डिजिटल सम्प्रभुता

पाठ्यक्रम: जीएस-2/ शासन 

सन्दर्भ

  • हाल ही में भारतीय रक्षा परिसंपत्तियों से जुड़े सीसीटीवी नेटवर्क एक चीनी सॉफ्टवेयर मंच के माध्यम से प्रभावित पाए गए, जिससे भारत की महत्वपूर्ण डिजिटल अवसंरचना की विदेशी प्रौद्योगिकी मंचों पर निर्भरता को लेकर चिंताएँ बढ़ गई हैं।

डिजिटल संप्रभुता क्या है?

  • डिजिटल संप्रभुता से तात्पर्य किसी राष्ट्र की अपनी डिजिटल अवसंरचना, डेटा तथा प्रौद्योगिकीय प्रणालियों पर नियंत्रण रखने की क्षमता से है।
  • वर्तमान में भारत के पास निम्नलिखित तीन महत्वपूर्ण स्तरों पर पूर्ण नियंत्रण का अभाव है:
    • हार्डवेयर स्तर (Hardware Layer)
    • उदाहरणतः, सीसीटीवी प्रणालियाँ, राउटर तथा दूरसंचार उपकरण, जो Huawei एवं ZTE जैसे चीनी निर्माताओं द्वारा बनाए जाते हैं, उनमें अंतर्निहित कमजोरियाँ (Backdoors) होने की आशंका रहती है, जिनका उपयोग राज्य-स्तरीय जासूसी के लिए किया जा सकता है।
    • सॉफ्टवेयर एवं क्लाउड स्तर (Software and Cloud Layer)
    • उदाहरणतः, सरकार एवं कॉर्पोरेट क्षेत्र के अनेक महत्वपूर्ण कार्य माइक्रोसॉफ्ट 365, गूगल वर्कस्पेस तथा AWS जैसे अमेरिकी मंचों पर संचालित होते हैं।
    • ये मंच अमेरिकी विधिक अधिकार-क्षेत्र के अधीन हो सकते हैं, जिनमें क्लाउड एक्ट (CLOUD Act) भी शामिल है, जो अमेरिकी अधिकारियों को विश्वभर में अमेरिकी कंपनियों के पास उपलब्ध डेटा तक पहुँच प्रदान कर सकता है।
    • रक्षा एवं हथियार प्रणाली स्तर (Defence and Weapons Systems Layer)
    • आधुनिक युद्ध व्यवस्था सॉफ्टवेयर-आधारित (Software Defined) होती जा रही है।
    • उदाहरणतः, लड़ाकू विमान एवं अन्य रक्षा प्रौद्योगिकियाँ ऐसे सॉफ्टवेयर कोड द्वारा संचालित होती हैं, जिनका नियंत्रण विदेशी निर्माताओं के पास होता है और वे अपने-अपने देशों की नीतियों के प्रति उत्तरदायी होते हैं।

यह राष्ट्रीय सुरक्षा की चिंता का विषय क्यों है?

  • डेटा पर विधिक अधिकार-क्षेत्र: भले ही डेटा भारत के डेटा केंद्रों में संग्रहीत हो, विदेशी मूल कंपनी को अपने देश की सरकार के निर्देश पर वह डेटा सौंपने के लिए बाध्य किया जा सकता है।
  • एकतरफा सेवा-निषेध (Unilateral Service Denial): नायरा एनर्जी (Nayara Energy) प्रकरण ने यह प्रदर्शित किया कि कोई विदेशी निगम, किसी अन्य देश के प्रतिबंधात्मक नियमों को लागू करते हुए, किसी भारतीय कंपनी को उसके स्वयं के परिचालन उपकरणों तक पहुँच से वंचित कर सकता है।
  • युद्ध संबंधी जोखिम:वर्ष 1999 के Kargil War कारगिल युद्ध के दौरान अमेरिका द्वारा भारत को GPS सेवा उपलब्ध न कराने से परिचालन संबंधी गंभीर कठिनाइयाँ उत्पन्न हुई थीं तथा जनहानि भी हुई थी।
  • शक्ति संक्रमण सिद्धांत (Power Transition Theory):भारत एक उभरती हुई शक्ति है और अमेरिका–चीन प्रौद्योगिकी प्रतिस्पर्धा यह दर्शाती है कि उभरते प्रतिद्वंद्वियों को निर्यात नियंत्रण, प्रतिबंधों तथा प्रौद्योगिकी निषेध के माध्यम से सीमित करने का प्रयास किया जाता है। भारत भी इस प्रवृत्ति से अछूता नहीं है।

वैश्विक प्रतिक्रियाएँ

  • फ्रांस ने वर्ष 2027 तक सरकारी विभागों को माइक्रोसॉफ्ट टीम्स एवं ज़ूम से हटाकर एक संप्रभु(sovereign) वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग मंच पर स्थानांतरित करने की योजना बनाई है।
  • नीदरलैंड, डेनमार्क तथा जर्मनी माइक्रोसॉफ्ट ऑफिस के घरेलू विकल्पों की सक्रिय रूप से खोज कर रहे हैं।
  • यूरोपियन यूनियन अमेरिकी मंचों पर निर्भरता कम करने के लिए स्वतंत्र क्लाउड एवं सूचना प्रौद्योगिकी अवसंरचना का निर्माण कर रहा है।

भारत की पहलें: प्रगति एवं कमियाँ

  • डिजिलॉकर एवं NIC क्लाउड (मेघराज):यह संप्रभु क्लाउड अवसंरचना की दिशा में प्रारम्भिक प्रयासों का प्रतिनिधित्व करता है, किन्तु इसका विस्तार और उद्यम-स्तरीय क्षमता अभी सीमित है।
  • विश्वसनीय दूरसंचार नीति एवं उपकरण परीक्षण: भारत ने 5G नेटवर्क में Huawei और ZTE पर प्रतिबंध लगाया है, किन्तु सॉफ्टवेयर मंचों के संदर्भ में समान स्तर की जाँच-पड़ताल अभी व्यापक रूप से लागू नहीं हुई है।
  • डिजिटल व्यक्तिगत डेटा संरक्षण अधिनियम, 2023: यह अधिनियम डेटा शासन से संबंधित मानदंड स्थापित करता है, किन्तु मंचीय संप्रभुता (Platform Sovereignty) अथवा अधिकार-क्षेत्र संबंधी समस्याओं का प्रत्यक्ष समाधान नहीं करता।
  • CERT-In के साइबर सुरक्षा निर्देश:इनसे घटना-रिपोर्टिंग की आवश्यकताएँ मजबूत हुई हैं, किन्तु वर्तमान व्यवस्था अभी भी संरचनात्मक रोकथाम की बजाय प्रतिक्रियात्मक (Reactive) बनी हुई है।

आगे की राह

  • संप्रभु क्लाउड अवसंरचना: भारत को मेघराज से आगे बढ़कर महत्वपूर्ण अवसंरचना के लिए पूर्णतः सक्षम एवं उद्यम-स्तरीय सरकारी क्लाउड प्रणाली विकसित करनी चाहिए।
  • महत्वपूर्ण परिचालनों के लिए मंचीय स्वतंत्रता: महत्वपूर्ण विभागों एवं मंत्रालयों को निर्धारित समय-सीमा के भीतर स्वदेशी रूप से विकसित अथवा स्वतंत्र रूप से लेखा-परीक्षित (Audited) उत्पादकता एवं संचार उपकरणों को अपनाने हेतु प्रोत्साहित किया जाना चाहिए।
  • रक्षा क्षेत्र में प्रौद्योगिकी का स्वदेशीकरण: सॉफ्टवेयर-आधारित युद्ध (Software Defined Warfare) की अवधारणा को आत्मनिर्भर भारत की रक्षा रूपरेखा में समाहित किया जाना चाहिए।
  • यह सुनिश्चित किया जाना चाहिए कि विदेशी विक्रेताओं से प्राप्त हथियार प्रणालियाँ स्वतंत्र रूप से लेखा-परीक्षित तथा सुरक्षित सॉफ्टवेयर संरचनाओं के साथ उपलब्ध हों।
  • नियामक पारस्परिकता सिद्धांत (Regulatory Reciprocity Doctrine): ऐसा कानूनी ढाँचा विकसित किया जाना चाहिए जो भारतीय उपयोगकर्ताओं एवं अवसंरचना से संबंधित डेटा और सेवाओं पर भारतीय प्राधिकारियों को पर्याप्त अधिकार-क्षेत्र प्रदान करे।
  • घरेलू प्रौद्योगिकी पारितंत्र में निवेश: सेमीकंडक्टर, प्रचालन तंत्रों (Operating Systems) तथा उद्यम सॉफ्टवेयर के स्वदेशी विकल्पों के विकास हेतु, दक्षिण कोरिया की औद्योगिक नीति के समान, दीर्घकालिक सार्वजनिक निवेश और समर्थन प्रदान किया जाना चाहिए।

स्रोत: TH

 

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