केंद्र सरकार द्वारा NGOs हेतु FCRA नियम सख्त

पाठ्यक्रम: GS2/ राजव्यवस्था और शासन

संदर्भ

  • गृह मंत्रालय (MHA) ने विदेशी अंशदान (विनियमन) संशोधन नियम, 2026 को अधिसूचित किया है, जिन्हें विदेशी अंशदान (विनियमन) अधिनियम, 2010 (FCRA) के अंतर्गत जारी किया गया है।

विदेशी अंशदान (विनियमन) अधिनियम (FCRA), 2010

  • FCRA का उद्देश्य विदेशी अंशदान की प्राप्ति और उसके उपयोग को विनियमित करना है, ताकि राष्ट्रीय हित के प्रतिकूल गतिविधियों को रोका जा सके।
  • यह अधिनियम पहली बार वर्ष 1976 में लागू किया गया था, किंतु बाद में इसे निरस्त कर वर्ष 2010 में नए कानून द्वारा प्रतिस्थापित किया गया। वर्ष 2020 में इसमें पुनः संशोधन किया गया।
  • FCRA के अंतर्गत प्राप्त पंजीकरण की वैधता 5 वर्ष होती है तथा इसकी अवधि समाप्त होने से पूर्व इसका नवीनीकरण कराना आवश्यक है।
  • केंद्रीय गृह मंत्रालय (MHA) FCRA के कार्यान्वयन की निगरानी करता है, ताकि यह सुनिश्चित किया जा सके कि विदेशी निधियों का उपयोग देश की आंतरिक सुरक्षा पर प्रतिकूल प्रभाव न डाले।

FCRA नियमों में प्रमुख संशोधन

  • गैर-सरकारी संगठनों (NGOs) की गतिविधियों का वर्गीकरण: विदेशी निधि प्राप्त करने के इच्छुक NGOs को अब निम्नलिखित पाँच अनुमत श्रेणियों में से किसी एक के अंतर्गत पंजीकरण कराना होगा—
    • सामाजिक 
    • आर्थिक 
    • शैक्षिक 
    • सांस्कृतिक 
    • धार्मिक 
    • यह पहली बार है जब प्रत्येक श्रेणी के अंतर्गत NGOs के लिए पृथक गतिविधि-सूचियाँ निर्धारित की गई हैं।
  • अनिवार्य प्रकटीकरण: अब NGOs को निम्नलिखित विवरण अनिवार्य रूप से प्रस्तुत करने होंगे—
    • उनकी गतिविधियों का विवरण
    • कार्यक्रमों का भौगोलिक कार्यक्षेत्र
    • उनकी वेबसाइटों की जानकारी
    • सोशल मीडिया खातों का विवरण
    • प्रकाशनों की जानकारी
    • इसके अतिरिक्त, NGOs को प्रत्येक श्रेणी तथा प्रत्येक राज्य एवं केंद्रशासित प्रदेश, जहाँ वे कार्यरत हैं, के लिए अलग-अलग शुल्क का भुगतान करना होगा। पूर्व व्यवस्था में FCRA पंजीकृत संस्थाओं के लिए केवल एकमुश्त शुल्क देय था।
  • प्रमुख पदाधिकारियों की विस्तारित परिभाषा: संशोधित नियमों के अंतर्गत NGO के “प्रमुख पदाधिकारी” की परिभाषा का विस्तार किया गया है। अब इसमें केवल पदाधिकारी और निदेशक ही नहीं, बल्कि निम्नलिखित व्यक्ति भी सम्मिलित होंगे—
    • न्यासी 
    • साझेदार 
    • हिंदू अविभाजित परिवार (HUF) का मुखिया
    • शासी निकाय के सदस्य
    • संगठन का नियंत्रण या प्रबंधन करने वाला कोई भी अन्य व्यक्ति
    • इसके अतिरिक्त, जिन संस्थाओं के प्रमुख पदाधिकारियों में भारतीय मूल के व्यक्तियों (PIOs) को छोड़कर विदेशी नागरिक शामिल हैं, उन्हें सामान्यतः पंजीकरण अथवा पूर्व अनुमति के लिए पात्र नहीं माना जाएगा, जब तक कि केंद्र सरकार द्वारा विशेष अनुमति न दी जाए।
  • राज्यवार एवं श्रेणीवार पंजीकरण: संशोधित नियमों के अनुसार—
    • पंजीकरण प्रमाणपत्र अथवा नवीन पंजीकरण हेतु आवेदन-पत्र में उन उद्देश्यों का स्पष्ट उल्लेख होगा, जिनके लिए पंजीकरण प्रदान किया गया है।
    • इन उद्देश्यों का चयन केवल नियमों की अनुसूची में निर्दिष्ट सूची से ही किया जा सकेगा।
    • NGOs को उन राज्यों अथवा केंद्रशासित प्रदेशों का भी उल्लेख करना होगा, जहाँ वे अपनी गतिविधियाँ संचालित करना चाहते हैं।
    • नियमों के अंतर्गत प्रत्येक निर्दिष्ट उद्देश्य तथा प्रत्येक राज्य/केंद्रशासित प्रदेश में कार्य संचालन के लिए पृथक शुल्क भी निर्धारित किया गया है।

संशोधित नियमों का महत्व

  • NGOs की गतिविधियों तथा विदेशी वित्तपोषण के संबंध में अधिक प्रकटीकरण के माध्यम से पारदर्शिता में वृद्धि होगी।
  • उद्देश्य-विशिष्ट एवं राज्य-विशिष्ट अनुमोदन प्रणाली निगरानी और जवाबदेही को सुदृढ़ बनाएगी।
  • प्रमुख पदाधिकारियों की विस्तारित परिभाषा संगठनात्मक सुशासन और उत्तरदायित्व को बेहतर बनाएगी।
  • विदेशी निधियों की ट्रेसबिलिटी में सुधार होगा तथा नियामकीय निगरानी अधिक प्रभावी बनेगी।

प्रमुख चिंताएँ

  • बहुस्तरीय पंजीकरण और पृथक शुल्क व्यवस्था से NGOs की अनुपालन लागत बढ़ेगी।
  • विस्तृत रिपोर्टिंग आवश्यकताएँ सीमित संसाधनों वाले छोटे संगठनों पर अतिरिक्त प्रशासनिक भार डालेंगी।
  • अनुमोदित गतिविधियों एवं कार्यक्षेत्रों पर प्रतिबंध से संस्थाओं के संचालन में लचीलापन कम होगा।
  • कठोर विनियमों का प्रभाव नागरिक समाज संगठनों तथा विदेशी वित्तपोषित विकास परियोजनाओं के कार्यान्वयन पर पड़ सकता है।

निष्कर्ष

  • संशोधित FCRA नियमों का उद्देश्य NGOs द्वारा प्राप्त विदेशी अंशदान के संबंध में पारदर्शिता, जवाबदेही तथा नियामकीय निगरानी को सुदृढ़ करना है।
  • यद्यपि ये उपाय नियमों के अनुपालन को बेहतर बनाने तथा निधियों के दुरुपयोग को रोकने में सहायक सिद्ध हो सकते हैं, तथापि इनके प्रभावी क्रियान्वयन के दौरान यह सुनिश्चित किया जाना चाहिए कि वास्तविक नागरिक समाज संगठन बिना अनावश्यक प्रशासनिक बाधाओं के अपने विकासात्मक एवं मानवीय कार्यों को निरंतर संचालित कर सकें।

स्रोत: TH, ET

 

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