जीवाश्म ईंधनों के उपयोग को और अधिक प्रभावित करेगी।
  • अध्ययन से स्पष्ट होता है कि भारत को अधिक सुदृढ़ एवं लचीली विद्युत प्रणाली विकसित करने के लिए नवीकरणीय ऊर्जा विस्तार के साथ-साथ बैटरी भंडारण, विद्युत संचरण (Transmission) अवसंरचना के उन्नयन तथा ग्रिड लचीलेपन (Grid Flexibility) को भी सर्वोच्च प्राथमिकता देनी होगी।

स्रोत: TH

 

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