भारत और बढ़ती वैश्विक कीटनाशक विषाक्तता

पाठ्यक्रम: GS3/पर्यावरण और जैव विविधता; कृषि

संदर्भ

  • हाल ही में साइंस पत्रिका में प्रकाशित एक अध्ययन ने भारत के वैश्विक कीटनाशक जोखिमों में उच्च योगदान को कुल अनुप्रयुक्त विषाक्तता (TAT) के माध्यम से मापा है और संयुक्त राष्ट्र की जैव विविधता लक्ष्यों में ठहराव के बीच सुधारों का आह्वान किया है।
    • अध्ययन यह भी इंगित करता है कि विश्व 2022 में आयोजित संयुक्त राष्ट्र जैव विविधता सम्मेलन (COP15) में निर्धारित 2030 तक कीटनाशक जोखिम को 50% तक कम करने के लक्ष्य की दिशा में अग्रसर नहीं है।

TAT के प्रमुख निष्कर्ष 

  • भारत, चीन, ब्राज़ील और अमेरिका मिलकर वैश्विक TAT का 70% उत्पन्न करते हैं, मुख्यतः फल, सब्ज़ियाँ, धान, मक्का एवं सोया फसलों से।
  • भारत, उप-सहारा अफ्रीका और भारतीय उपमहाद्वीप में विषाक्तता तीव्रता से बढ़ी है, जिससे स्थलीय आर्थ्रोपॉड्स, मृदा जीव, मछलियाँ और जलीय पौधे सबसे अधिक प्रभावित हुए हैं।
  • केवल चिली संयुक्त राष्ट्र के 2030 तक 50% जोखिम कमी लक्ष्य (कुनमिंग-मॉन्ट्रियल फ्रेमवर्क,2022) के निकट है; वैश्विक प्रगति पिछड़ रही है।

समग्र अनुप्रयुक्त विषाक्तता (TAT) क्या है?

  • TAT एक वैज्ञानिक मापदंड है जो पर्यावरण पर कीटनाशकों द्वारा डाले गए कुल विषाक्त दबाव को मापता है।
  • यह केवल प्रयुक्त मात्रा नहीं, बल्कि कीटनाशकों की अंतर्निहित विषाक्तता और गैर-लक्षित प्रजातियों पर घातक प्रभाव को भी मापता है।
  • TAT में वृद्धि जैव विविधता संरक्षण, कृषि-पर्यावरणशास्त्र, पारिस्थितिकी तंत्र सेवाओं और दीर्घकालिक कृषि स्थिरता को कमजोर करती है।
  • इसका प्रभाव परागणकर्ताओं, मृदा जीवों, मछलियों, जलीय जीवन, स्थलीय आर्थ्रोपॉड्स और पौधों पर पड़ता है।
  • इस प्रकार, TAT केवल ‘कितना’ कीटनाशक उपयोग हुआ है यह नहीं, बल्कि ‘कितना हानिकारक’ है, यह भी दर्शाता है।

भारत पर उच्च TAT के प्रभाव 

  • जैव विविधता पर प्रभाव: परागणकर्ताओं में गिरावट, जबकि भारत का बागवानी क्षेत्र (फल, सब्ज़ियाँ, तिलहन) परागण पर अत्यधिक निर्भर है।
    • स्थलीय आर्थ्रोपॉड्स का ह्रास: इनके घटने से पक्षियों, सरीसृपों और छोटे स्तनधारियों पर प्रभाव।
    • मृदा जैव विविधता का क्षरण: मृदा उर्वरता और प्राकृतिक पोषक चक्रण में कमी।
    • जलीय पारिस्थितिकी तंत्र को नुकसान: मानसून में कीटनाशक बहाव से नदियाँ और तालाब प्रदूषित; ग्रामीण मत्स्य पालन प्रभावित।
  • कृषि पर प्रभाव: कीट प्रतिरोध, दीर्घकालिक उत्पादकता में कमी और सतत कृषि पर खतरा।
  • जन स्वास्थ्य पर प्रभाव: तीव्र विषाक्तता, कैंसर, स्नायु संबंधी रोग, अंतःस्रावी व्यवधान और व्यावसायिक जोखिम।
  • अर्थव्यवस्था पर प्रभाव: स्वास्थ्य लागत में वृद्धि, मत्स्य पालन और संबद्ध क्षेत्रों पर प्रभाव।
    • निर्यात अस्वीकृति: यूरोपीय संघ द्वारा भारतीय बासमती चावल को प्रतिबंधित फफूंदनाशक अवशेषों के कारण अस्वीकार करना; विकसित देशों में कठोर MRLs।

भारत का विधिक ढांचा: क्या यह पुराना है?

  • कीटनाशक अधिनियम, 1968: मुख्यतः कृषि उपयोग पर केंद्रित, घरेलू और औद्योगिक कीटनाशक जोखिमों पर सीमित प्रावधान। आधुनिक विषाक्तता स्तर, पर्यावरणीय स्थायित्व और दायित्व तंत्र को पर्याप्त रूप से संबोधित नहीं करता।
    • भारत कथित रूप से 66 ऐसे कीटनाशक उपयोग करता है जो अन्य देशों में प्रतिबंधित हैं, जिनमें पैराक्वाट (यूरोप में प्रतिबंधित) शामिल है।
  • कीटनाशक प्रबंधन विधेयक, 2025: इसका उद्देश्य लोगों और पर्यावरण पर जोखिम कम करना तथा जैविक व पारंपरिक कीटनाशकों को बढ़ावा देना है।
    • किंतु इसमें विशेषज्ञ परामर्श का अभाव और कमजोर दायित्व प्रावधान हैं।

पर्यावरणीय शासन चुनौतियाँ 

  • नियामक ढांचे पर दबाव: कीटनाशक अधिनियम, 1968 पुराना है; प्रवर्तन और निगरानी तंत्र कमजोर।
  • अंतरराष्ट्रीय प्रतिबद्धताओं को पूरा करने में कठिनाई: भारत जैविक विविधता पर कन्वेंशन(CBD) और कुनमिंग-मॉन्ट्रियल वैश्विक जैव विविधता ढांचा का हस्ताक्षरकर्ता है।
    • बढ़ता TAT 2030 लक्ष्य को कठिन बनाता है।
  • पर्यावरणीय न्याय संबंधी चिंताएँ: छोटे किसान बढ़ती लागत, स्वास्थ्य जोखिम और ऋण बोझ का सामना करते हैं।
    • ग्रामीण और आदिवासी समुदाय, जो जैव विविधता हॉटस्पॉट्स के निकट हैं, असमान रूप से प्रभावित होते हैं।
  • जैव विविधता हॉटस्पॉट्स पर खतरा: भारत में पश्चिमी घाट, हिमालय और इंडो-बर्मा क्षेत्र हैं।
    • इन क्षेत्रों में उच्च कीटनाशक विषाक्तता स्थानिक प्रजातियों को खतरे में डालती है और पारिस्थितिकीय लचीलापन कमजोर करती है।
  • वैश्विक प्रतिबद्धताएँ और निगरानी अंतराल: संयुक्त राष्ट्र जैव विविधता ढांचा वार्षिक कीटनाशक उपयोग की रिपोर्टिंग, सक्रिय घटक के अनुसार डेटा और वास्तविक समय निगरानी की मांग करता है।
    • किंतु कई देशों में सुदृढ़ डेटा प्रणाली का अभाव है, जिससे पारदर्शिता और जवाबदेही कमजोर होती है।

आगे की राह (Way Forward)

  • नीतिगत उपाय: कम विषाक्त विकल्पों की ओर बदलाव जैसे एकीकृत कीट प्रबंधन (IPM) और जैविक नियंत्रण विधियाँ।
  • जैविक एवं प्राकृतिक खेती को बढ़ावा: परम्परागत कृषि विकास योजना (PKVY) और प्राकृतिक खेती मॉडल जैसी पहलों का विस्तार।
  • कानूनी सुधार: नियामक ढांचे का अद्यतन, कठोर दायित्व एवं क्षतिपूर्ति प्रावधानों का समावेश, और अत्यधिक खतरनाक कीटनाशकों पर प्रतिबंध।
  • डेटा पारदर्शिता: वार्षिक रिपोर्टिंग अनिवार्य करना और कीटनाशक अवशेषों का सार्वजनिक प्रकटीकरण।
  • किसान सहयोग: सतत कृषि को प्रोत्साहन, रासायनिक इनपुट पर निर्भरता कम करना, और जलवायु-लचीली कृषि से जोड़ना।

संयुक्त राष्ट्र जैव विविधता सम्मेलन (COP15), 2022 के परिणाम

  • कुनमिंग–मॉन्ट्रियल वैश्विक जैव विविधता रूपरेखा (KM-GBF): यह जैव विविधता के लिए पेरिस समझौते (जलवायु) के समकक्ष है।
  • समय सीमा: 2022–2030 (2050 की दृष्टि के साथ)।
  • GBF के मुख्य लक्ष्य:
    • 2050 के दीर्घकालिक लक्ष्य: जैव विविधता का संरक्षण एवं पुनर्स्थापन; जैव विविधता का सतत उपयोग; आनुवंशिक संसाधनों का न्यायसंगत साझा; जैव विविधता वित्तीय अंतराल को समाप्त करना।
    • 30×30 लक्ष्य (प्रमुख प्रतिबद्धता): 2030 तक विश्व की कम से कम 30% भूमि और महासागरों की रक्षा।
    • 2030 के लिए 23 क्रियात्मक लक्ष्य:
      • कीटनाशक जोखिम में 50% कमी (TAT से सीधे जुड़ा);
      • कम से कम 30% क्षतिग्रस्त पारिस्थितिक तंत्र का पुनर्स्थापन;
      • नई प्रजातियों के प्रवेश और स्थापना में 50% कमी;
      • अतिरिक्त पोषक तत्वों और प्लास्टिक प्रदूषण में कमी;
      • $500 अरब/वर्ष के हानिकारक सब्सिडी (जैसे जीवाश्म ईंधन, असतत कृषि) की पहचान और चरणबद्ध समाप्ति।

जैव विविधता वित्तीय प्रतिबद्धताएँ 

  • वित्तीय जुटाव: 2030 तक वैश्विक स्तर पर प्रति वर्ष $200 अरब।
    • विकसित देशों से विकासशील देशों हेतु: 2025 तक $20 अरब/वर्ष; 2030 तक $30 अरब/वर्ष।
  • वैश्विक जैव विविधता रूपरेखा कोष (GBFF): वैश्विक पर्यावरण सुविधा (GEF) के अंतर्गत स्थापना।

डिजिटल अनुक्रम सूचना (DSI)

  • आनुवंशिक संसाधनों पर डिजिटल अनुक्रम सूचना से लाभ साझा करने पर सहमति।
    • औषधि, जैव प्रौद्योगिकी और कृषि के लिए महत्वपूर्ण।
    • भारत जैसे जैव विविधता-समृद्ध विकासशील देशों के लिए न्याय सुनिश्चित करता है।

निगरानी और रिपोर्टिंग

  • देशों को राष्ट्रीय जैव विविधता रणनीतियाँ और कार्य योजनाएँ (NBSAPs) विकसित करनी होंगी।
    • राष्ट्रीय लक्ष्यों को GBF के अनुरूप करना और समय-समय पर प्रगति रिपोर्ट प्रस्तुत करना अनिवार्य होगा।

मुख्य परीक्षा दैनिक अभ्यास प्रश्न
[प्रश्न] भारत में बढ़ती कीटनाशक विषाक्तता से उत्पन्न पारिस्थितिकीय, जन स्वास्थ्य तथा नियामक चुनौतियों की विवेचना कीजिए।

Source: TH

 

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