पाठ्यक्रम: GS4/एथिक्स, सत्यनिष्ठा और अभिक्षमता
संदर्भ
- हाल ही में 22 वर्षीय एक अभ्यर्थी सहित देशभर में हुई अनेक दुखद आत्महत्या की घटनाओं ने उच्च-दांव वाली प्रवेश परीक्षाओं से जुड़े मानसिक दबाव, मानसिक स्वास्थ्य सहायता की आवश्यकता तथा परीक्षा प्रणाली में संरचनात्मक सुधारों की मांग को पुनः प्रमुखता से सामने लाया है।
NEET से जुड़ी आत्महत्याएँ: संक्षिप्त परिचय
- NEET (राष्ट्रीय पात्रता सह प्रवेश परीक्षा) से जुड़ी आत्महत्याओं में वे विद्यार्थी सम्मिलित हैं जो इस परीक्षा की तैयारी करते हैं अथवा इसमें सम्मिलित होते हैं और परीक्षा के तनाव, असफलता के भय, अभिभावकीय अपेक्षाओं, सामाजिक दबाव आदि कारणों से आत्महत्या जैसा कदम उठा लेते हैं।
NEET से जुड़ी आत्महत्याओं में प्रमुख नैतिक मुद्दे
- व्यक्ति के अंतर्निहित मूल्य का अंकों, रैंक और प्रवेश तक सीमित होना: विद्यार्थी के मूल्यांकन को केवल उसके अंक, रैंक अथवा प्रवेश प्राप्ति तक सीमित कर देना उसकी मानवीय गरिमा का हनन है।
- देखभाल की नैतिकता का अभाव: विद्यार्थियों को परिवार, विद्यालय, कोचिंग संस्थानों तथा समाज से पर्याप्त भावनात्मक समर्थन प्राप्त नहीं हो पाता।
- अव्यावहारिक सामाजिक एवं अभिभावकीय दबाव: अत्यधिक अपेक्षाएँ विद्यार्थियों की स्वतंत्रता, कल्याण तथा भावनात्मक संतुलन को प्रभावित करती हैं।
- शिक्षा का व्यावसायीकरण: अनेक मामलों में शैक्षणिक संस्थान विद्यार्थियों के समग्र विकास की अपेक्षा परिणामों और लाभ को अधिक प्राथमिकता देते हैं।
- असफलता का कलंककरण: विद्यार्थी असफलता को व्यक्तिगत कमजोरी अथवा अपनी अयोग्यता का संकेत मानने लगते हैं।
- समुचित परामर्श सेवाओं का अभाव: अपर्याप्त परामर्श सेवाएँ तथा सुलभ मनोवैज्ञानिक सहायता की कमी देखभाल के नैतिक दायित्व के विपरीत है।
- निम्न भावनात्मक बुद्धिमत्ता (EI) एवं प्रत्यास्थता का विकास: भावनात्मक विकास और मानसिक दृढ़ता की कीमत पर केवल शैक्षणिक सफलता पर अत्यधिक बल दिया जाता है।
- सोशल मीडिया पर तुलना: सोशल मीडिया पर निरंतर तुलना विद्यार्थियों के तनाव स्तर को बढ़ा देती है।
- संस्थागत उत्तरदायित्व एवं जवाबदेही: शैक्षणिक संस्थानों का दायित्व है कि वे प्रत्येक विद्यार्थी के लिए भावनात्मक रूप से सुरक्षित वातावरण सुनिश्चित करें।
- समानता एवं न्याय से संबंधित प्रश्न: बेहतर कोचिंग सुविधाओं तक असमान पहुँच शिक्षा में समान अवसरों और न्याय के सिद्धांत पर प्रश्नचिह्न लगाती है।
परीक्षा-संबद्ध आत्महत्याओं के समाधान हेतु नैतिक विचार
- मानवीय गरिमा: कर्तव्यवादी एवं कांटियन नैतिकता के अनुसार प्रत्येक मनुष्य अपने आप में एक उद्देश्य है और उसकी गरिमा सफलता अथवा असफलता से स्वतंत्र होती है।
- प्रत्येक विद्यार्थी का अंतर्निहित मूल्य उसके अंकों या रैंक से परे है।
- नीतियों और सामाजिक दृष्टिकोणों में यह प्रतिबिंबित होना चाहिए कि उपलब्धियों के अतिरिक्त भी जीवन का अपना मूल्य है।
- देखभाल की नैतिकता : परिवार, विद्यालय, कोचिंग संस्थान तथा समाज के लिए संवेदनशीलता और करुणा अनिवार्य है। इसके प्रमुख तत्व हैं—
- स्वस्थ संबंध
- ध्यानपूर्वक सुनना
- पोषणकारी एवं सहायक वातावरण
- करुणा एवं सहानुभूति: इसका अर्थ है विद्यार्थियों की समस्याओं को बिना निर्णयात्मक दृष्टिकोण अपनाए समझना।
- मानवीय प्रतिक्रिया देना
- दोषारोपण या कलंकित करने से बचना
- इसकी मूल भावना है।
- भावनात्मक बुद्धिमत्ता (EI): डैनियल गोलमैन के अनुसार भावनात्मक बुद्धिमत्ता स्वयं को समझने, अपनी भावनाओं को नियंत्रित करने तथा दूसरों के प्रति सहानुभूति रखने की क्षमता है।
- विद्यार्थियों को विकसित करना चाहिए—
- आत्म-जागरूकता
- भावनात्मक नियंत्रण
- तनाव प्रबंधन क्षमता
- मानसिक दृढ़ता
- वहीं शिक्षकों एवं अभिभावकों को संवेदनशील एवं सहानुभूतिपूर्ण होना चाहिए।
- विद्यार्थियों को विकसित करना चाहिए—
- उत्तरदायित्व एवं देखभाल का दायित्व: शैक्षणिक संस्थानों का नैतिक दायित्व है कि वे—
- परामर्श सेवाएँ उपलब्ध कराएँ
- मार्गदर्शन प्रदान करें
- सुरक्षित एवं सहयोगी वातावरण विकसित करें
- साथ ही अभिभावकों और समाज की भी सामूहिक जिम्मेदारी है।
- न्याय एवं निष्पक्षता: सामाजिक-आर्थिक स्थिति की परवाह किए बिना सभी विद्यार्थियों को निम्नलिखित तक समान पहुँच मिलनी चाहिए—
- गुणवत्तापूर्ण शिक्षा
- परामर्श सेवाएँ
- अवसर एवं संसाधन
- कोचिंग आधारित असमानताओं को कम करने की आवश्यकता है।
- स्वायत्तता एवं व्यक्तिगत विकल्पों का सम्मान: विद्यार्थियों को अपनी प्रतिभा, रुचि और क्षमता के अनुरूप करियर चुनने की स्वतंत्रता मिलनी चाहिए।
- सद्गुण नैतिकता : विद्यार्थियों में निम्नलिखित सद्गुणों का विकास प्रोत्साहित किया जाना चाहिए—
- प्रत्यास्थता
- दृढ़ता
- साहस
- आत्म-अनुशासन
- आशा
- सामुदायिक नैतिकता: अकेलेपन और सामाजिक अलगाव से निपटने के लिए सामाजिक जुड़ाव एवं सामुदायिक सहभागिता को बढ़ावा देना आवश्यक है।
- कल्याण एवं समग्र विकास की नैतिकता: शिक्षा का उद्देश्य केवल परीक्षाओं में सफलता नहीं होना चाहिए, बल्कि व्यक्तित्व के समग्र विकास को भी प्रोत्साहित करना चाहिए, जिसमें शामिल हैं—
- बौद्धिक विकास
- भावनात्मक विकास
- नैतिक विकास
- सामाजिक विकास
आगे की राह : जीवन-पुष्ट समाज का निर्माण
- परिवारों के लिए: बच्चों की अत्यधिक तुलना न करें।
- परिणामों के बजाय प्रयासों की सराहना करें।
- खुला एवं सकारात्मक संवाद बनाए रखें।
- शैक्षणिक संस्थानों के लिए: परामर्श एवं मार्गदर्शन सेवाओं को सुदृढ़ करें।
- मूल्य-आधारित शिक्षा एवं जीवन-कौशल को बढ़ावा दें।
- असफलता को सामान्य मानने तथा मानसिक दृढ़ता विकसित करने की संस्कृति विकसित करें।
- समाज के लिए: मानसिक रोगों से जुड़े कलंक को समाप्त करें।
- केवल सफलता नहीं, बल्कि निरंतर प्रयास और संघर्ष की भी सराहना करें।
- सहानुभूति, संवेदनशीलता और समावेशन को प्रोत्साहित करें।
निष्कर्ष
- एक नैतिक समाज मनुष्य का मूल्यांकन केवल उसके परीक्षा परिणामों अथवा व्यावसायिक उपलब्धियों के आधार पर नहीं कर सकता।
- अर्नेस्ट हेमिंग्वे के शब्दों में—“मनुष्य को नष्ट किया जा सकता है, परंतु उसे पराजित नहीं किया जा सकता।”
- परिवारों, शैक्षणिक संस्थानों तथा समाज का यह नैतिक दायित्व है कि वे प्रत्येक युवा को पर्याप्त गरिमा, सम्मान और सहयोग प्रदान करें, ताकि वह सभी चुनौतियों के बावजूद जीवन को चुन सके और अपने भविष्य का निर्माण कर सके।
स्रोत: IE
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