सतत कृषि के लिए वित्तपोषण अंतरालों का समापन

पाठ्यक्रम: GS3/कृषि

संदर्भ

  • भारत को दीर्घकालिक खाद्य सुरक्षा सुनिश्चित करने और करोड़ों छोटे एवं सीमांत किसानों की आजीविका की रक्षा हेतु अपने कृषि खाद्य उत्पादन तंत्र में लचीलापन वित्तपोषण को प्राथमिकता देनी होगी।

भारत की कृषि एवं जलवायु लचीलापन की वर्तमान स्थिति

  • भारतीय कृषि की संरचनात्मक प्रोफ़ाइल: GDP में योगदान (~15–17%); कार्यबल निर्भरता (~42–45% कुल रोजगार)।
  • कृषि संरचना: 86% से अधिक किसान छोटे एवं सीमांत हैं (<2 हेक्टेयर)।
    • विखंडित भूमि-धारण से पैमाने की अर्थव्यवस्थाएं  कम हो जाती है।
  • फसल पैटर्न: धान, गेहूँ, दालें, तिलहन, गन्ना, कपास प्रमुख।
    • उच्च मानसून निर्भरता (~50% शुद्ध बोया क्षेत्र वर्षा-आधारित)।

भारत में कृषि हेतु जलवायु वित्त की स्थिति

  • घरेलू वित्त प्रवृत्तियाँ (जलवायु नीति पहल, 2021–22):
    • कुल अनुकूलन वित्त: ₹1,092 अरब।
    • कृषि-विशिष्ट अनुकूलन वित्त: ₹265 अरब (~$3.6 अरब)।
    • कृषि का हिस्सा: कुल अनुकूलन वित्त का 24%।
  • किंतु 2015–2030 के लिए कृषि अनुकूलन हेतु आवश्यक वित्त ~$67 अरब प्रति वर्ष अनुमानित था, जो भारी कमी को दर्शाता है।
  • निवेश का स्वरूप: कृषि-वनीकरण, फसल बीमा, कुशल सिंचाई प्रणाली, लचीली फसल प्रणाली, मृदा एवं जल संरक्षण, अनुसंधान एवं क्षमता निर्माण।

चिंताएँ एवं मुद्दे (भारत का बढ़ता जोखिम)

  • जलवायु संवेदनशीलता:जलवायु जोखिम सूचकांक 2026 (जर्मनवॉच) के अनुसार भारत सबसे अधिक जलवायु-प्रभावित देशों में नौवें स्थान पर रहा।
    • चरम मौसम घटनाओं की बढ़ती आवृत्ति एवं तीव्रता ने फसल उत्पादन घटाया, फसल विफलता का जोखिम बढ़ाया और कृषि संकट को गंभीर किया।
    • कृषि भारत का सबसे जलवायु-संवेदनशील क्षेत्र है, जो ग्रामीण आजीविका, छोटे किसानों और राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा को प्रभावित करता है।
  • वैश्विक कमी:यूएनईपी अनुकूलन अंतर रिपोर्ट 2025  के अनुसार विकासशील देशों को 2035 तक अनुकूलन हेतु $310–365 अरब प्रति वर्ष की आवश्यकता है।
    • वास्तविक प्रवाह मात्र $26 अरब प्रति वर्ष है।
    • उपलब्ध निधि से लगभग 12–14 गुना अधिक की कमी है।
    • यह संकेत देता है कि भारत जैसे देशों को अनिश्चित वैश्विक प्रवाह पर अत्यधिक निर्भर रहने के बजाय अपने घरेलू जलवायु वित्त ढाँचे को सुदृढ़ करना चाहिए।
  • कम वित्तपोषित लेकिन अधिक जोखिमग्रस्त कृषि: FAO एवं UNDP की रिपोर्ट एग्री-फूड सिस्टम्स इन नेशनल अडैप्टेशन प्लान्स — एन एनालिसिस के अनुसार कृषि-खाद्य तंत्र को कुल अनुकूलन निधि का लगभग 54% चाहिए, किंतु वैश्विक स्तर पर उन्हें मात्र 20% ही मिलता है।
  • प्रौद्योगिकी एवं ज्ञान की कमी: जलवायु-लचीले बीजों का सीमित उपयोग; कमजोर लास्ट-माइल एक्सटेंशन सर्विसेज; ग्रामीण क्षेत्रों में डिजिटल विभाजन।

निजी क्षेत्र की भागीदारी कम क्यों है?

  • निजी वित्त का योगदान कुल घरेलू कृषि अनुकूलन वित्त का मात्र ~1% (₹2.7 अरब) है।
  • प्रमुख बाधाएँ: उच्च जलवायु जोखिम, लंबी वापसी अवधि, अनिश्चित व्यापार मॉडल, छोटे एवं विखंडित भूमि-धारण, पैमाने की सीमित अर्थव्यवस्थाएँ, और 80% से अधिक लाभार्थी छोटे किसान।
    • ये संरचनात्मक वास्तविकताएँ बड़े पैमाने पर निजी निवेश को हतोत्साहित करती हैं।

उभरती सकारात्मक प्रवृति

  • बाजरा पर बढ़ता ध्यान (अंतर्राष्ट्रीय बाजरा वर्ष की विरासत)।
  • सूक्ष्म सिंचाई कवरेज का विस्तार।
  • प्राकृतिक खेती एवं कृषि-पर्यावरण का प्रोत्साहन।
  • डिजिटल कृषि मिशन और AI-आधारित मौसम परामर्श।
  • जलवायु-स्मार्ट कृषि (CSA) पर बढ़ता बल।

जलवायु लचीलापन हेतु संस्थागत एवं नीतिगत ढाँचा

  • राष्ट्रीय स्तर की नीतियाँ:
    • राष्ट्रीय जलवायु परिवर्तन कार्य योजना (NAPCC): राष्ट्रीय सतत कृषि मिशन (NMSA)।
    • राष्ट्रीय अनुकूलन योजना (NAP) प्रक्रिया
    • प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना (फसल बीमा)
    • प्रधानमंत्री कृषि सिंचाई योजना (सिंचाई दक्षता)
    • मृदा स्वास्थ्य कार्ड योजना
    • जलवायु लचीली कृषि पर राष्ट्रीय नवाचार (NICRA – ICAR)
  • COP30 विकास (बेलें, ब्राज़ील):  भारत ने 13 विकासशील देशों के साथ मिलकर NAP कार्यान्वयन हेतु देश प्लेटफ़ॉर्म शुरू किया।यह ग्रीन क्लाइमेट फंड (GCF) द्वारा समर्थित है, जिसका उद्देश्य है:
    • घरेलू सार्वजनिक वित्त का एकीकरण।
    • निजी पूंजी का संकलन।
    • अंतरराष्ट्रीय जलवायु निधियों का प्रवाह।

आगे की राह: भारत की जलवायु वित्त पारिस्थितिकी को सुदृढ़ करना

  • सार्वजनिक वित्त को नेतृत्व करना होगा:केंद्र और राज्य सरकारों को अनुकूलन वित्त का 98–99% प्रदान करना जारी रखना होगा।
    • बजट प्राथमिकता: जलवायु-लचीले बीज, जल उपयोग दक्षता, कृषि-पर्यावरणीय संक्रमण, और फसल विविधीकरण।
  • निजी निवेश को उत्प्रेरित करना: निजी क्षेत्र को ब्लेंडेड फाइनेंस मॉडल, पब्लिक-प्राइवेट पार्टनरशिप (PPP), वायबिलिटी गैप फंडिंग, न्यूनतम सुनिश्चित रिटर्न योजनाएँ, जोखिम-साझाकरण उपकरण, और जलवायु जोखिम बीमा तंत्र के माध्यम से प्रोत्साहित किया जाना चाहिए।
  • संस्थागत एवं नियामक सुधार: पारदर्शी घरेलू जलवायु वित्त पारिस्थितिकी का निर्माण।
    • व्यापक जलवायु जोखिम डेटा प्रणाली का विकास।
    • निगरानी और मूल्यांकन ढाँचे को सुदृढ़ करना।
    • मंत्रालयों (कृषि, वित्त, पर्यावरण, ग्रामीण विकास) के बीच समन्वय में सुधार।

निष्कर्ष

  • भारत की कृषि लचीलापन आर्थिक स्थिरता, सामाजिक न्याय और खाद्य संप्रभुता का प्रश्न है।
  • वैश्विक अनुकूलन वित्त अत्यंत अपर्याप्त है और निजी भागीदारी सीमित है, इसलिए भारत को अपने घरेलू जलवायु वित्त पारिस्थितिकी को सुदृढ़ करने को प्राथमिकता देनी होगी।
  • रणनीतिक सार्वजनिक निवेश, नवाचारी वित्तीय उपकरणों और संस्थागत सुधारों द्वारा समर्थित, छोटे किसानों के भविष्य की रक्षा करने तथा जलवायु अनिश्चितता के दौर में राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है।
मुख्य परीक्षा दैनिक अभ्यास प्रश्न
[प्रश्न]  कृषि अनुकूलन में वित्तीय अंतराल की प्रकृति पर चर्चा कीजिए। भारत में सतत कृषि हेतु सार्वजनिक और निजी निवेश एकत्रित करने की चुनौतियों का परीक्षण कीजिए।

Source: BL

 

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