पाठ्यक्रम: जीएस-3/पर्यावरण
सन्दर्भ
- केंद्र सरकार पश्चिमी घाट क्षेत्र में पारिस्थितिकीय रूप से संवेदनशील क्षेत्रों (ESA) के सीमांकन को अंतिम रूप देकर अधिसूचित करने के लिए तैयार है, जिससे गुजरात, गोवा और महाराष्ट्र में इन क्षेत्रों को शीघ्र ही अधिक सशक्त कानूनी संरक्षण प्राप्त हो सकता है।
पश्चिमी घाट पारिस्थितिकीय रूप से संवेदनशील क्षेत्र (ESA) परिचय
- पश्चिमी घाट भारत के पश्चिमी तट के साथ लगभग 1,500 किमी तक फैला हुआ है और यह गुजरात, महाराष्ट्र, गोवा, कर्नाटक, केरल तथा तमिलनाडु सहित छह राज्यों में विस्तृत है।
- यह लगभग 1,64,280 वर्ग किमी क्षेत्र में फैला हुआ है तथा विश्व के आठ सर्वाधिक जैव-विविधता वाले ‘हॉटस्पॉट्स’ में से एक है।
- भारतीय मानसून के नियमन, जलवायु संतुलन, मृदा संरक्षण तथा लाखों लोगों की जल सुरक्षा सुनिश्चित करने में इसका अत्यंत महत्वपूर्ण योगदान है।
- इसकी विशिष्ट जैव-विविधता और स्थानिकता (Endemism) के कारण इस क्षेत्र को यूनेस्को विश्व धरोहर स्थल के रूप में मान्यता प्राप्त है।
पारिस्थितिकीय रूप से संवेदनशील क्षेत्र (ESA)
- ESA से तात्पर्य उस क्षेत्र से है जिसे पर्यावरण (संरक्षण) अधिनियम, 1986 के अंतर्गत पारिस्थितिकीय रूप से संवेदनशील पारितंत्रों के संरक्षण हेतु अधिसूचित किया जाता है।
- ऐसे क्षेत्रों को पर्यावरण, वन एवं जलवायु परिवर्तन मंत्रालय (MoEFCC) द्वारा उनकी जैव-विविधता, पर्यावरणीय संवेदनशीलता, पारिस्थितिकीय महत्त्व तथा विकासात्मक गतिविधियों के विनियमन की आवश्यकता को ध्यान में रखते हुए अधिसूचित किया जाता है।
- पर्यावरण पर प्रतिकूल प्रभाव डालने वाली गतिविधियाँ, जैसे खनन, उत्खनन, प्रदूषण-गहन उद्योग तथा निर्माण गतिविधियाँ, इन क्षेत्रों में या तो प्रतिबंधित होती हैं अथवा कड़े नियमन के अधीन रखी जाती हैं।
- इसका उद्देश्य पारिस्थितिकी तंत्र सेवाओं और स्थानीय आजीविकाओं की सुरक्षा करते हुए पर्यावरण संरक्षण एवं सतत विकास के बीच संतुलन स्थापित करना है।

भारत के अन्य पारिस्थितिकीय रूप से संवेदनशील क्षेत्र (ESAs)
- कुम्भलगढ़ वन्यजीव अभयारण्य, राजस्थान (अरावली पर्वतमाला)
- काजीरंगा–कार्बी आंगलोंग परिदृश्य, असम
- गिर राष्ट्रीय उद्यान, गुजरात
- रणथंभौर बाघ अभयारण्य, राजस्थान
- सुंदरबन, पश्चिम बंगाल
- ग्रेट इंडियन बस्टर्ड (गोडावण) के आवास क्षेत्र, राजस्थान एवं गुजरात
- भागीरथी पारिस्थितिकी-संवेदनशील क्षेत्र, उत्तराखंड
- चिल्का झील, ओडिशा तथा दीपोर बील, असम
पश्चिमी घाट का पारिस्थितिकीय महत्त्व
- जैव-विविधता हॉटस्पॉट:यह क्षेत्र भारत की लगभग 30% वनस्पति एवं जीव-जंतुओं का आवास है तथा यहाँ स्थानिकता (Endemism) का स्तर अत्यधिक है।
- पश्चिमी घाट में सिंह-पूँछ मकाक (Lion-tailed Macaque), नीलगिरि तहर (Nilgiri Tahr), मालाबार सिवेट (Malabar Civet) तथा ग्रेट इंडियन हॉर्नबिल (Great Indian Hornbill) जैसी अनेक संकटग्रस्त प्रजातियाँ पाई जाती हैं।
- जल सुरक्षा एवं जलवायु नियमन: पश्चिमी घाट जल-विभाजक तथा पवन अवरोधक के रूप में कार्य करता है, जिससे प्रायद्वीपीय भारत के वर्षा प्रतिरूप प्रभावित होते हैं।
- गोदावरी, कृष्णा, कावेरी, तुंगभद्रा और पेरियार जैसी प्रमुख नदियाँ पश्चिमी घाट से उद्गमित होती हैं।
- यहाँ के सघन वन भूजल पुनर्भरण, कार्बन सिंक तथा आपदा प्रबंधन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।
- सामाजिक-आर्थिक महत्त्व: पश्चिमी घाट, हिमालय के विपरीत, कृषि एवं बागान आधारित अर्थव्यवस्था के माध्यम से लाखों लोगों की आजीविका का आधार है।
- यह क्षेत्र काली मिर्च, इलायची, कॉफी, चाय, दालचीनी, रबर तथा अन्य मसालों जैसी निर्यातोन्मुखी फसलों के लिए प्रसिद्ध है।
- यह पारितंत्र पर्यटन, जलविद्युत उत्पादन तथा स्थानीय आजीविकाओं को भी समर्थन प्रदान करता है।
ESA सीमांकन का विकास: गाडगिल बनाम कस्तूरीरंगन
- गाडगिल समिति (पश्चिमी घाट पारिस्थितिकी विशेषज्ञ पैनल, 2011): इस समिति ने पश्चिमी घाट क्षेत्र का विस्तार 1,29,037 वर्ग किमी निर्धारित किया तथा संपूर्ण पश्चिमी घाट को पारिस्थितिकीय रूप से संवेदनशील क्षेत्र (ESA) घोषित करने का प्रस्ताव रखा।
- इसने खनन, प्रदूषणकारी उद्योगों एवं विशाल अवसंरचनात्मक परियोजनाओं पर कठोर मानकों सहित क्रमिक विनियमन व्यवस्था का सुझाव दिया।
- समिति ने स्थानीय निकायों की भागीदारी पर आधारित बॉटम अप दृष्टिकोण को प्रोत्साहित किया।
- कस्तूरीरंगन समिति (उच्चस्तरीय कार्य समूह, 2013): इस समिति ने अपेक्षाकृत अधिक संतुलित दृष्टिकोण अपनाया।
- इसने पश्चिमी घाट के कुल परिदृश्य को 1,64,280 वर्ग किमी माना तथा लगभग 60,000 वर्ग किमी क्षेत्र को ESA घोषित करने की अनुशंसा की।
- समिति ने क्षेत्र को सांस्कृतिक परिदृश्य (60%) और प्राकृतिक परिदृश्य (40%) में विभाजित किया।
- इसने खनन एवं उत्खनन पर प्रतिबंध, लाल श्रेणी (Red Category) के प्रदूषणकारी उद्योगों पर रोक, तापीय विद्युत संयंत्रों पर प्रतिबंध तथा बड़े पैमाने के निर्माण एवं टाउनशिप परियोजनाओं के विनियमन का सुझाव दिया।

ESA अधिसूचना में विलंब क्यों हुआ?
- राज्य सरकारों का विरोध:राज्य सरकारों का मानना है कि ESA अधिसूचना औद्योगीकरण एवं अवसंरचना विकास में बाधा उत्पन्न कर सकती है, बागान कृषि और आजीविकाओं को प्रभावित कर सकती है तथा खनन एवं उत्खनन गतिविधियों से होने वाले राजस्व को सीमित कर सकती है।
- सीमाओं को लेकर विवाद:केंद्र सरकार की प्रारूप अधिसूचना में 56,825 वर्ग किमी क्षेत्र को ESA के रूप में प्रस्तावित किया गया था।
- राज्य सरकारें जमीनी सर्वेक्षणों के निष्कर्षों के आधार पर कुछ क्षेत्रों को ESA से बाहर रखने की मांग कर रही थीं।
- केरल, कर्नाटक और महाराष्ट्र ESA क्षेत्रफल में बड़े पैमाने पर कमी की मांग कर रहे हैं।
- आँकड़ों के समन्वयन में चुनौतियाँ: उपग्रह चित्रों, ग्राम-वार आँकड़ों, राजस्व अभिलेखों तथा भूमि उपयोग संबंधी विवरणों में अंतर होने के कारण सर्वसम्मति बनाना कठिन रहा है।
हाल के विकास
- विशेषज्ञ समिति (2022):पर्यावरण, वन एवं जलवायु परिवर्तन मंत्रालय (MoEF&CC) ने राज्यों द्वारा उठाई गई आपत्तियों के पुनर्मूल्यांकन के लिए पूर्व वन महानिदेशक की अध्यक्षता में एक विशेषज्ञ समिति का गठन किया।
- समिति के प्रमुख कार्यों में ग्राम-वार आँकड़ों का समन्वयन, क्षेत्रीय सत्यापन तथा राज्यों को वित्तीय प्रोत्साहन प्रदान करने संबंधी प्रस्तावों की समीक्षा शामिल है।
- प्रारूप अधिसूचना (जुलाई 2024):इस अधिसूचना में एक महत्वपूर्ण प्रावधान जोड़ा गया है: ESA की सीमाओं को अब राज्य-वार अथवा संयुक्त अधिसूचना के माध्यम से अंतिम रूप दिया जा सकता है।
- इसका उद्देश्य उन राज्यों में अनावश्यक विलंब से बचना है, जहाँ सहमति बन चुकी है।
पश्चिमी घाट का संरक्षण क्यों आवश्यक है?
- बढ़ते पारिस्थितिकीय खतरे: पश्चिमी घाट वनों की कटाई, उत्खनन एवं खनन, अवसंरचना विस्तार, अनियंत्रित पर्यटन तथा जलवायु परिवर्तन से प्रेरित अत्यधिक वर्षा जैसी चुनौतियों का सामना कर रहा है।
- केरल और कर्नाटक में हाल के भूस्खलनों ने इस पारितंत्र की संवेदनशीलता को उजागर किया है।
- पारितंत्र सेवाएँ: पश्चिमी घाट जल उपलब्धता, बाढ़ नियंत्रण, कार्बन अवशोषण, परागण तथा मृदा संरक्षण जैसी महत्वपूर्ण पारितंत्र सेवाएँ प्रदान करता है।
- इन सेवाओं का लाभ केवल छह राज्यों तक सीमित नहीं है, बल्कि पूरा देश इससे लाभान्वित होता है।
- सतत विकास की अनिवार्यता: इस क्षेत्र के संरक्षण का अर्थ लोगों को विकास प्रक्रिया से बाहर करना नहीं है।
- इसके विपरीत, इसका उद्देश्य सतत कृषि, पारिस्थितिकी-पर्यटन,सामुदायिक सहभागिता, क्षतिपूर्ति तंत्र तथा पारितंत्र सेवाओं के लिए भुगतान जैसी व्यवस्थाओं को बढ़ावा देना है।
आगे की राह
संरक्षण और विकास के बीच संतुलन स्थापित करने हेतु समन्वित दृष्टिकोण अपनाने की आवश्यकता है। इसके लिए निम्नलिखित उपाय महत्वपूर्ण हैं:
- वैज्ञानिक एवं सहभागी परामर्श प्रक्रिया के माध्यम से ESA की सीमाओं का निर्धारण।
- राज्यों और स्थानीय समुदायों को वित्तीय प्रोत्साहन तथा उचित क्षतिपूर्ति प्रदान करना।
- पंचायती राज संस्थाओं के माध्यम से विकेन्द्रीकृत पर्यावरणीय शासन व्यवस्था को सुदृढ़ करना।
- सतत आजीविका एवं जलवायु-अनुकूल कृषि को प्रोत्साहित करना।
- पारिस्थितिकीय रूप से संवेदनशील क्षेत्रों में खनन तथा प्रदूषणकारी उद्योगों पर कठोर नियमन लागू करना।
स्रोत: IE
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