भारत में सामान्य से कम वर्षा वाला मानसून: कारण, प्रभाव एवं तैयारी 

पाठ्यक्रम: GS1/भूगोल; GS3/पर्यावरण; कृषि

संदर्भ

  • हाल ही में भारत मौसम विज्ञान विभाग (IMD) ने सामान्य से कम वर्षा (लगभग 43% कम) का पूर्वानुमान व्यक्त किया है। वर्षा में यह कमी मानसून के विलंबित आगमन तथा एल नीनो परिस्थितियों के उभरने के कारण और अधिक गंभीर हो गई है।

भारतीय मानसून के बारे में

  • भारतीय मानसून पवनों की ऋतुजन्य दिशा-परिवर्तन की एक प्रमुख जलवायवीय घटना है।
  • इसका प्रमुख कारण स्थल एवं जल के असमान ऊष्मन एवं शीतलन, अंतर-उष्णकटिबंधीय अभिसरण क्षेत्र (ITCZ) की स्थिति में परिवर्तन तथा स्थानीय वायुमंडलीय एवं महासागरीय कारक हैं।
  • भारत में मानसून दो प्रकार का होता है—
    • दक्षिण-पश्चिम मानसून: यह भारत की कुल वार्षिक वर्षा का लगभग 75% प्रदान करता है।
    • उत्तर-पूर्व अथवा प्रत्यावर्ती (वापसी) मानसून: यह मुख्यतः भारत के दक्षिण-पूर्वी भाग, विशेषकर तमिलनाडु, में वर्षा करता है।

महत्व

  • मानसून देश की कृषि, जल संसाधनों की उपलब्धता तथा अर्थव्यवस्था के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है।
  • दीर्घकालिक औसत ( LPA) को भारत मौसम विज्ञान विभाग (IMD) द्वारा मानसून के प्रदर्शन के मूल्यांकन हेतु मानक मापदंड के रूप में उपयोग किया जाता है।
मानसून के प्रदर्शन का वर्गीकरण (IMD)
श्रेणीवर्षा (लंबे समय के औसत – LPA का %)
सामान्य मॉनसूनLPA का 96%–104% 
सामान्य से कम वर्षा वाला मानसून LPA के 90% से कम 
अल्प वर्षा वाला मानसून LPA के 90% से कम तथा व्यापक क्षेत्रीय वर्षा-अभाव के साथ 
अधिक वर्षा वाला मानसून LPA के 110% से अधिक 

सामान्य से कम वर्षा वाले मानसून के प्रमुख कारण

  • जून के प्रारंभ तक एल नीनो (El Niño) का सीमित प्रभाव: एल नीनो (El Niño) परिघटना का विकास विषुवतीय प्रशांत महासागर में हुआ।
    • भारत मौसम विज्ञान विभाग (IMD) के अनुसार, भारतीय मानसून पर एल नीनो का प्रभाव लगभग एक माह के अंतराल (Lag) के बाद दिखाई देता है।
    • एल नीनो वॉकर परिसंचरण की तीव्रता को कम कर देता है।
    • इसके परिणामस्वरूप भारतीय उपमहाद्वीप की ओर नमी का परिवहन तथा संवहन कमजोर हो जाता है।
    • तथापि, जून माह में हुई वर्षा की कमी का मुख्य कारण केवल एल नीनो नहीं था।
  • अनुकूल मैडेन-जूलियन दोलन (MJO) का अभाव: मैडेन-जूलियन दोलन (MJO) भूमध्यरेखा के साथ बादलों, वर्षा एवं पवनों की सक्रिय प्रणाली है।
    • जून के अधिकांश समय भारत के ऊपर MJO का अनुकूल चरण उपस्थित नहीं था।
    • इसके कारण संवहन तथा वर्षा की गतिविधियाँ कमजोर रहीं।
    • परिणामस्वरूप देश के अधिकांश भागों में मानसूनी गतिविधियाँ मंद रहीं।
  • सामान्य से कम वर्षा वाला मानसूनी परिसंचरण तंत्र: इसके प्रमुख कारण निम्नलिखित हैं—
    • हिंद महासागर से विषुवत् रेखा पार करने वाली पवनों का कमजोर होना।
    • अरब सागर एवं बंगाल की खाड़ी से आर्द्रता का अपर्याप्त परिवहन।
    • उत्तरी एवं पश्चिमी भारत में मानसून की धीमी प्रगति।
  • निम्न दाब क्षेत्रों का अभाव: भारत में मानसूनी वर्षा मुख्यतः निम्न दाब क्षेत्रों एवं बंगाल की खाड़ी में बनने वाले अवदाबों पर निर्भर करती है।
    • जून माह के दौरान ऐसे तंत्र या तो विकसित नहीं हुए अथवा अत्यंत कमजोर रहे, जिसके कारण वर्षा का वितरण असंतुलित रहा।
  • जलवायु परिवर्तनशीलता में वृद्धि: जलवायु परिवर्तन के कारण ऋतु-अंतराल जलवायु परिवर्तनशीलता बढ़ी है।
    • इसके परिणामस्वरूप सूखा, अत्यधिक वर्षा तथा विभिन्न क्षेत्रों में वर्षा का असमान वितरण अधिक देखने को मिलता है।
    • इसलिए, सामान्य कुल वर्षा वाले वर्षों में भी अनेक क्षेत्रों में स्थानीय स्तर पर वर्षा की कमी बनी रहती है।

भारत में सामान्य से कम वर्षा वाले मानसून के प्रभाव

  • कृषि पर प्रतिकूल प्रभाव: सिंचाई सुविधाओं के विस्तार के बावजूद भारत की कृषि आज भी मानसूनी वर्षा पर अत्यधिक निर्भर है।
    • अल्प वर्षा के कारण—
      • खरीफ फसलों की बुआई प्रभावित हो सकती है।
      • विशेषकर धान, दलहन एवं तिलहन की उत्पादकता में कमी आ सकती है।
      • सिंचाई पर बढ़ती निर्भरता के कारण किसानों की उत्पादन लागत बढ़ सकती है।
  • खाद्य सुरक्षा एवं मुद्रास्फीति पर प्रभाव: कृषि उत्पादन में कमी से खाद्यान्नों की कीमतों में वृद्धि हो सकती है।
    • इससे मुद्रास्फीति का दबाव बढ़ेगा।
    • विशेष रूप से कमजोर एवं संवेदनशील वर्गों की पोषण सुरक्षा प्रभावित हो सकती है।
  • जल संकट: कम वर्षा के कारण भूजल स्तर में गिरावट आती है।
    • जलाशयों में जलभराव कम होता है।
    • पेयजल की उपलब्धता प्रभावित होती है।
    • पूर्व के अनुभव बताते हैं कि सूखे के वर्षों में सूखा-प्रभावित क्षेत्रों तक जल पहुँचाने की आवश्यकता पड़ती है।
  • ग्रामीण अर्थव्यवस्था पर प्रभाव: कमजोर मानसून किसानों की आय को प्रभावित करता है।
    • ग्रामीण क्षेत्रों में मांग तथा कृषि आधारित रोजगार के अवसर घटते हैं।
    • इससे देश की समग्र आर्थिक वृद्धि भी प्रभावित हो सकती है।
  • जलविद्युत उत्पादन पर प्रभाव: जलाशयों में जल स्तर कम होने से जलविद्युत उत्पादन प्रभावित होता है।
    • साथ ही सिंचाई एवं शहरी जलापूर्ति के लिए उपलब्ध जल की मात्रा भी घट जाती है।
  • पर्यावरणीय प्रभाव: वर्षा की कमी से वनाग्नि की घटनाओं की संभावना बढ़ जाती है।
    • मृदा अपरदन एवं आर्द्रभूमियों तथा जलमार्गों पर दबाव बढ़ता है।

सामान्य से कम वर्षा वाले मानसून से निपटने के लिए भारत की तैयारी

  • भारत मौसम विज्ञान विभाग (IMD) द्वारा मौसम पूर्वानुमान: IMD विस्तारित अवधि तथा जिला-स्तरीय मौसम पूर्वानुमान जारी करता है।
    • समय पर जारी चेतावनियाँ सरकारों एवं किसानों को फसल चयन तथा सिंचाई प्रबंधन की अग्रिम योजना बनाने में सहायता प्रदान करती हैं।
  • जिलों की संवेदनशीलता का आकलन: लगभग 315 जिलों को अल्प वर्षा की संभावित स्थिति से प्रभावित होने वाला चिन्हित किया गया है।
    • 111 जिले (उच्च प्राथमिकता): जहाँ सिंचाई कवरेज 25% से कम है।
    • 76 जिले (मध्यम प्राथमिकता): जहाँ सिंचाई कवरेज 25% से 50% के बीच है।
    • 128 जिले (निम्न प्राथमिकता): जहाँ बाँधों एवं अन्य स्रोतों के माध्यम से अपेक्षाकृत बेहतर सिंचाई सुविधाएँ उपलब्ध हैं।
  • आकस्मिक फसल योजना : भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद (ICAR) प्रत्येक जिले के लिए आकस्मिक फसल योजनाएँ तैयार करती है।
    • इनमें सूखा-सहिष्णु फसल किस्मों, वैकल्पिक फसल प्रणालियों तथा अल्प अवधि वाली बीज किस्मों को अपनाने पर बल दिया जाता है।
    • केंद्र एवं राज्य सरकारें संवेदनशील कृषि क्षेत्रों के लिए क्षेत्र-विशिष्ट रणनीतियाँ तैयार कर रही हैं।
  • जल संरक्षण: महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी योजना (मनरेगा) के अंतर्गत कृषि तालाब, चेक डैम, वर्षा जल संचयन संरचनाओं एवं जलागम विकास कार्यों को प्राथमिकता दी जाती है।
    • ये पहल स्थानीय स्तर पर जल सुरक्षा को सुदृढ़ करती हैं।
  • सिंचाई अवसंरचना का विस्तार: प्रधानमंत्री कृषि सिंचाई योजना (PMKSY) के माध्यम से सूक्ष्म सिंचाई, ‘प्रति बूंद अधिक फसल’ पहल तथा कमांड क्षेत्र विकास को बढ़ावा देकर सिंचाई दक्षता में वृद्धि की जा रही है।
  • ऊर्जा स्रोतों का विविधीकरण: सौर ऊर्जा, पवन ऊर्जा तथा अन्य नवीकरणीय ऊर्जा स्रोतों के तीव्र विस्तार से सूखे के वर्षों में जलविद्युत पर निर्भरता कम हुई है।
  • फसल बीमा: प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना (PMFBY) मौसमजनित फसल क्षति के विरुद्ध किसानों को जोखिम सुरक्षा प्रदान करती है।

आगे की राह

  • सूखा-सहिष्णु बीजों एवं विविधीकृत कृषि प्रणाली के माध्यम से जलवायु-अनुकूल कृषि को बढ़ावा दिया जाए।
  • सूक्ष्म सिंचाई एवं जल संरक्षण उपायों का विस्तार कर वर्षा पर निर्भरता कम की जाए।
  • स्थानीय स्तर पर जलागम एवं भूजल प्रबंधन को सुदृढ़ किया जाए तथा नदी बेसिन एवं जलाशय प्रबंधन को बढ़ावा दिया जाए।
  • समयबद्ध निर्णय-निर्माण के लिए जलवायु पूर्वानुमान एवं सूचना प्रसार प्रणालियों को अधिक प्रभावी बनाया जाए।
  • ग्रामीण विकास नीतियों में जलवायु परिवर्तन अनुकूलन उपायों को समाहित किया जाए।
  • सामुदायिक भागीदारी आधारित जल संरक्षण एवं सतत कृषि पद्धतियों को प्रोत्साहित किया जाए।

निष्कर्ष

  • भारत का अनुभव यह दर्शाता है कि सामान्य से कम वर्षा वाला मानसून अब केवल एक मौसम विज्ञान संबंधी घटना नहीं रह गया है, बल्कि यह बहुआयामी विकासात्मक चुनौती का रूप ले चुका है। यद्यपि बेहतर मौसम पूर्वानुमान, जल संरक्षण उपायों तथा नवीकरणीय ऊर्जा के विस्तार ने देश की अनुकूलन क्षमता को सुदृढ़ किया है, फिर भी बढ़ती जलवायु परिवर्तनशीलता के परिप्रेक्ष्य में दीर्घकालिक तैयारी, सतत अनुकूलन तथा समन्वित नीति-निर्माण की आवश्यकता पहले से कहीं अधिक महत्वपूर्ण हो गई है।
दैनिक मुख्य परीक्षा अभ्यास प्रश्न
प्रश्न: भारत में अल्प वर्षा वाले मानसून के प्रमुख कारणों का परीक्षण कीजिए। इसके प्रभावों की चर्चा करते हुए कमजोर मानसूनी परिस्थितियों से निपटने के लिए भारत की तैयारियों का मूल्यांकन कीजिए। 

स्रोत: IE

 

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