वैश्विक बौद्धिक संपदा व्यवस्था: प्रवर्तन में सुसंगतता और समानता की आवश्यकता

पाठ्यक्रम: जीएस-3/अर्थव्यवस्था; विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी 

सन्दर्भ:

  • हाल ही में, संयुक्त राज्य व्यापार प्रतिनिधि (USTR) ने वियतनाम के विरुद्ध धारा 301 के अंतर्गत जाँच प्रारम्भ की, क्योंकि उसे विशेष 301 रिपोर्ट (2026) में बौद्धिक संपदा (IP) संरक्षण और प्रवर्तन से संबंधित कुछ मुद्दों के कारण ‘प्राथमिक विदेशी देश (Priority Foreign Country) के रूप में नामित किया गया था।

वैश्विक बौद्धिक संपदा व्यवस्था

  • वैश्विक बौद्धिक संपदा व्यवस्था में वे अंतर्राष्ट्रीय कानून, संस्थान और साधन शामिल हैं जो बौद्धिक संपदा अधिकारों (IPRs) के सृजन, संरक्षण और प्रवर्तन को विनियमित करते हैं।

प्रमुख घटक:

ट्रिप्स समझौता (WTO):

  • व्यापार-संबंधित बौद्धिक संपदा अधिकारों के पहलुओं पर समझौता (TRIPS) विश्व व्यापार संगठन (WTO) के सदस्य देशों के बीच बौद्धिक संपदा संरक्षण के लिए न्यूनतम मानक निर्धारित करता है।
  • इसमें पेटेंट, कॉपीराइट, ट्रेडमार्क, भौगोलिक संकेतक (Geographical Indications) तथा ट्रेड सीक्रेट्स (Trade Secrets) शामिल हैं।

विश्व बौद्धिक संपदा संगठन (WIPO):

  • यह संयुक्त राष्ट्र की एक विशिष्ट एजेंसी है, जो वैश्विक बौद्धिक संपदा संधियों का प्रशासन करती है। यह बौद्धिक संपदा मानकों और नवाचारों में सामंजस्य स्थापित करने में सहायता करती है।

एकपक्षीय व्यापारिक उपाय (Unilateral Trade Measures):

  • USTR की विशेष 301 रिपोर्ट जैसे उपकरण किसी देश की बौद्धिक संपदा व्यवस्था का मूल्यांकन करते हैं और इनके परिणामस्वरूप व्यापारिक जाँच तथा प्रतिबंध लगाए जा सकते हैं।
  • भारत सहित अनेक विकासशील देशों को लगातार प्राथमिक निगरानी सूची (Priority Watch List) अथवा प्राथमिक विदेशी देश (Priority Foreign Country) की श्रेणी में रखा जाता रहा है।
  • इस प्रकार का बार-बार वर्गीकरण देशों के बौद्धिक संपदा विनियमों के अनुपालन के मूल्यांकन हेतु अपनाए जाने वाले मानकों पर प्रश्नचिह्न खड़ा करता है।

बौद्धिक संपदा, आनुवंशिक संसाधनों तथा संबद्ध पारंपरिक ज्ञान पर WIPO संधि (2024)

  • पेटेंट के लिए आवेदन करने वाले व्यक्तियों को अपने आविष्कार संबंधी आवेदन में प्रयुक्त आनुवंशिक संसाधनों के स्रोत का विवरण देना होगा।
  • प्रकटीकरण में संबद्ध पारंपरिक ज्ञान को भी शामिल किया जाना चाहिए।
  • यह पेटेंट प्रणाली में पारदर्शिता को बढ़ाता है।
  • इसका उद्देश्य आनुवंशिक संसाधनों के दुरुपयोग अथवा अनुचित अधिग्रहण के कारण दिए जाने वाले गलत पेटेंटों को रोकना है।

USTR की धारा 301 (अमेरिकी व्यापार अधिनियम, 1974) 

  • यह USTR को किसी भी ऐसे विदेशी देश के विरुद्ध जाँच करने और उपाय अपनाने का अधिकार प्रदान करती है, जो अमेरिकी व्यापार नीतियों के प्रति भेदभावपूर्ण व्यवहार करता हो।
  • विशेष 301 रिपोर्ट प्रतिवर्ष जारी की जाती है और उन देशों की सूची प्रस्तुत करती है जिनका बौद्धिक संपदा अधिकारों का संरक्षण अमेरिकी मानकों के अनुरूप नहीं माना जाता। देशों को निम्नलिखित श्रेणियों में रखा जा सकता है:
  • प्राथमिक विदेशी देश (Priority Foreign Country PFC):
  • यह सबसे गंभीर श्रेणी है, जिसके परिणामस्वरूप जाँच और प्रतिबंध लगाए जा सकते हैं।
  • प्राथमिक निगरानी सूची (Priority Watch List – PWL):
  • इसमें वे देश शामिल होते हैं जिनके बौद्धिक संपदा अधिकारों के संरक्षण संबंधी मुद्दों के समाधान हेतु निकट निगरानी की आवश्यकता होती है।
  • निगरानी सूची (Watch List):
  • इसमें अपेक्षाकृत कम चिंताओं वाले देश शामिल होते हैं।

बौद्धिक संपदा (IP) प्रवर्तन में एकरूपता की आवश्यकता

  • चयनात्मक जाँच (Selective Scrutiny): भारत, वियतनाम और इंडोनेशिया सहित अनेक विकासशील देशों को कठोर जाँच और निगरानी का सामना करना पड़ता है।
  • हालांकि, पारंपरिक ज्ञान (Traditional Knowledge-TK) तथा आनुवंशिक संसाधनों के दुरुपयोग जैसे मुद्दों पर विकसित अर्थव्यवस्थाओं के विरुद्ध सामान्यतः ऐसी जाँच नहीं की जाती।
  • बदलते मानकों में संतुलन की आवश्यकता: हाल ही में अपनाई गई बौद्धिक संपदा, आनुवंशिक संसाधनों तथा संबद्ध पारंपरिक ज्ञान पर WIPO संधि (2024) पेटेंट प्रदान करने की प्रक्रिया में पारदर्शिता की आवश्यकता को मान्यता देती है।
  • समानता का सिद्धांत (Equity Principle): वैश्विक बौद्धिक संपदा व्यवस्था की विश्वसनीयता के लिए आवश्यक है कि मानक सभी देशों पर समान रूप से लागू हों; सभी देशों की जवाबदेही समान हो; तथा निजी और सामुदायिक दोनों प्रकार की ज्ञान प्रणालियों को मान्यता दी जाए।

वैश्विक बौद्धिक संपदा व्यवस्था से संबंधित मुद्दे एवं चिंताएँ

  • विकसित और विकासशील देशों के मध्य असमानता: विकसित देशों के पास बेहतर तकनीकी क्षमताएँ होती हैं और पेटेंट स्वामित्व पर उनका प्रभुत्व रहता है।
  • परिणामस्वरूप, विकासशील देश प्रायः प्रौद्योगिकी के शुद्ध आयातक (Net Technology Importers) बन जाते हैं और उन्हें भारी रॉयल्टी का भुगतान करना पड़ता है।
  • बायोपाइरेसी (Biopiracy) और दुरुपयोग: जैव-विविधता से समृद्ध देशों के पारंपरिक ज्ञान तथा जैविक संसाधनों का उचित सहमति और लाभ-साझेदारी के बिना व्यावसायीकरण कर लिया जाता है। इसके उदाहरणों में नीम पेटेंट विवाद, हल्दी के घाव-उपचार विधि के पेटेंट का प्रकरण तथा बासमती चावल पेटेंट विवाद शामिल हैं।
  • TRIPS-प्लस दायित्व (TRIPS-Plus Obligations): द्विपक्षीय और क्षेत्रीय व्यापार समझौतों में अक्सर ऐसे बौद्धिक संपदा प्रावधान शामिल होते हैं जो ट्रिप्स समझौते की आवश्यकताओं से आगे बढ़ जाते हैं। इससे सार्वजनिक स्वास्थ्य और कृषि जैसे क्षेत्रों में देशों की नीतिगत स्वतंत्रता (Policy Space) सीमित हो सकती है।
  • विकास पर प्रभाव: अत्यधिक बौद्धिक संपदा संरक्षण से दवाइयों, बीजों और प्रौद्योगिकी की लागत बढ़ सकती है। इसका निम्न एवं मध्यम आय वाले देशों की विकासात्मक प्राथमिकताओं पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ सकता है।
  • सामुदायिक ज्ञान का अपर्याप्त संरक्षण: पारंपरिक रूप से पेटेंट व्यवस्था केवल व्यक्तिगत आविष्कारों की सुरक्षा पर केंद्रित रही है। इसके कारण सामुदायिक एवं पारंपरिक ज्ञान प्रणालियों को पर्याप्त संरक्षण नहीं मिल पाया है।

भारत-विशिष्ट चिंताएँ एवं मुद्दे

  • बायोपाइरेसी (Biopiracy): भारत लगातार ऐसे उदाहरण उठाता रहा है, जहाँ पारंपरिक ज्ञान और जैविक संसाधनों का पूर्व सूचित सहमति (Prior Informed Consent), स्रोत की स्वीकृति तथा लाभ-साझेदारी के बिना व्यावसायिक शोषण किया गया।
  • पारंपरिक ज्ञान का संरक्षण: भारत का मत है कि स्वदेशी समुदाय मूल्यवान ज्ञान प्रणालियों के संरक्षक हैं, किन्तु वर्तमान बौद्धिक संपदा व्यवस्था उनके सामूहिक स्वामित्व को पर्याप्त मान्यता नहीं देती।
  • लचीलापन (Flexibility): भारत ने सार्वजनिक स्वास्थ्य, खाद्य सुरक्षा तथा सुलभ प्रौद्योगिकी से संबंधित ट्रिप्स लचीलेपन (TRIPS Flexibilities) को बनाए रखने का समर्थन किया है।

बौद्धिक संपदा (IP) प्रवर्तन के प्रति भारत का दृष्टिकोण

राष्ट्रीय बौद्धिक संपदा अधिकार (IPR) नीति, 2016:

  • उद्योग और आंतरिक व्यापार संवर्धन विभाग (DPIIT) के अनुसार, यह नीति सृजनात्मकता और नवाचार को प्रोत्साहित करने; उद्यमिता को बढ़ावा देने; बौद्धिक संपदा अधिकारों के प्रति जागरूकता बढ़ाने; प्रभावी बौद्धिक संपदा प्रशासन एवं प्रवर्तन विकसित करने; तथा बौद्धिक संपदा परिसंपत्तियों के व्यावसायीकरण को बढ़ावा देने के लिए तैयार की गई है।
  • नीति के सात स्तंभ: जागरूकता, बौद्धिक संपदा अधिकारों का सृजन, विधिक एवं विधायी ढाँचा, प्रशासन एवं प्रबंधन, व्यावसायीकरण, प्रवर्तन एवं न्यायनिर्णयन तथा मानव संसाधन विकास।
  • पारंपरिक ज्ञान डिजिटल पुस्तकालय (TKDL): इसे पारंपरिक औषधीय ज्ञान के प्रलेखन हेतु स्थापित किया गया है। इससे विभिन्न देशों के पेटेंट परीक्षकों को पूर्व विद्यमान ज्ञान (Prior Art) की पहचान करने और अनुचित पेटेंट प्रदान किए जाने से रोकने में सहायता मिलती है।
  • प्रवर्तन में सुधार:बौद्धिक संपदा कार्यालयों का आधुनिकीकरण; डिजिटल परीक्षण एवं त्वरित परीक्षण प्रक्रियाएँ; तथा न्यायालयों में विशेष बौद्धिक संपदा प्रभागों की स्थापना।
  • विधायी संतुलन:भारत नवाचार को प्रोत्साहन देने और जनकल्याण के बीच संतुलन बनाए रखने का प्रयास कर रहा है।

आगे की राह: संतुलित बौद्धिक संपदा व्यवस्था की ओर

  • विकसित एवं विकासशील देशों में बौद्धिक संपदा मानकों का समान रूप से अनुप्रयोग।
  • WIPO संधि (2024) का प्रभावी कार्यान्वयन।
  • बायोपाइरेसी (Biopiracy) और अनुचित अधिग्रहण (Misappropriation) के विरुद्ध प्रभावी तंत्र का निर्माण।
  • स्वदेशी समुदायों के साथ न्यायसंगत लाभ-साझेदारी सुनिश्चित करना।
  • सार्वजनिक स्वास्थ्य और विकास से संबंधित मामलों में ट्रिप्स लचीलेपन (TRIPS Flexibilities) को बनाए रखना।
  • नवाचार नीति के माध्यम से जैव-विविधता का संरक्षण।
  • सामुदायिक-आधारित ज्ञान प्रणालियों के साथ-साथ निजी बौद्धिक संपदा को भी मान्यता प्रदान करना।
दैनिक मुख्य परीक्षा अभ्यास प्रश्न
[प्रश्न] वैश्विक बौद्धिक संपदा प्रवर्तन में सुसंगतता और समानता की आवश्यकता का परीक्षण कीजिए। बायोपाइरेसी तथा पारंपरिक ज्ञान के संबंध में भारत की चिंताओं की चर्चा कीजिए।

स्रोत: BL

 

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