पाठ्यक्रम: GS2/अंतरराष्ट्रीय संबंध
संदर्भ
- भारत का एफटीए (FTA) नेटवर्क 27 देशों को समाहित करने वाले 15 समझौतों तक विस्तारित हो चुका है। हाल ही में भारत–ओमान व्यापक आर्थिक साझेदारी समझौता (CEPA) प्रभावी हुआ है, जबकि कई अन्य देशों एवं क्षेत्रीय समूहों के साथ वार्ताएँ अंतिम चरण में पहुँच रही हैं।
मुक्त व्यापार समझौतों (FTAs) के बारे में
- मुक्त व्यापार समझौता (FTA) दो या दो से अधिक देशों के मध्य किया जाने वाला एक ऐसा समझौता है, जिसका उद्देश्य वस्तुओं, सेवाओं, निवेश तथा प्रौद्योगिकी के मुक्त प्रवाह को सुगम बनाने के लिए शुल्क (टैरिफ), कोटा तथा अन्य व्यापारिक बाधाओं को कम करना या समाप्त करना होता है।
- एफटीए के उद्देश्य : निर्यातों के लिए बाजार पहुँच का विस्तार करना।
- आर्थिक सहयोग को सुदृढ़ बनाना।
- निवेश प्रवाह को प्रोत्साहित करना।
- वैश्विक प्रतिस्पर्धात्मकता में वृद्धि करना।
- घरेलू उद्योगों को वैश्विक मूल्य शृंखलाओं (GVCs) से जोड़ना।
- भारत ने निर्यात संवर्धन, निवेश आकर्षित करने तथा आपूर्ति शृंखलाओं के विविधीकरण हेतु एफटीए को एक रणनीतिक साधन के रूप में बढ़ते हुए महत्व के साथ अपनाया है।
FTAs के प्रमुख आयाम
- व्यापार उदारीकरण : वस्तुओं एवं सेवाओं पर लगाए जाने वाले सीमा शुल्क में कमी अथवा उनका उन्मूलन।
- निवेश सुविधा: स्थिर एवं पूर्वानुमेय नियमों के माध्यम से सीमा-पार निवेशों को प्रोत्साहित करना।
- सेवा व्यापार : पेशेवरों की अधिक गतिशीलता तथा सूचना प्रौद्योगिकी (IT), वित्त एवं स्वास्थ्य सेवा जैसे क्षेत्रों में बाजार पहुँच का विस्तार।
- उत्पत्ति के नियम : यह निर्धारित करते हैं कि कोई उत्पाद एफटीए के अंतर्गत अधिमान्य शुल्क लाभ प्राप्त करने हेतु पात्र है या नहीं।
- आपूर्ति शृंखला एकीकरण : क्षेत्रीय एवं वैश्विक मूल्य शृंखलाओं में भागीदारी को सुगम बनाना।
- सामरिक एवं भू-राजनीतिक सहयोग : एफटीए आर्थिक कूटनीति को सुदृढ़ करते हैं तथा रणनीतिक साझेदारियों को सुदृढ़ बनाते हैं।
| देशों एवं क्षेत्रीय समूहों के साथ भारत के मुक्त व्यापार समझौते (FTAs) | |
| समझौता | प्रमुख विशेषताएँ |
| आसियान–भारत मुक्त व्यापार समझौता | दक्षिण-पूर्व एशियाई देशों के साथ वस्तुओं, सेवाओं तथा निवेश में व्यापार को प्रोत्साहन। |
| भारत–जापान व्यापक आर्थिक साझेदारी समझौता | शुल्कों में कमी, सेवाओं के क्षेत्र में बाजार पहुँच तथा निवेश सहयोग। |
| भारत–दक्षिण कोरिया व्यापक आर्थिक साझेदारी समझौता | विनिर्माण एवं प्रौद्योगिकी क्षेत्रों में व्यापार को सुदृढ़ बनाना। |
| भारत–सिंगापुर व्यापक आर्थिक सहयोग समझौता | व्यापार, सेवाओं तथा वित्तीय सहयोग पर विशेष बल। |
| भारत–संयुक्त अरब अमीरात व्यापक आर्थिक साझेदारी समझौता | द्विपक्षीय व्यापार एवं लॉजिस्टिक्स संपर्कता को बढ़ावा देना। |
| भारत–ऑस्ट्रेलिया आर्थिक सहयोग एवं व्यापार समझौता | भारतीय वस्तुओं, विद्यार्थियों एवं पेशेवरों के लिए अधिक बाजार पहुँच सुनिश्चित करना। |
| भारत–मॉरीशस व्यापक आर्थिक सहयोग एवं साझेदारी समझौता | व्यापार एवं निवेश को सुगम बनाने हेतु प्रावधान। |
| भारत–यूरोपीय मुक्त व्यापार संघ व्यापार एवं आर्थिक साझेदारी समझौता | स्विट्ज़रलैंड, नॉर्वे, आइसलैंड तथा लिकटेंस्टाइन को सम्मिलित करते हुए निवेश संबंधी प्रतिबद्धताओं का प्रावधान। |
| भारत–ओमान व्यापक आर्थिक साझेदारी समझौता | वस्तुओं एवं सेवाओं के क्षेत्र में बाजार पहुँच तथा आर्थिक सहयोग का विस्तार। |
- प्रगति पर चल रही वार्ताएँ : भारत वर्तमान में यूरोपीय संघ , यूनाइटेड किंगडम , खाड़ी सहयोग परिषद , पेरू, इज़राइल तथा अन्य देशों/क्षेत्रीय समूहों के साथ मुक्त व्यापार समझौतों पर वार्ता कर रहा है।
- इन वार्ताओं के सफलतापूर्वक संपन्न होने के उपरांत, भारत के मुक्त व्यापार समझौता (FTA) साझेदार देशों का योगदान भारत के कुल निर्यात का लगभग 75 प्रतिशत तक हो सकता है।
भारत के मुक्त व्यापार समझौतों (FTAs) से संबंधित प्रमुख मुद्दे एवं चिंताएँ
- बढ़ता हुआ व्यापार घाटा : आसियान (ASEAN) के साथ भारत का व्यापार घाटा 381%, जापान के साथ 318% तथा दक्षिण कोरिया के साथ 268% बढ़ा है।
- इसके विपरीत, विश्व के शेष देशों के साथ भारत का व्यापार घाटा 142% की दर से बढ़ा है।
- विगत तीन वर्षों में आसियान, जापान और दक्षिण कोरिया के साथ भारत का औसत वार्षिक व्यापार घाटा लगभग 62 अरब अमेरिकी डॉलर रहा है।
- इसी प्रकार, संयुक्त अरब अमीरात (UAE), ऑस्ट्रेलिया, मॉरीशस तथा यूरोपीय मुक्त व्यापार संघ (EFTA) देशों के साथ किए गए नवीन एफटीए के अंतर्गत भी आयात की वृद्धि निर्यात की तुलना में कहीं अधिक रही है।
- व्यापार घाटे में वृद्धि के कारण : अधिकांश एफटीए साझेदार देशों में मोस्ट फेवर्ड नेशन (MFN) शुल्क पहले से ही अत्यंत निम्न स्तर पर हैं, जबकि भारत का व्यापार-भारित एमएफएन शुल्क लगभग 12.6% है।
- परिणामस्वरूप, शुल्कों में कटौती का लाभ भारत में प्रवेश करने वाले विदेशी निर्यातकों को अपेक्षाकृत अधिक प्राप्त होता है, जबकि भारतीय निर्यातकों को साझेदार देशों के बाजारों में अपेक्षाकृत कम लाभ मिलता है।
- भारतीय निर्यातकों द्वारा एफटीए लाभों का सीमित उपयोग: अनेक एफटीए पर हस्ताक्षर करने के बावजूद भारतीय निर्यातक अधिमान्य बाजार पहुँच का पूर्ण लाभ उठाने में असफल रहते हैं।
- कारण: अनेक साझेदार देशों में पहले से ही शुल्क अत्यंत कम अथवा शून्य हैं।
- उत्पत्ति के नियम का अनुपालन महंगा एवं जटिल हो सकता है।
- प्रमाणन प्रक्रियाएँ तथा दस्तावेजी आवश्यकताएँ सूक्ष्म, लघु एवं मध्यम उद्यमों (MSMEs) के लिए बाधक सिद्ध होती हैं।
- प्रभाव : निर्यात पक्ष पर एफटीए उपयोग की दर केवल 20–30% आँकी जाती है।
- जबकि आयात पक्ष पर इसका उपयोग अपेक्षाकृत अधिक, लगभग 60–70% है।
- कारण: अनेक साझेदार देशों में पहले से ही शुल्क अत्यंत कम अथवा शून्य हैं।
- बिगड़ती हुई प्रतिलोम शुल्क संरचना : प्रतिलोम शुल्क संरचना वह स्थिति है, जब कच्चे माल एवं मध्यवर्ती उत्पादों पर शुल्क तैयार उत्पादों की तुलना में अधिक होता है।
- उदाहरण : इस्पात एवं एल्युमीनियम पर 7.5–10% तक एमएफएन शुल्क लगाया जाता है।
- वहीं, इन सामग्रियों से निर्मित मशीनरी एवं इंजीनियरिंग उत्पाद अनेक एफटीए के अंतर्गत भारत में शुल्क-मुक्त प्रवेश प्राप्त कर लेते हैं।
- परिणाम: भारतीय निर्माताओं की उत्पादन लागत में वृद्धि।
- घरेलू मूल्य संवर्धन में कमी।
- ‘मेक इन इंडिया’ पहल का कमजोर होना।
- वैश्विक प्रतिस्पर्धात्मकता में गिरावट।
- उदाहरण : इस्पात एवं एल्युमीनियम पर 7.5–10% तक एमएफएन शुल्क लगाया जाता है।
- ‘आसियान में निर्माण, भारत में बिक्री’ परिघटना: एफटीए तथा प्रतिलोम शुल्क संरचना मिलकर कंपनियों को भारत के बाहर उत्पादन स्थापित करने के लिए प्रोत्साहित कर सकते हैं।
- उभरती प्रवृत्ति : चीनी कंपनियों ने वियतनाम, थाईलैंड एवं इंडोनेशिया में अपने विनिर्माण आधार का विस्तार किया है।
- कुछ भारतीय कंपनियों ने भी आसियान देशों में उत्पादन इकाइयाँ स्थापित की हैं।
- वहाँ निर्मित उत्पाद एफटीए के अंतर्गत शुल्क-मुक्त रूप से भारत में निर्यात किए जा सकते हैं।
- प्रभाव : निवेश का भारत से बाहर स्थानांतरण।
- घरेलू रोजगार अवसरों में कमी।
- भारत के विनिर्माण पारितंत्र का कमजोर होना।
- आपूर्ति शृंखला की लचीलापन क्षमता में कमी।
- उभरती प्रवृत्ति : चीनी कंपनियों ने वियतनाम, थाईलैंड एवं इंडोनेशिया में अपने विनिर्माण आधार का विस्तार किया है।
आगे की राह: भारत एफटीए को कैसे अधिक प्रभावी बना सकता है?
- शुल्क संरचना का युक्तिकरण : महत्त्वपूर्ण औद्योगिक कच्चे माल एवं मध्यवर्ती वस्तुओं पर शुल्कों में कमी की जाए।
- घरेलू शुल्क संरचना को एफटीए प्रतिबद्धताओं के अनुरूप बनाया जाए।
- उत्पत्ति के नियमों का सुदृढ़ीकरण: तीसरे देशों के माध्यम से शुल्क अपवंचन एवं डंपिंग को रोका जाए।
- साझेदार देशों द्वारा वास्तविक मूल्य संवर्धन सुनिश्चित किया जाए।
- एफटीए के उपयोग में वृद्धि : प्रमाणन प्रक्रियाओं को सरल बनाया जाए।
- एमएसएमई के बीच जागरूकता बढ़ाई जाए।
- डिजिटल व्यापार सुविधा तंत्रों का विस्तार किया जाए।
- निर्यात प्रतिस्पर्धात्मकता का सुदृढ़ीकरण: लॉजिस्टिक्स दक्षता में सुधार किया जाए।
- लेन-देन लागत को कम किया जाए।
- गुणवत्ता मानकों एवं अनुपालन अवसंरचना को सुदृढ़ किया जाए।
- एफटीए की आवधिक समीक्षा व्यवस्था: क्षेत्रवार प्रभाव आकलन किया जाए।
- आवश्यकता पड़ने पर सुरक्षा उपाय लागू किए जाएँ।
- वैश्विक मूल्य शृंखलाओं से एकीकरण : रेलू विनिर्माण क्लस्टरों को प्रोत्साहित किया जाए।
- प्रौद्योगिकी हस्तांतरण एवं नवाचार-आधारित उत्पादन को प्रोत्साहन दिया जाए।
- सेवा निर्यातों पर विशेष ध्यान सूचना प्रौद्योगिकी (IT), स्वास्थ्य सेवा, शिक्षा तथा पेशेवर सेवाओं में भारत की प्रतिस्पर्धात्मक क्षमता का लाभ उठाया जाए।
निष्कर्ष
- मुक्त व्यापार समझौते (FTAs) भारत की व्यापारिक एवं आर्थिक रणनीति का एक महत्त्वपूर्ण स्तंभ बने हुए हैं। तथापि, बढ़ते व्यापार घाटे, एफटीए लाभों के सीमित उपयोग, प्रतिलोम शुल्क संरचना तथा विनिर्माण गतिविधियों के अन्य देशों में स्थानांतरण जैसी चुनौतियाँ यह संकेत देती हैं कि नीति-निर्माण में संतुलित एवं सावधानीपूर्ण दृष्टिकोण अपनाने की आवश्यकता है।
- बाजार पहुँच के विस्तार और घरेलू औद्योगिक प्रतिस्पर्धात्मकता के सुदृढ़ीकरण के मध्य संतुलन स्थापित करके ही यह सुनिश्चित किया जा सकता है कि एफटीए आत्मनिर्भर भारत , मेक इन इंडिया तथा भारत को एक वैश्विक विनिर्माण एवं निर्यात महाशक्ति बनाने की आकांक्षा को साकार करने में प्रभावी योगदान दें।
| दैनिक मुख्य परीक्षा अभ्यास प्रश्न [प्रश्न]: मुक्त व्यापार समझौते (FTAs) बाजार पहुँच का विस्तार कर सकते हैं, किंतु यदि उन्हें उपयुक्त शुल्क (टैरिफ) एवं औद्योगिक नीतियों का समर्थन प्राप्त न हो, तो वे घरेलू विनिर्माण क्षेत्र को कमजोर भी कर सकते हैं। समालोचनात्मक परीक्षण कीजिए। |
स्रोत: IE
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