भारत-त्रिनिदाद अभिलेखीय समझौता : गिरमिटिया समुदाय की विरासत को सुदृढ़ करने हेतु 

पाठ्यक्रम: GS2/ अंतर्राष्ट्रीय संबंध

संदर्भ

  • विदेश मंत्री एस. जयशंकर ने त्रिनिदाद और टोबैगो का दौरा किया, जिसका उद्देश्य भारत की कैरेबियाई राष्ट्र के साथ सहभागिता को सुदृढ़ करना और गिरमिटिया समुदाय की विरासत को संरक्षित करना था।

यात्रा के प्रमुख परिणाम

  • ऐतिहासिक अभिलेखों का संरक्षण: भारत के राष्ट्रीय अभिलेखागार और त्रिनिदाद एवं टोबैगो के बीच एक समझौता ज्ञापन (MoU) पर हस्ताक्षर किए गए।
  • इसका उद्देश्य भारतीय अनुबंधित मज़दूरों से संबंधित अभिलेखीय दस्तावेजों का डिजिटलीकरण और संरक्षण करना है।
  • विरासत अवसंरचना का विकास: भारत ने नेल्सन द्वीप पर विरासत सुविधाओं के उन्नयन हेतु एक त्वरित प्रभाव परियोजना शुरू की। यह स्थल भारतीय प्रवासन से जुड़ा ऐतिहासिक स्थान है। परियोजना में शामिल हैं:
    • स्मारक स्मृति-चिह्न का निर्माण।
    • अभिलेखीय दस्तावेजों का डिजिटल केंद्र।
    • ऑडियो-विज़ुअल विरासत अनुभव का विकास।

गिरमिटिया कौन थे?

  • गिरमिटिया वे अनुबंधित मज़दूर थे जिन्हें ब्रिटिश भारत से 19वीं और 20वीं शताब्दी के आरंभ में बागानों पर कार्य करने के लिए भेजा गया था।
    • “गिरमिटिया” शब्द “एग्रीमेंट” से निकला है, जो उस अनुबंध को संदर्भित करता था जिसे भारतीय मज़दूरों ने औपनिवेशिक काल में हस्ताक्षरित किया था।
  • गिरमिटियों को फिजी, मॉरीशस, सेशेल्स, रीयूनियन, दक्षिण अफ्रीका, त्रिनिदाद और टोबैगो, ब्रिटिश गयाना (अब गुयाना), सूरीनाम, मलेशिया एवं केन्या जैसे देशों में भेजा गया था।
  • त्रिनिदाद और टोबैगो में प्रवासन:
    • 1845 से 1917 के बीच लगभग 1,43,000 अनुबंधित मज़दूर भारत से त्रिनिदाद गए। इनमें से अधिकांश उत्तर भारत और बिहार से थे।
    • आज उनके वंशज त्रिनिदाद और टोबैगो की जनसंख्या का लगभग 40–45% हिस्सा हैं और देश के राजनीतिक, आर्थिक और सामाजिक जीवन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।

भारत के लिए महत्व

  • प्रवासी कूटनीति को सुदृढ़ करना: भारत अपने प्रवासी समुदाय को विदेश नीति और वैश्विक सहभागिता का महत्वपूर्ण स्तंभ मानता है।
    • यह पहल भारत और प्रवासी भारतीय समुदायों के बीच भावनात्मक और सभ्यतागत संबंधों को मजबूत करती है।
  • भारत की सांस्कृतिक शक्ति का विस्तार: गिरमिटिया विरासत का संरक्षण भारत की सांस्कृतिक कूटनीति को बढ़ावा देता है।
  • औपनिवेशिक इतिहास की मान्यता: यह पहल अनुबंधित मज़दूरों द्वारा झेली गई कठिनाइयों को उजागर करती है और प्रवासन, श्रम शोषण तथा संघर्षशीलता के इतिहास को संरक्षित करने में योगदान देती है।

गिरमिटिया विरासत संरक्षण हेतु प्रमुख पहल

  • गिरमिटिया अध्ययन केंद्र की स्थापना: भारत शोध, दस्तावेज़ीकरण और सांस्कृतिक संरक्षण हेतु एक समर्पित गिरमिटिया अध्ययन केंद्र स्थापित करने की दिशा में कार्य कर रहा है।
  • OCI पात्रता का विस्तार: भारत ने 2025 में त्रिनिदाद और टोबैगो के भारतीय प्रवासी समुदाय के लिए ओवरसीज़ सिटिजनशिप ऑफ इंडिया (OCI) पात्रता को छठी पीढ़ी तक विस्तारित किया।

गिरमिटिया विरासत संरक्षण की चुनौतियाँ

  • अपूर्ण ऐतिहासिक अभिलेख: औपनिवेशिक काल के कई अभिलेख खंडित, क्षतिग्रस्त या अनुपलब्ध हैं। नामों और वर्तनी में भिन्नता वंशावली का पता लगाने को कठिन बनाती है।
  • पीढ़ियों में सांस्कृतिक दूरी: प्रवासी समुदाय की नई पीढ़ियों को अपने पूर्वजों के इतिहास और प्रवासन अनुभवों की सीमित जानकारी हो सकती है।
  • संस्थागत बाधाएँ: ऐतिहासिक अभिलेखों का संरक्षण दीर्घकालिक संस्थागत समन्वय, तकनीकी विशेषज्ञता और वित्तीय सहयोग की मांग करता है।

आगे की राह

  • अभिलेखों का व्यापक डिजिटलीकरण: भारत को कैरेबियाई देशों के साथ मिलकर जहाज़ों के अभिलेख, बागान रजिस्टर और प्रवासन दस्तावेजों का डिजिटलीकरण करना चाहिए।
  • सांस्कृतिक आदान-प्रदान को सुदृढ़ करना: प्रवासी समुदायों के लिए छात्रवृत्ति कार्यक्रम, सांस्कृतिक आदान-प्रदान और विरासत पर्यटन पहल को बढ़ावा देना चाहिए।
  • गिरमिटिया अनुभव की मान्यता: भारत गिरमिटिया अनुभव को वैश्विक प्रवासन और औपनिवेशिक इतिहास के एक प्रमुख अध्याय के रूप में अंतर्राष्ट्रीय मान्यता दिलाने की दिशा में प्रयास कर सकता है।

Source: TH

 

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